साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ श्रीसाम्बपुराणम्
तदनन्तर भगवान् सूर्यदेव अग्नितुल्य मुनि से मधुर वाक्य में फिर बोले—हे विप्रर्षि! सर्वदा गमनकारी सूर्य की कार्यवशात् चलमान अवस्था है। सदा गम्यमान सूर्य को आप कैसे जानते हैं॥२४-२५॥
एवं ब्रुवाणं देवं तं सूर्यं ब्राह्मणरूपिणम्।
विज्ञाय ज्ञानयुक्तात्मा इदं वचनमब्रवीत् ॥२६॥
स्थिरं रविं चलं वापि जानामि ज्ञानचक्षुषा।
अवश्यं विनयाध्यानं कार्यमद्य त्वयाऽनघ ॥२७॥
अपराह्ने निमेषं हि तिष्ठसि त्वं दिवाकर।
तत्र वेत्स्यामि सूर्यं त्वां नास्ति मेऽत्र विचारणा ॥२८॥
ब्राह्मणरूपी सूर्य के ऐसा कहने पर ज्ञानयुक्तात्मा ऋषि उनसे इस प्रकार कहने लगे—रवि को स्थिर अथवा चञ्चल मैं ज्ञाननेत्रों से देखता हूँ। हे निष्पाप! आज आपसे (सूर्य के) कार्य का वर्णन सुनकर मैं अपने क्रोध को रोक रहा हूँ। हे दिवाकर! अपराह्न काल में आप निमेष मात्र के लिये स्थिर हो जाते हैं। हे सूर्य! मैं तब आपको जान पाया हूँ। इस सम्बन्ध में मेरे मन में कोई सन्देह नहीं है॥२६-२८॥
श्रीसूर्य उवाच
असंशयं मां विप्रर्षे वेत्स्यसि धन्विनां वर।
उपकारिणं हि मां विद्धि भवतो गोचरं गतम् ॥२९॥
तं सर्वलोकरक्षायै प्रवृत्तं मां दुरासदम्।
दीप्तं रश्मिसहस्रेण ज्ञातवान् ज्ञानचक्षुषा ॥३०॥
श्री सूर्यदेव कहते हैं—हे धनुर्धारियों में श्रेष्ठ विप्रर्षि! आपने निःसंदेह मुझे जान लिया है। आपने मुझे उपकारी माना है, मैं आपकी दृष्टि के सम्मुख विषयीभूत (प्रत्यक्ष) हो गया। मैं समस्त लोकों की रक्षा में प्रवृत्त हूँ। सहस्र रश्मि से दीप्त हूँ। मुझ दुरासद को तुमने ज्ञाननेत्रों से जाना है॥२९-३०॥
ततः प्रहस्य भगवान् जमदग्निरुवाच ह।
भास्करं प्रीतया दृष्ट्या दृष्ट्वा लोकप्रतापनम् ॥३१॥
तदनन्तर सौभाग्य से लोकसमूह को ताप देने वाले सूर्य को देखकर प्रसन्न होकर भगवान् जमदग्नि हास्यपूर्ण मुद्रा में बोले॥३१॥
तापस्यास्यापगमने समाधिं तु विचिन्तय।
यथा सुखेन गमनं परमक्ष्यमयमेव च ॥३२॥
छत्रं द्विजातये दद्यात् स प्रेत्य तु सुखी भवेत्।
न च ते हन्ति मम क्रोधो नाभिकार्यः सुरोत्तमः ॥३३॥
मद्गोचरगतश्चापि सर्वलोकहितप्रदः।