साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४३
तथा अस्थि को जल में न फेंके। शून्य गृह में एकाकी न सोये। अग्नि-गुरु-देवता-ब्राह्मण, पति, धेनु, अध्ययन तथा भोजन—सबसे दाहिने हाथ से व्यवहार करे। तृण खा रही गाय को हठात् रोकना नहीं चाहिये। यदि वह अन्य की फसल खा रही हो, तब भी उस व्यक्ति को न बताये। आकाश में इन्द्रधनुष देखकर अन्य को नहीं दिखलाना चाहिये कि यह देखो इन्द्रधनुष है।
अधार्मिक देश में न रहे। व्याधिग्रस्त अवस्था में एकाकी यात्रा न करे। पर्वत पर दीर्घकाल-पर्यन्त नहीं रहना चाहिये। वृथा चेष्टा, अञ्जली से जल पीना, गोद में रखकर भोजनादि करना तथा कुतूहल का परित्याग करे। नृत्य-गीत-वाद्य-वीरों का बाहुशब्द तथा कुत्सित गायन अथवा क्रीड़ा आदि को विरक्त त्यागी स्थिति हो जाने पर भी न देखे। कांस्य पात्र में पैर न धोये। पैदल स्थिति में शब्दकारी अश्वादि के साथ न चले। उदीयमान सूर्य, श्मशान की धूम, झाड़ू की धूल (हवा) का त्याग करे। लेटे हुये न खाये। हथेली पर अथवा आसन पर रखकर न खाये। हाथ से (पानी काटकर अर्थात् तैरकर) नदी पार नहीं करना चाहिये।
वृक्ष पर न चढ़े। सन्देहप्रद नौका पर न बैठे। कूंयें में न उतरे। देवता-ब्राह्मण-गुरु-राजा-विद्यार्थी तथा मैथुनकारी के साथ न रहे। भोजनोपरान्त स्नान न करे। अस्वस्थावस्था में, गम्भीर रात में तथा अज्ञात जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिये। अधिक वस्त्र पहन कर भी स्नान न करे। शत्रु, शत्रु के सहायक, अधार्मिक तथा चोर की सेवा करना छोड़ देना चाहिये।
सदा प्रिय सत्य बोले। अप्रिय सत्य तथा प्रिय झूठ कदापि नहीं बोलना चाहिये। अनर्थक शत्रुता तथा अनर्थक वाक्य का वर्जन करना चाहिये। समस्त मंगल आचरण करे। समस्त अंग, नख, नाभिदेश तथा पाणितल का मन्त्र के विना स्पर्श न करे। गोपन स्थान तथा समस्त रोमों का वर्जन करे। देवता, ब्राह्मण तथा गुरु की पूजा करनी चाहिये। अपनी रक्षा हेतु ईश्वर की सेवा करना उचित है। दूसरे के अधीन होकर कार्य करना छोड़ दे। सुखाभिलाषी अपने अधीन होकर कार्य करे। अन्तरात्मा को सन्तोष देने वाले विधान का पालन करके धार्मिक बने। धर्महीन अर्थ तथा काम का त्याग करना ही उचित है। वाणी, हाथ, पैर तथा नेत्र को बेकार न नचाये।
अन्य के साथ द्रोह का आचरण नहीं करना चाहिये। पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, आश्रित, वृद्ध, बालक, आतुर, वैद्य, ज्ञाति, सम्बन्धी, बान्धव, माता-पिता, भ्राता, विमाता, कन्या तथा भृत्य के साथ विवाद नहीं करना चाहिये। गौ, स्वर्ण, भूमि, अश्व, वस्त्रादि, अन्न, तिल तथा घृत को जाने बिना इन्हें ग्रहण न करे। दूसरे के खोदे जलाशय में स्नान नहीं करे। सप्त पिण्ड का दान किये बिना दूसरे के जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिये। नदी, अपने-आप जो जलाशय बना है तथा प्रस्रवण में स्नान करना उचित है।
२४४ श्रीसाम्बपुराणम्
क्रुद्ध, दुष्ट जन, आतुर, दास, गणिका, विद्वान् के निन्दक, चोर, सूत्रधार, गायक तथा निन्दित का अन्न ग्रहण न करे। निन्दक, अभिशप्त, शठ, पुंश्चली (वेश्यादि), बन्दी तथा चिकित्सक का अन्न ग्रहण न करे। पूगान्त्र (सुपारी-मिश्रित अन्न), शूद्र का जूठा, शुष्क-बासी-सड़ा, मिट्टी में पड़ा (हिचकी के समय मिट्टी में गिरा) अन्नादि ग्रहण नहीं करना चाहिये।
आयु चाहने वाला व्यक्ति शत्रु का तथा स्वर्णकार का अन्न त्याग दे। जो अध्ययन नहीं करते, उनका साथ न करे। तृप्ति, अतिशय सुख, पुत्रादि, चक्षु, उन्नति, आयु, गृह, रूप, चन्द्र, सूर्य, सालोक्य, अभिलषित वस्तु, भार्या, नित्य ऐश्वर्य तथा ब्रह्मलोक-प्राप्ति की कामना से सूर्य को छत्र तथा पादुका देनी चाहिये। उत्तम सम्बन्ध, धन-सम्पत्ति, वंश की उन्नति-कामना, शय्या, गृह, कुशबन्ध, पुष्प, जल, मणि तथा दधि, मत्स्य, दुग्ध, मांस, शाक का दान करे। देवता, अतिथि, गुरु-सेवक की अर्चना द्वारा उद्धार की कामना से निरन्तर आत्मा के सम्बन्ध में चेष्टारत रहना चाहिये।
हे साम्ब! तुमसे यह पुण्यलक्षण आचार की वर्णना सम्यक् रूप से कहा, जो आयु, धन-सम्पत्ति, फल तथा उन्नति का कारण है तथा ब्रह्मा द्वारा निर्मित है।।११।।
आचारयुक्तः पुरुषः प्रेत्य चेह च मोदते।
आचाराद्वर्द्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥१२॥
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः।
दुष्टभोगी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥१३॥
आचारपरायण व्यक्ति परलोक तथा इहलोक में सुख प्राप्त करते हैं। आचार द्वारा आयु की वृद्धि होती है और आचार अलक्षण का विनाश करता है। दुराचारी पुरुष इस जगत् में निन्दित होता है। वह दुष्ट भोगों तथा व्याधि का सर्वदा भोग करके अल्पायु हो जाता है।।१२-१३।।
तस्माद् भवेत् सदाचारः समुदा श्रीरवेर्नरः।
देवस्य प्रियतामेति लक्ष्मीं विन्दति निश्चलाम् ॥१४॥
इति श्री साम्बपुराणे आचारलक्षणं नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अतएव लोक आनन्द से सूर्य के सदाचार से सम्पन्न हों। इससे सूर्यदेव की अचल सम्पदा तथा प्रीति मिलती है।।१४।।
श्री साम्बपुराणान्तर्गत सदाचार कथन नामक चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त।
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(छत्र-पादुकयोर्दानफलम्)
साम्ब उवाच
इदमुक्तं त्वया ब्रह्म छत्रं सूर्येण निर्मितम्।
उपानहौ च यो दद्याच्छक्रलोकं स गच्छति ॥१॥
एतदाचक्ष्व भगवन् कथं सूर्यविनिर्मितम्।
छत्रपादुकयोर्दानमध्वतान्तर्हि जायते ॥२॥
साम्ब कहते हैं—आपने बतलाया है कि सूर्य ने छत्र तथा पादुका का निर्माण किया है तथा जो छत्र तथा पादुका दान करता है, वह इन्द्रलोक जाता है। हे भगवन्! अब यह कहिये कि किस प्रकार सूर्य-विनिर्मित छत्र तथा पादुका-दान के फल से द्विजत्व प्राप्त होता है॥१-२॥
नारद उवाच
एतत्ते संप्रवक्ष्यामि यथावृत्तमिदं पुरा।
जमदग्निः किल शरान् पुरा चिक्षेप भार्गवः ॥३॥
तान् क्षिप्तान् रेणुका तस्य भानोर्जाज्वल्य तेजसः।
आनीयासीददात्तस्य सा च शीघ्रमनिन्दिता ॥४॥
अव्यक्तेन सुशब्देन ज्यातिलस्य शरस्य च।
प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तम् ॥५॥
नारद कहते हैं—इस विषय में पूर्वकाल में जो घटना घटित हो चुकी है, वह तुमसे कहता हूँ। भार्गव जगदग्नि ऋषि बाण छोड़ रहे थे और उनकी पत्नी अनिन्दिता रेणुका सूर्य के जाज्वल्य तेज में भी उन तीरों को शीघ्र उनके पास लाती जा रही थीं। तदनन्तर (तीर पाकर) वे पुनः धनुष की ज्या खींचकर बाण छोड़ते और रेणुका पुनः वे तीर लाकर उन्हें देती जा रहीं थीं॥३-५॥
ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे।
सायकान्यान् द्विजः क्षिप्त्वा रेणुकामिदमब्रवीत् ॥६॥
गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान्यनुश्च्युतान्।
यावदेतान्युनः सुभ्रू क्षिपामीति मुनिर्वदन् ॥७॥
गच्छन्ती सातुरा छायां वार्क्षीमाश्रित्य भामिनी।
तस्थौ सूर्यांशुसन्तप्तशिरःपादाम्बुजद्वया ॥८॥
२४६ श्रीसाम्बपुराणम्
स्थित्वा तत्र मुहूर्त्तं सा भर्तुः शापभयाच्छुभा।
गत्वादाय शरान् भूयस्तस्मै दद्याद् यशस्विनी ॥९॥
तत्पश्चात् एक समय ज्येष्ठ मास के मध्याह्न काल में ब्राह्मण जमदग्नि तीर छोड़ते हुये रेणुका से बोले—हे विशालाक्षि! धनुष से छोड़े इन तीरों को लाओ, जिससे मैं उन्हें पुनः छोड़ सकूँ। इस प्रकार दौड़ते-दौड़ते रेणुका का सूर्यकिरण से मस्तक तथा चरणद्वय सन्तप्त हो गया और वे कातर अवस्था में वृक्ष के नीचे बैठ गयीं। कल्याणी रेणुका स्वामी के शाप के भय से मुहूर्तमात्र में ही वहाँ से उठीं और पुनः तीर ला-लाकर स्वामी को देने लगीं॥६-९॥
स तामृषिश्च प्रस्विन्नां धिया वेदितवेदनाम्।
जगौ वचनमारुष्टः किञ्चिरेणागता ह्यसि ॥१०॥
ऋषि ने ध्यान से उन्हें पसीने से लथपथ देखकर उनकी वेदना के प्रति आकृष्ट होकर कहा—क्यों विलम्ब हुआ? ॥१०॥
रेणुकावाक्यमाहेदं चण्डांशुकरापीडिता।
शिरःपादमप्रतप्तं मे सूर्यतेजोभिरुद्धतैः ॥११॥
वृक्षच्छायागता तस्मात् चिरमेतन्मया कृतम्।
श्रुत्वैवं जमदग्निस्तु क्रुद्धः सूर्याय तापिने ॥१२॥
रेणुका ने उत्तर दिया—'मैं प्रचण्ड सूर्यकिरणों से पीड़ित हो गयी। सूर्य के तेज से मेरा मस्तक तथा पैर प्रतप्त हो जाने के कारण वृक्ष की छाया में मैं बैठ गयी, अतएव विलम्ब हो गया'। यह सुनकर जमदग्नि तापदायक सूर्य के प्रति क्रोधित हो उठे॥११-१२॥
स विस्फूर्ज्य धनुर्धीमान् गृहीत्वा सायकान् बहून्।
अतिष्ठत् सूर्यमभितो यतो याति ततो सुखम् ॥१३॥
द्विजरूपं समास्थाय सूर्योऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत्।
किमर्थं रुषितोऽसि त्वं किं ते सूर्योऽपराध्यति ॥१४॥
आदत्ते रश्मिभिः सूर्यो जलं सर्वजगत्स्थितम्।
आदाय स जलं देवो वर्षाकाले प्रवर्षति ॥१५॥
ततोऽन्नं जायते विप्र मानुषाणां सुखावहम्।
अन्नं प्राण इति प्रोक्तं वेदे च परिपठ्यते ॥१६॥
बुद्धिमान् जमदग्नि ने धनुष खींचकर अनेक तीर लेकर सूर्य की ओर खड़े हो गये और सूर्य जिधर-जिधर घूम रहे थे, उस-उस ओर मुख करके चलने लगे। तत्पश्चात् सूर्यदेव ब्राह्मण का रूप धारण करके आये और कहा कि आपने क्यों कष्ट किया? सूर्य का क्या अपराध है? समस्त जगत् के जल को सूर्य अपनी किरणों से ग्रहण करके उस जल
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः । २४७
का पुनः वर्षाकाल में वर्षण करते हैं। हे ब्राह्मण! उससे मनुष्य को सुख देने वाला अन्न उत्पन्न होता है और अन्न ही प्राण कहा जाता है। वेद में भी ऐसा पाठ है॥१३-१६॥
ततो लोकहितार्थाय रश्मिभिः परिवारितः।
सप्तद्वीपानिमान् ब्रह्मन् वर्षेणाभिव्रवर्षति ॥१७॥
ततस्तदोषधीनां च वीरुधां पत्रपुष्पजाम्।
सर्वं वर्षाभिनिर्वृत्तमन्नं सम्भवति द्विज ॥१८॥
भवन्ति जातकर्माणि व्रतोपनयनानि च।
गोदाननिवहाश्चैव तथा वर्णसमृद्धयः ॥१९॥
सत्राणि दानानि तथा संयोगाबीजसञ्चयाः।
अनन्ताः सम्प्रवर्त्तन्ते यथा त्वं वेत्सि भार्गव ॥२०॥
इसीलिये जनकल्याणार्थ सूर्यदेव अपनी रश्मि द्वारा जल खींचते हैं। हे ब्राह्मण! वे सप्त द्वीपों में वर्षा ऋतु में प्रबल जल-वर्षण करते हैं। इसके पश्चात् क्रमशः औषधि तथा लता-गुल्म का पत्र-पुष्प जन्म लेता है। हे द्विज! समस्त वर्षा-जल से अन्न उत्पन्न होता है। तदनन्तर क्रमशः इसके फल से जातकर्म, व्रत, उपनयन तथा गोदानादि कार्य होते हैं। फलस्वरूप सभी वर्ण समृद्ध हो जाते हैं। यज्ञ-दान-संयोग-बीजसंचय सभी अन्न से ही सम्भव होता है। हे भार्गव! इसे आप अच्छी तरह से जानते हैं॥१७-२०॥
रमणीयानि यावन्ति वर्तन्ते यानि कानिचित्।
तावन्त्यन्नात्सम्भवन्ति विदितं कीर्तयामि ते ॥२१॥
सर्वं हि वेत्सि विप्र त्वं यदेतत् कीर्तितं मया।
या चेत्त्वाहं भृगुश्रेष्ठ! किं त्वं सूर्याय रूष्यति ॥२२॥
एवं तदोच्यमानो वै भास्करेण महात्मना।
जमदग्निर्महातेजा कैङ्कर्यं प्रत्यपद्यत ॥२३॥
जो कुछ रमणीय है, वह सब अन्न से उत्पन्न होता है। इसे आप जानते हैं। हे ब्राह्मण! मैंने जो कुछ कहा है, वह सब आप जान लीजिये। हे भृगुश्रेष्ठ! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप सूर्य से क्यों क्रोधित हैं? महात्मा भास्कर (ब्राह्मणरूपी) के यह कहने पर महातेजस्वी जमदग्नि भृत्यभाव से अवनत हो गये॥२१-२३॥
ततः स भगवान् देवो मुनिमग्निसमन्वितम्।
सूर्यो मधुरया वाचा तमिदं पुनरब्रवीत् ॥२४॥
चलं निमित्तं विप्रर्षे सदा सूर्यस्य गच्छतः।
कथं चलं वेत्स्यसि त्वं सदा यान्तं दिवाकरम् ॥२५॥
२४८ श्रीसाम्बपुराणम्
तदनन्तर भगवान् सूर्यदेव अग्नितुल्य मुनि से मधुर वाक्य में फिर बोले—हे विप्रर्षि! सर्वदा गमनकारी सूर्य की कार्यवशात् चलमान अवस्था है। सदा गम्यमान सूर्य को आप कैसे जानते हैं॥२४-२५॥
एवं ब्रुवाणं देवं तं सूर्यं ब्राह्मणरूपिणम्।
विज्ञाय ज्ञानयुक्तात्मा इदं वचनमब्रवीत् ॥२६॥
स्थिरं रविं चलं वापि जानामि ज्ञानचक्षुषा।
अवश्यं विनयाध्यानं कार्यमद्य त्वयाऽनघ ॥२७॥
अपराह्ने निमेषं हि तिष्ठसि त्वं दिवाकर।
तत्र वेत्स्यामि सूर्यं त्वां नास्ति मेऽत्र विचारणा ॥२८॥
ब्राह्मणरूपी सूर्य के ऐसा कहने पर ज्ञानयुक्तात्मा ऋषि उनसे इस प्रकार कहने लगे—रवि को स्थिर अथवा चञ्चल मैं ज्ञाननेत्रों से देखता हूँ। हे निष्पाप! आज आपसे (सूर्य के) कार्य का वर्णन सुनकर मैं अपने क्रोध को रोक रहा हूँ। हे दिवाकर! अपराह्न काल में आप निमेष मात्र के लिये स्थिर हो जाते हैं। हे सूर्य! मैं तब आपको जान पाया हूँ। इस सम्बन्ध में मेरे मन में कोई सन्देह नहीं है॥२६-२८॥
श्रीसूर्य उवाच
असंशयं मां विप्रर्षे वेत्स्यसि धन्विनां वर।
उपकारिणं हि मां विद्धि भवतो गोचरं गतम् ॥२९॥
तं सर्वलोकरक्षायै प्रवृत्तं मां दुरासदम्।
दीप्तं रश्मिसहस्रेण ज्ञातवान् ज्ञानचक्षुषा ॥३०॥
श्री सूर्यदेव कहते हैं—हे धनुर्धारियों में श्रेष्ठ विप्रर्षि! आपने निःसंदेह मुझे जान लिया है। आपने मुझे उपकारी माना है, मैं आपकी दृष्टि के सम्मुख विषयीभूत (प्रत्यक्ष) हो गया। मैं समस्त लोकों की रक्षा में प्रवृत्त हूँ। सहस्र रश्मि से दीप्त हूँ। मुझ दुरासद को तुमने ज्ञाननेत्रों से जाना है॥२९-३०॥
ततः प्रहस्य भगवान् जमदग्निरुवाच ह।
भास्करं प्रीतया दृष्ट्या दृष्ट्वा लोकप्रतापनम् ॥३१॥
तदनन्तर सौभाग्य से लोकसमूह को ताप देने वाले सूर्य को देखकर प्रसन्न होकर भगवान् जमदग्नि हास्यपूर्ण मुद्रा में बोले॥३१॥
तापस्यास्यापगमने समाधिं तु विचिन्तय।
यथा सुखेन गमनं परमक्ष्यमयमेव च ॥३२॥
छत्रं द्विजातये दद्यात् स प्रेत्य तु सुखी भवेत्।
न च ते हन्ति मम क्रोधो नाभिकार्यः सुरोत्तमः ॥३३॥
मद्गोचरगतश्चापि सर्वलोकहितप्रदः।
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४९
ततः सूर्यो ददौ तस्मै छत्रोपानहमाशु वै ॥३४॥
उवाच स मुनिश्रेष्ठमिदं वचनमुत्तमम्।
महर्षे शिरसस्त्राणं छत्रं मद्रश्मिवारणम् ॥३५॥
प्रतिगृह्णीहि पद्भ्यान्तु धारणार्थं च पादुके।
अद्य प्रभृति चैवाऽस्मिंल्लोके सम्प्रचरिष्यति ॥३६॥
हे सुरोत्तम! इस ताप के चले जाने पर आप समाधि में चिन्तन करें, जिससे सुख से गमन हो सके तथा वह अक्षय हो। ब्राह्मण को छत्रदान करने से (व्यक्ति) परलोक में सुखी होता है। आपके प्रति मेरा कोई क्रोध नहीं है। मेरी दृष्टि के सम्मुख प्रकट होकर भी आप समस्त लोक का हित करने वाले हैं। तदनन्तर जमदग्नि को सूर्यदेव ने शीघ्रता से छाता तथा पादुका प्रदान किया और उन्होंने (सूर्यदेव ने) मुनिश्रेष्ठ से कहा—महर्षि! मेरे ताप से छुटकारा पाने के लिये मस्तक का रक्षण करने वाला यह छत्र (छाता) तथा दोनों पैरों में धारण करने हेतु यह पादुकायुगल धारण कीजिये। आज से यह जगत् में प्रचारित होगा।।३२-३६।।
पुण्यकेष्वपि सर्गेषु परमक्षय्यमेव च।
छत्रं द्विजाय यो दद्यात् स प्रेत्य सुखमेधते ॥३७॥
शक्रलोके च वसति ह्यप्सरोभिः समावृतः ॥३८॥
उपानहौ च यो दद्यात् श्लक्ष्णे स्नेहसमन्विते।
गोलोके स मुदायुक्तो वसति प्रेत्य मानवः ॥३९॥
पुण्य कार्य में यह परम अक्षय (पुण्य कार्य) है। जो ब्राह्मण को छत्रदान करेगा, उसे परलोक में सुख-वृद्धि होगी तथा इन्द्रलोक में अप्सराओं से परिवृत होकर वह निवास करेगा। सुन्दर नरम पादुका जो दान करेगा, वह परलोक में अर्थात् गोलोक में सानन्द निवास करेगा।।३७-३९।।
एवमुक्त्वा तु भगवान् भास्करो लोकपावनः।
शान्तयित्वा द्विजश्रेष्ठं तत्रैवान्तरधीयत ॥४०॥
मयापि ते यदुश्रेष्ठ कथितं पुण्यवर्धनम्।
छत्रपादुकयोर्दानं यथा सूर्येण भाषितम् ॥४१॥
इति श्रीसाम्बपुराणे छत्रपादुकादानफलवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
यह कहकर भगवान लोकपावन भास्कर ब्राह्मण जगदग्नि को सान्त्वना देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। हे यदुश्रेष्ठ! इस प्रकार सूर्य ने जैसा कहा था, मैंने भी तुमसे उस पुण्यवर्धक छत्र तथा पादुकादान का वर्णन किया।।४०-४१।।
श्री साम्बपुराणान्तर्गत छत्र-पादुकादानफल नामक पैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त
षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(सप्तमीकल्पः)
साम्ब उवाच
भगवन् श्रोतुमिच्छामि सप्तम्यास्तु विधिक्रमम्।
सर्वास्तामानुपूर्व्येण कथयस्व महामुने॥१॥
साम्ब कहते हैं—भगवन्! सप्तमी सूर्यपूजन की विधि सुनने की इच्छा हो रही है। हे महामुनि! उसका आनुपूर्वीक वर्णन करिये॥१॥
नारद उवाच
शृणु साम्ब महाबाहो सप्तमीनां विधिं परम्।
तमहं कीर्तयिष्यामि भक्त्या यत् परिपृच्छ्यते॥२॥
तुभ्यं यदुकुलश्रेष्ठ यथा ख्यातं विवस्वता।
शुक्लपक्षे रविदिने प्रवृत्ते चोत्तरायणे॥३॥
पुन्नामधेयनक्षत्रे गृह्णीयात् सप्तमीव्रतम्।
ऋषिभिर्ज्ञानसम्पन्नैः सर्वकामफलप्रदा॥४॥
सप्तम्यः सप्त कथितास्तासां नामानि मे शृणु।
अर्कसम्पुटकैरेका द्वितीया मरिचैस्तथा॥५॥
तृतीया निम्बपत्रैस्तु चतुर्थी फलसप्तमी।
पञ्चम्यनादिनी स्यात्तु षष्ठी विजयसप्तमी।
सप्तमी कामिका नाम विधिमासां निबोध मे॥६॥
देवर्षि नारद कहते हैं—हे महाबाहु साम्ब! सप्तमी तिथि की श्रेष्ठ विधि को सुनो। तुमने भक्तिपूर्वक जो पूछा है, उसका वर्णन तुमसे करता हूँ। हे यदुकुलश्रेष्ठ! सूर्यदेव ने जैसा कहा था, वह तुमसे मैं कहता हूँ। उत्तरायण होने पर शुक्ल पक्ष के रविवार की पुष्य नक्षत्र वाली सप्तमी को ग्रहण करो (अर्थात् उस दिन पूजन करो)।
ज्ञानयुक्त ऋषिगण ने सात प्रकार की सप्तमी की बात कही है। उसका नाम मुझसे सुनो। अर्कसम्पुट द्वारा प्रथम, मरिच द्वारा द्वितीय, नीम के पत्ते द्वारा तृतीय, चतुर्थ है—फलसप्तमी (फल द्वारा), पञ्चम है—अनादिनी सप्तमी। षष्ठ है—विजयसप्तमी तथा सप्तम है—कामिका सप्तमी। अब इनका विधान मुझसे श्रवण करो॥२-६॥
पञ्चम्यामेव पुरुषः कुर्यान्नियसिमात्मनः ।
षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५१
सर्वासु ब्रह्मचारी स्याच्छौचयुक्तो जितेन्द्रियः ।
सूर्यार्चनपरो दान्तो जपहोमसमन्वितः ॥७॥
पञ्चम्यामेव पुरुषः कुर्यान्नियसिमात्मनः ।
षष्ठ्यां न मैथुनं गच्छेन्मधुमांसानि वर्जयेत् ॥८॥
सभी सप्तमियों में ब्रह्मचारी होकर, शौचयुक्त होकर, जितेन्द्रिय रहकर सूर्य के अर्चनपरायण होकर यम, बहिरिन्द्रिय संयत (दान्त) होकर जप तथा होमपरायण हो जाय। पञ्चम सप्तमी को आत्मसंयम करे। षष्ठ सप्तमी को मैथुन-मधु तथा मांस का वर्जन करना चाहिये॥७-८॥
अर्कसम्पुटमेकैकं प्रथमायां विधानवित् ।
अन्यदत्तमभुञ्जानः सप्तम्यां भक्षयेन्नरः ॥९॥
एकैकवृद्धानि पुनर्मरिचानि च भक्षयेत् ।
तथैव निम्बपत्राणि परमं व्रतमास्थितः ॥१०॥
विधान का ज्ञाता व्यक्ति अर्कसम्पुट के एक-एक में (?) प्रथमतः दूसरे के द्वारा दिया भक्षण न करके (?) सप्तमी को भक्षण करे। इसका तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि अर्कसम्पुट सप्तमी को अन्य वस्तु का भक्षण न करे। द्वितीय में एक-एक की वृद्धि करके अब (अर्कसम्पुट के अनन्तर) मरिच का भक्षण करे। तृतीय में व्रत-पालनार्थ निम्ब पत्र का भक्षण करे॥९-१०॥
फलाख्यायां फलेनैव आमे नात्र विधीयते ।
अनादिन्यामोदनेन रहितमप्यनाश्नीयात् ॥११॥
फलाख्य चतुर्थ सप्तमी में फल-भक्षण द्वारा व्रत करे। इसमें बिना पकाये द्रव्य ग्रहण का विधान है। अनादिनी सप्तमी में अन्नरहित होने पर भी यहाँ भक्षण करे (क्या भक्षण करे? स्पष्ट नहीं है)॥११॥
अहोरात्रं वायुभक्षः कुर्याद्विजयसप्तमीम् ।
अथैकैकां सप्तमीं तु प्रतिपक्षे विचक्षणः ॥१२॥
दिन-रात वायु भक्षण द्वारा विजयसप्तमी व्रतानुष्ठान होता है। विचक्षण व्यक्ति प्रत्येक पक्ष में इस प्रकार का व्रत करे॥१२॥
कृत्वा विधानकुशलस्तुतः कुर्वीत कामिकाम् ।
आसां लिखित्वा नामानि पत्रकेषु पृथक्-पृथक् ॥१३॥
तानि सर्वाणि पत्राणि प्रक्षिपेन्नवके घटे ।
तदर्थं यो न जानाति बालो वान्योऽपि वा नरः ॥१४॥
तेनैवोद्धारयेदेकं तत्कुर्यादविचारयन् ।
तेनैव विधिना कुर्यात् पक्षे पक्षे विचक्षणः ॥१५॥
२५२ श्रीसाम्बपुराणम्
विधानकुशल व्यक्ति ऐसा करके कामिका सप्तमी व्रत करे। इन सप्तमियों का नाम पृथक्-पृथक् पत्ते पर लिखकर एक नये घट में छोड़े। इसका अर्थ जो नहीं जानता, वह बालक अथवा अन्य नर है। उसमें से एक-एक को निकाले। इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये। विचक्षण व्यक्ति इस प्रकार के विधान से प्रत्येक पक्ष में अनुष्ठान करे।।१३-१५।।
सप्तैव यावत् संप्राप्ता विज्ञेया सा तु कामिका।
इत्येता सप्त सप्तम्यः स्वयं प्रोक्ता विवस्वता ॥१६॥
जब सातो प्राप्त हो जाती हैं, तब उसे ही कामिका सप्तमी कहते हैं। इन सातों का वर्णन स्वयं सूर्यदेव ने किया है।।१६।।
कुर्वीत यो नरः साम्ब सर्वपापैः प्रमुच्यते।
अर्कसम्पुटकैर्वित्तं मरिचैः प्रियसङ्गमम् ॥१७॥
हे साम्ब! जो व्यक्ति इन सातो सप्तमी के व्रत का अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। अर्कसम्पुट सप्तमी व्रत से वित्तलाभ होता है तथा मरिच सप्तमी व्रत के अनुष्ठान से प्रियजनों का मिलन होता है।।१७।।
निम्बपत्रे रोगानाशं फलैः पुत्रान्यथेप्सितम्।
धनधान्यमनादिन्यां विजये विजयं तथा ॥१८॥
निम्ब सप्तमी में नीम के पत्तों से रोग का नाश होता है। फल वाली सप्तमी में अभीष्ट पुत्र की प्राप्ति होती है। अनादिनी सप्तमी व्रत द्वारा धन-धान्य का लाभ होता है। विजया सप्तमी व्रत विजय दिलाती है।।१८।।
सर्वान् कामान् कामिकायां प्राप्नुयान्नात्र संशयः।
नरो वा यदि वा नारी यः कुर्यात् सप्तमीव्रतम् ॥१९॥
नर अथवा नारी में से जो कोई भी सप्तमी व्रत करे, उन्हें कामिका सप्तमी व्रत से समस्त कामनाओं की पूर्ति का लाभ मिलता है। यह निःसंदिग्ध है।।१९।।
ये करिष्यन्ति नितरां तेषां लोको विभावसोः।
न तेषां त्रिषु लोकेषु किञ्चिदस्तीह दुर्लभम् ॥२०॥
जो निरन्तर सप्तमी व्रत करते हैं, उन्हें सूर्यलोक प्राप्त होता है। उनके लिये त्रिलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता।।२०।।
ये भक्ता लोकनाथस्य व्रतिनः संयतेन्द्रियाः।
तत्फलं ते प्राप्नुवन्ति क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥२१॥
षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५३
जो भक्त संयतेन्द्रिय होकर लोकपालक सूर्य का व्रत करते हैं, वे प्रचुर दक्षिणायुक्त यज्ञों का फल प्राप्त करते हैं।।२१।।
व्रतैरेवंविधैस्त्वन्यैस्तपोभिस्तु सुदुष्करैः।
कर्मभिः शमनैर्वापि दानहोमजपैरपि ॥२२॥
यत्फलं समवाप्नोति चरित्वा सप्तमीव्रतम्।
सूर्यलोकेषु नियतं वासो नैवात्र संशयः॥२३॥
इस प्रकार से अन्यान्य व्रत, सुदुष्कर तप, कर्मों का शमन, दान, होम तथा जप से जो फल प्राप्त होता है, वही फल सप्तमी व्रतानुष्ठान से भी प्राप्त हो जाता है। वह निःसंदिग्ध रूप से सूर्यलोक में वास करता है।।२२-२३।।
ब्रह्मेन्द्ररुद्रलोकेषु तस्याप्रतिहता गतिः।
नान्धः कुष्ठी न च क्लीबो व्यङ्गो नापि च निर्धनः ॥२४॥
कुले तस्य भवेत् कश्चिद्यश्चरेत् सप्तमीव्रतम्।
नारीहस्त्यश्वयानानां विविधानां च वाससाम् ॥२५॥
ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक तथा रुद्रलोक में उसकी अप्रतिहत गति हो जाती है। उसके वंश में कोई भी अन्धा, कुष्ठी, क्लीब, अंगहीन अथवा निर्धन व्यक्ति जन्म नहीं लेता (जो सप्तमी व्रतानुष्ठान करता है, उसके वंश की बात कही गयी है)। सप्तमी व्रतकारी को नारी, हाथी, अश्वादि यान, विविध वस्त्र भोगार्थ प्राप्त होते हैं।।२४-२५।।
ध्रुवं स भाजनं साम्ब यश्चरेत् सप्तमीव्रतम्।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥२६॥
भार्यार्थी रूपसम्पन्नां लभेद् भार्यां कुलोद्भवाम्।
पुत्रार्थी श्रुतसम्पन्नांल्लभेत् पुत्रांश्चिरायुषः ॥२७॥
विद्यार्थी को विद्या एवं धनार्थी को धन मिलता है। भार्यार्थी को भार्या जो रूपसम्पन्न एवं सद्वंश में उत्पन्न है, प्राप्त होती है। पुत्रार्थी दीर्घायु पुत्रों को प्राप्त करता है।।२६-२७।।
भोगार्थी लभते भोगान् व्रतेनानेन यादव।
मोहात् प्रमादाल्लोभाद्वा व्रतभङ्गं समाचरेत् ॥२८॥
त्रिरात्रं न तु भुञ्जीत कुर्याद्वा केशमुण्डनम्।
प्रायश्चित्तमिदं कृत्वा पुनरेव व्रती भवेत् ॥२९॥
हे यादव! इस व्रत से भोगार्थी समस्त भोगों को प्राप्त करते हैं। यदि मोह से, प्रमाद से अथवा लोभ से व्रतभंग हो जाय, तब दिन-रात भोजन न करे अथवा बाल का मुण्डन कराये। ऐसे प्रायश्चित्त को करके पुनः व्रतानुष्ठान करना चाहिये।।२८-२९।।
२५४ श्रीसाम्बपुराणम्
सप्तैव यावत् संप्राप्ताः सप्तम्यः सप्तसद्गुणाः । अभ्यर्च्य सूर्यं सप्तम्यां माल्यधूपादिभिर्नरः ॥३०॥ भोजयित्वा द्विजान् भक्त्या प्राप्नुयात् स्वर्गमक्षयम् । सप्तम्यां विप्रमुख्येभ्यो वस्तु यद्यत् प्रयच्छति ॥३१॥ तत्तदक्षयमाप्नोति सूर्यलोकं स गच्छति । इति ते कीर्तितः साम्ब सप्तम्या विधिरुत्तमः ॥३२॥
सात गुणान्वित सात सप्तमी व्रत जब अनुष्ठित हो जाता है, उस सप्तम सप्तमी को माला-धूप आदि से सूर्य की अर्चना करके भक्ति से ब्राह्मणों को भोजन कराने से अक्षय स्वर्ग मिलता है। सप्तमी को श्रेष्ठ ब्राह्मणों को जो-जो वस्तु दान में दिया जाता है, वह अक्षय हो जाता है (दान अक्षय हो जाता है)। वह व्यक्ति सूर्यलोक प्राप्त करता है। हे साम्ब! इस प्रकार तुमसे उत्तम तिथि सप्तमी का वर्णन किया॥३०-३२॥
भूय एवाभिधानस्य शृणुष्वैकाग्रमानसः । यः कुर्याद् गोमयाहारः शुक्ला द्वादशीसप्तमी ॥३३॥ अथवा यवकाहारः शीर्णपत्राशनोऽथवा । क्षीराशी चैकभक्तोऽथ भिक्षाहारोऽथवा पुनः ॥३४॥ जलाहारोऽपि वा विद्वान् पूजयित्वा दिवाकरम् । पुष्पोपहारैर्विविधैः नैवेद्यैः सुमनोहरैः ॥३५॥ नानाप्रकारैर्गन्धैश्च धूपैर्गुग्गुलचन्दनैः । कृसरैः पायसान्नाद्यैर्विविधैश्च विभूषणैः ॥३६॥ अर्चयित्वा द्विजाञ्छ्रेष्ठान् हिरण्यान्नादिभिर्नरः । स यत्फलमवाप्नोति तच्छृणुष्व समाहितः ॥३७॥
और भी कहता हूँ, एकाग्र होकर सुनो। जो गोमय का भक्षण करके शुक्ल पक्ष की द्वादशी को सप्तमी व्रत का अनुष्ठान करते हैं (?) अथवा यवक आहार, शुष्क पत्ते का आहार अथवा दुग्ध पीकर रहते हैं, अथवा मात्र एक बार भोजन अथवा भिक्षा का आहार करते हैं, अथवा केवल जल पीकर जो विद्वान् पुष्पोपहार, विविध मनोहर नैवेद्य, खिचड़ी, पायस, अन्नादि तथा विविध आभूषणों से सूर्य की पूजा करते हैं, श्रेष्ठ ब्राह्मणों की अन्नादि से अर्चना करते हैं, वे जो फल प्राप्त करते हैं, उसे समाहित होकर सुनो॥३३-३७॥
काञ्चनेन विमानेन मनो मारुतरंहसा । वैडूर्यमणिरत्नेन किङ्किणीजालमालिना ॥३८॥ कुण्डलाङ्गदभूषाढ्यैर्गीयमानोऽप्सरोगणैः । विचित्रमालाभरणैः स याति सूर्यलोकताम् ॥३९॥
मनोहर वायु की गति से स्वर्णमय विमान में वैदूर्य मणि रत्न, किङ्किणी जाल,
षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५५
कुण्डल, अंगद प्रभृति भूषण से भूषित अप्सरागण द्वारा गीत सुनते हुये विचित्र माला तथा आभूषण से युक्त होकर सूर्यलोक जाते हैं॥३८-३९॥
तपसोऽन्ते पुनः साम्ब कुले महति जायते।
एवं यजेद्विवस्वन्तं प्रतिमासं समाहितः॥४०॥
यथाक्रमं प्रयत्नेन नामानि परिकीर्तयेत्।
मधौ मासे विष्णुरिति माधवे त्वर्यमेति च॥४१॥
शुक्रे विवस्वानिति च शुचौ मासेऽंशुमानिति।
पर्जन्यः श्रावणे मासि नभस्ये वरुणस्तथा॥४२॥
इषे त्विन्द्र इति ज्ञेयं ऊर्जे धातेति वा पुनः।
मार्गशीर्षे मित्र इति पौषे पूषेति कीर्त्यते॥४३॥
माघमासे भग इति त्वष्टा इत्येव फाल्गुने।
एवं क्रमेण तीक्ष्णांशुं नामभिः परिपूजयेत्॥४४॥
हे साम्ब! जो इस प्रकार प्रतिमास समाहित होकर सूर्य का यजन करता है, वह तपस्या के अन्त में महान् वंश में जन्म लेता है। यथाक्रम से प्रतिमास सूर्य के पृथक्-पृथक् नाम का कीर्तन करना चाहिये। चैत्र में विष्णु का, वैशाख में अर्यमा का, ज्येष्ठ में विवस्वान् का, आषाढ़ में अंशुमान का, श्रावण में पर्जन्य का, भाद्र में वरुण का, आश्विन में इन्द्र का, कार्तिक में धाता का, अग्रहायण में मित्र का, पौष में पूषा का, माघ में भग का तथा फाल्गुन में त्वष्टा का कीर्तन करना चाहिये। इस प्रकार सूर्य के नामों से पूजन करना चाहिये॥४०-४४॥
पुष्पार्चनविधानेन सप्तम्यां सुसमाहितः।
नैतद्देयमशिष्याय नाभक्ताय च भास्वतः॥४५॥
न च पापकृते साम्ब देयं नैवाभ्यसूयके।
पठेद्यश्चापि नियतो विधिना तं नरः सदा।
इह लोके सुखं प्राप्य सूर्यलोके महीयते॥४६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सप्तमीकल्पे षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
सप्तमी को समाहित होकर पुष्पार्चन-विधान से पूर्वोक्त नामों द्वारा पूजन करे। हे साम्ब! पाप करने वाले अथवा असूयारत व्यक्ति को यह व्रतविधान नहीं देना चाहिये। जो व्यक्ति सर्वदा इस प्रकार से पाठ करता है, वह इस लोक में सुख पाकर (मरणोपरान्त) सूर्य लोक में सम्मानित होता है॥४५-४६॥
श्री साम्बपुराणान्तर्गत सप्तमीव्रत-विधान नामक छियालीसवाँ अध्याय समाप्त
सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(जपविधिः)
नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि जपयज्ञविधिक्रमम्।
यैर्यत्नैः सर्वथा चैव कर्तव्यः कथयामि ते॥१॥
सर्वेषामेव यज्ञानां जपयज्ञो विशिष्यते।
कृतेन विधिनानेन प्रीतो भवति भास्करः॥२॥
यदन्यत् कुरुते कर्म यदि वा न करोति च।
कृतेन जपयज्ञेन परां सिद्धिमवाप्नुयात्॥३॥
महद्भिः पातकैर्युक्ता ये चान्ये कार्यकारिणः।
खखोल्कजाप्यान्मुच्यन्ते सर्वे तैस्तैस्तु पातकैः॥४॥
नारद कहते हैं—इसके अनन्तर जपयज्ञ की विधि तथा क्रम कहूँगा, जिसे सयत्न सभी (नियमानुसार) करना होगा, यह सब तुमसे कहता हूँ। सभी यज्ञों में जपयज्ञ श्रेष्ठ है। उसे यथाविधि अनुष्ठित करने पर सूर्यदेव की कृपा मिलती है। अन्य कोई कर्म किया जाय अथवा नहीं किया जाय, केवल जपयज्ञ करने से ही परम सिद्धि मिल जाती है। जो महापातकयुक्त अन्य कर्म करते हैं, वे सभी खखोल्क (सूर्ययन्त्र सम्बन्धित) जप द्वारा पापों से मुक्त हो जाते हैं॥१-४॥
जप्यं जपन्तः संन्यासं कुर्वन्ति सुसमाहिताः।
असुरास्तं तु हिंसन्ति चान्यथा दुष्टचेतसः॥५॥
प्रवालहेममुक्ताभिर्मणिरुद्राक्षपुष्करैः।
दर्भारिष्टकजीवैश्च शङ्खेन च रविं यजेत्॥६॥
जप्य मन्त्र का जप करके सुसमाहित होकर उसका सम्यक् न्यास करना चाहिये। अन्यथा दुष्टचित्त असुरगण (असुरवृत्ति) हिंसा (अनिष्ट) कर देते हैं। प्रवाल, स्वर्ण, मुक्ता, मणि, रुद्राक्ष, पद्म, दर्भ, अरिष्टक, जीव तथा शङ्ख की माला द्वारा रवि का जप करना चाहिये॥५-६॥
शब्दकायमनोवृत्त्या स चापि त्रिविधः स्मृतः।
शतं सहस्रमयुतं तस्यापि त्रिविधं फलम्॥७॥
लक्षाद्धं चैव मणिना रुद्राक्षेणायुतं स्मृतम्।
पुष्करेणाष्टसाहस्रं दर्भैश्चैव तदर्धकम्॥८॥
सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५७
वाचिक, कायिक तथा मानसिक रूप से त्रिविध जप कहा जाता है। शत-सहस्र तथा अयुत (जपसंख्या से) जप करे। उसका फल भी तीन प्रकार से कहा गया है। मणि द्वारा जप से अर्धलक्ष गुना, रुद्राक्ष से अयुत गुना (माला), पद्म द्वारा आठ हजार गुना तथा कुश आदि (दर्भ) की माला से जप करने से चार हजार गुना फल प्राप्त होता है॥७-८॥
जपे कृते प्रवालेन फलमानन्त्यमुच्यते।
हेम्ना कोटिगुणं प्रोक्तं लक्षं मुक्ताफलैः स्मृतम्॥९॥
अरिष्टाक्षाज्जपात्तस्य फलं साहस्रकं भवेत्।
शतानि जीवकैः पञ्च शङ्खे शतगुणं भवेत्॥१०॥
प्रवाल द्वारा जप करने से अनन्त गुना फल मिलता है। स्वर्ण माला से जप करने पर करोड़ों गुना फल एवं मुक्ता की माला से जप करने से लक्ष गुना फल मिलता है। अरिष्टाक्ष माला के जप से हजार गुना फल, जीवक की माला से जप करने से ५०० गुना फल तथा शङ्ख की माला से जप करने पर सौ गुणित फल मिलता है॥९-१०॥
जपं कुर्वन् यदि ष्ठीवेज्जल्पेद्विजृम्भतेऽपि वा।
आचमेद् भुवि विन्यस्य स्पृशेदम्भोऽथ गोमये॥११॥
अक्षसूत्रं निपतेद् भूमौ चेत्कुर्वतो जपम्।
उद्धारं तस्य कुर्वीत जापको हृदयेन तु॥१२॥
दक्षिणाङ्गुष्ठमध्याग्रे अष्टमैकैकमादृतः।
प्रत्येकमानुपूर्व्येण कर्षयन् जपमारभेत्॥१३॥
यदि जप करते-करते व्यक्ति थूकता है, अनर्थक बातें बोलता है, जंभाई लेता है, तब आचमन करके मिट्टी, जल तथा गोबर का स्पर्श करना चाहिये। जप करते-करते यदि अक्षसूत्र मिट्टी में गिर जाता है तब जपकारी हृदय से उसका उद्धार करे। दाहिने अंगूठा तथा मध्यमा उंगली के अगले भाग से एक-एक करके आठ में से सादर एक-एक को खींचते हुये (फेरते हुये) जप करे॥११-१३॥
शतमष्टाधिकं चैव चतुःपञ्चाशदेव च।
सप्तविंशतिसंख्या वा अक्षसंख्योपदिष्यते॥१४॥
जपं कुर्वन्न कुर्वीत संख्याग्रन्थिकलङ्घनम्।
कृते जपं जपः स्यात्तु कृतेऽष्टौ च शतं जपेत्॥१५॥
१०८ बार, ५४ बार अथवा २७ बार अक्षमाला की जपसंख्या कही गयी है (इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि माला में १०८, ५४ अथवा २७ दाने हो सकते हैं)। जप करते-करते माला के सुमेरु का लङ्घन न करे। ऐसा करने से जप 'जप' होता है। १०८ बार जप करना उचित है॥१४-१५॥
साम्ब०—१७
२५८ श्रीसाम्बपुराणम्
विष्टरे चोपविष्टश्च जपं कुर्यादवेदनः ।
देवस्याभिमुखी भूत्वा संयतेनान्तरात्मना ॥१६॥
ग्रहोपरागे संप्राप्ते मेघाशनिसमुद्भवे ।
दुःस्वप्ने सागरोत्तारे समयालापभेदने ॥१७॥
उत्पातानिष्टसंप्राप्ते महापातकभाषिते ।
जपेन्मन्त्री च सावित्र्याः शतमष्टाधिकं शुचिः ॥१८॥
आसन पर बैठकर स्थिर मन से देवता की ओर मुँह करके अव्यग्र मन से जप करना चाहिये। सूर्य-चन्द्र के ग्रहण काल में, वज्रपात होने पर, दुष्ट स्वप्न देखने पर, सागर पार करते समय, कथा-भङ्ग होने पर, उत्पात अथवा अनिष्ट होने पर तथा महापातकी से बातें करने पर व्यक्ति को १०८ बार जप करना चाहिये।।१६-१८।।
एवं संक्षेपतः प्रोक्तः पुण्यो जपविधिर्मया ।
मुद्राणां लक्षणं तस्य इदानीं कथयामि ते ॥१९॥
इति श्रीसाम्बपुराणे जपविधिर्नाम सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
इस प्रकार संक्षेप में पवित्र एवं पुण्यप्रदायक पूजाविधि कही गई। अब तुमसे मुद्रासमूह का वर्णन करूँगा।।१९।।
श्री साम्बपुराणोक्त जपविधिनामक सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त
अष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(मुद्रालक्षणम्)
नारद उवाच मुद्राणां लक्षणं सम्यगिदानीं कथयामि ते ॥१॥
नारद कहते हैं—अब तुम्हें मुद्रा का लक्षण सम्यक् रूप से बतलाता हूँ॥१॥
देव उवाच
करं शिखासु विन्यस्य अरुणादीन् यथाक्रमम्।
विजयं वा मूलमन्त्रमुद्राबन्धं समाचरेत् ॥२॥
लग्नस्य पृष्ठमध्यास्ये ईषद्गुप्ते तु तर्जनी।
तिर्यग् विन्यसेदङ्गुष्ठे शिरः कां ते त्वनायिके ॥३॥
कनिष्ठिके समे तुङ्गे पृष्ठलग्ने उभे अपि।
एषा विश्वात्मनो मुद्रा रथस्य परिकीर्तिताः ॥४॥
सूर्यदेव कहते हैं—कर (हथेली) तथा शिखा विन्यस्त करके अरुण प्रभृति का यथाक्रम से विजय, मूल मन्त्र तथा मुद्राबन्ध आचरण करना चाहिये। तर्जनीद्वय को तनिक भीतर छिपाकर उन्हें अंगुष्ठ में तिर्यक् रूप से विन्यास करे तथा अनामिका को ऊपर रखे। कनिष्ठ दोनों अंगुलियों को समान रूप से ऊपर करके पृष्ठ की ओर सटाये। इसे विश्वात्मा के रथ की मुद्रा कही गई है॥२-४॥
मध्यमानामिकानां च संपुष्टाङ्गुष्ठयोर्द्वयोः।
कुर्वीत शेषानुत्तुङ्गान् मुद्रेयं वाजिनां स्मृता ॥५॥
दोनों हाथों की मध्यमा तथा अनामिका को दोनों अंगूठे के साथ जोड़कर अंगुलियों को ऊर्ध्व में करने को अश्वदेव मुद्रा कहा गया है॥५॥
फणिभोगनिभाः कार्याः सव्यदक्षिणहस्ततः।
चक्रं बलात्तलांतुल्यो करयोर्भग्नमूलयोः ॥६॥
पृष्ठलग्नौ करौ कृत्वा प्रगुणे तर्जनीसमे।
कनिष्ठके क्रोडलग्ने अङ्गुष्ठौ तु समौ युतौ ॥७॥
शिखाश्चलास्तु कुटिलाः संक्रोडाभिमुखागताः।
इयं मुद्रा समुद्दिष्टा ह्यरुणस्य विधानतः ॥८॥
२६० श्रीसाम्बपुराणम्
बाँयें तथा दाहिने हाथ को सर्प के देह के समान करना चाहिये। चक्र के समान दोनों हाथ भग्नमूल हो। करद्वय को पृष्ठदेश की ओर सटाकर तर्जनीद्वय को समान करे। कनिष्ठा अंगुली को क्रोड़लग्न करके दोनों अंगूठों को समान भाव से युक्त करे। चंचल तथा कुटिल शिखा क्रोड़ के अभिमुख रहेगी। इसे यथाविधान अरुण मुद्रा कहा गया है।।६-८।।
अष्टौ रणौ रवीन्द्रौ च लग्नान्यङ्गानि पूर्वगौ।
अरुणेन्द्रौ रविस्त्वष्टा एता मुद्राः पृथक्-पृथक् ॥९॥
आठ रणु (?) रवि तथा इन्द्र (?) अंगों को (?) पूर्वमुख लग्न करे। अरुण, इन्द्र रवि तथा त्वष्टा—यह पृथक्-पृथक् मुद्रा है।।९।।
नैवान्योन्यलग्नाः स्युः शेषायामक्रियाः स्मृताः।
यमसूर्यौ मिथः श्लिष्टावंशुमत्स्वर्णरेतसा ॥१०॥
ऊर्ध्वगौरविधातारौ युताविन्दुगभस्तिनौ।
यमस्य मूललग्नौ तु तथा त्वष्टारुणावुभौ ॥११॥
कोई भी परस्परतः लग्न न हो। अवशिष्ट (बाकी को) व्योमक्रिया जाने। यम तथा सूर्य दोनों परस्पर युक्त हों। यह किरणमय स्वर्ण के समान है। रवि एवं धाता ऊर्ध्वगामी हैं, चन्द्र तथा सूर्य युक्त हैं और त्वष्टा तथा अरुण यम के मूल में लग्न हैं।।१०-११।।
अन्तस्तु सूर्यारुणयोर्लग्नस्त्वष्टा त्वधोमुखः ॥१२॥
वाममुष्टौ सदा लग्नौ शेषाः शिर उदाहृताः।
अन्योन्यं तर्जनीलग्नौ तुङ्गेष्ठौ च तद्युतौ ॥१३॥
इसे अमृत कहा गया है। रथ के साथ हृदय के समान शेष भाग सूर्य तथा अरुण का है। निम्नमुख से त्वष्टा लग्न हैं। वाम मुष्टि सभी समय लग्न रहती है। शेष को मस्तक कहा गया है। परस्पर तर्जनी लग्न हो। तुङ्ग तथा ओष्ठ उसके साथ युक्त हों।।१२-१३।।
अन्योन्यं रन्ध्रगाः श्लिष्टाः शेषभग्नाः शिखाः स्मृताः।
अन्योन्या न च संलग्ना दिवसंघा वरुणादयः ॥१४॥
करमूलपृथग्भूता नेत्रानेत्राकृतिः स्मृताः।
उत्तानवाहमस्ते तु दृष्टं कृत्वा ह्यधोमुखम् ॥१५॥
परस्परतः रन्ध्रगत होकर युक्त रहते हैं। अवशिष्ट शिखा को भग्न कहा गया है। वरुण प्रभृति द्युलोकवासी देवगण परस्परतः संलग्न रहते हैं। कर तथा करमूल को पृथक् रूप से नेत्र तथा नेत्र की आकृति कहा गया है। बाँयें हाथ को उत्तान (चित्त) कर मुख नीचा करके देखा जाता है।।१४-१५।।
अष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २६१
अंगुष्ठे तर्जनी लग्ने प्रगुणे करमूलयोः।
अन्योन्यक्रोडसंलग्ना ह्यर्चाः शेषाः सुकुञ्चिताः ॥१६॥
मुद्रा कवचसंज्ञेयं मया वः परिकीर्तिता।
रविन्दुमूलादारभ्य ऊर्ध्वं त्वष्टारुणावुभौ ॥१७॥
अंगुष्ठ को तर्जनी से सटाये। करमूल में स्थापित करे। परस्पर क्रोड़ संलग्न करके अवशिष्ट को कुञ्चित करके अर्चना करे। इसका नाम है—मुद्रा कवच। यह मैंने तुमसे कहा। रवि तथा चन्द्र के मूल से प्रारम्भ करके ऊर्ध्व में त्वष्टा तथा अरुण को जानना चाहिये।।१६-१७।।
स्पृशेदग्रान्नतान्सर्वांन्नतांश्चैव समाक्षिपेत्।
कुञ्चितानामिकाग्रं च ह्यङ्गुष्ठाग्रेण योजयेत् ॥१८॥
अग्र तथा नत, सबका स्पर्श करे। नत को आक्षिप्त करे। अनामिका के अग्रभाग को कुञ्चित करे एवं अंगुष्ठ के अग्रभाग से लग्न करे।।१८।।
कुर्याच्छेषान् समुत्तुङ्गान् वसुमुद्रा उदीरिताः।
अधोमुखे वामकरे कृत्तोत्तानं तु दक्षिणम् ॥१९॥
अरुणो रविरिन्द्रश्च चन्द्रस्त्वष्टारमाक्रमेत्।
यमांशमत्तावुत्तुङ्गे गुल्फौ क्रोड़ेन सङ्गतौ ॥२०॥
अवशिष्ट अंगुलियों को ऊर्ध्व में उत्तोलित करे। यह है—वसुमुद्रा। बाँयाँ हाथ नीचे करे। दक्षिण हाथ (दाहिना हाथ) उत्तान (चित्त) करे। अरुण, रवि, इन्द्र तथा चन्द्र, त्वष्टा पर आक्रमण करके रहें। यमांशुमत्त (?) उत्तुङ्ग में तथा दोनों गुल्फ क्रोड़ में मिलित हो।।१९-२०।।
अन्योऽन्यं रंध्रनिर्याताः शेषाः श्लिष्टाश्च कुञ्चिताः।
कृत्वा दक्षिणहस्तस्य तथाङ्गुष्ठं समुन्नतम् ॥२१॥
परस्परतः कुछ फांक देकर (अलग करके) बहिर्गत होकर शेष को कुञ्चित (टेढ़ा) तथा परस्पर युक्त करके दाहिने हाथ के अंगूठे को उन्नत करे।।२१।।
योधा वै करतले चैव चत्वारो दण्ड उच्यते।
शक्त्याप्येवं प्रकुर्वीत स सूर्यं स्वणरितसम् ॥२२॥
करतल को योधा तथा चारो को दण्ड कहा जाता है। शक्ति द्वारा ऐसा करने से सूर्य हैं—स्वणरिता।।२२।।
लग्नतुङ्गं समाख्याता खड्गमुद्रा विधानतः।
अरुणास्यं न संस्पृश्य सूर्यास्येन तु कुञ्चितम् ॥२३॥
२६२ श्रीसाम्बपुराणम्
वामहस्तगता भुग्नं कृत्वा करतले रविम्।
वामपाणिप्रकोष्ठं च संस्पृशेत्स्वणरितसा ॥२४॥
लग्नतुङ्ग को विधानपूर्वक खड्गमुद्रा कहते हैं। अरुण के मुख का स्पर्श किये बिना सूर्यमुख द्वारा कुञ्चित करे। बाँयें हाथ के करतल को टेढ़ा करके रवि को वाम हाथ के प्रकोष्ठ में स्वणरित के द्वारा स्पर्श करे॥२३-२४॥
त्वष्टास्ये दक्षिणाशेषा नीलास्याश स उच्यते।
शक्तिं वामनतामीयात्कुर्वन्नङ्कुश उच्यते ॥२५॥
ईषत्तु कुञ्चिताग्रस्य स्वस्थौ दक्षिणहस्तगाः।
पतितौ यतधातारौ पृष्ठलग्नौ समुत्थितौ ॥२६॥
त्वष्टा के मुख में दक्षिणाशेष को नीलास्याश कहते हैं। शक्ति को बाँयीं ओर नत करके जो स्थिति होती है, वह अंकुश कहलाती है। दाहिने हाथ के अग्रभाग को तनिक कुञ्चित करने से उससे पतित धाताद्वय पृष्ठलग्न होकर उत्थित होते हैं॥२५-२६॥
क्रोडलग्नौ समुत्तुङ्गौ शेषाः षट्त्रिंश उच्यते।
त्वष्टारुणौ न चोत्तानौ रवीन्द्रौ क्रान्तमस्तकौ ॥२७॥
क्रोड लग्न दोनों के समुत्तुङ्ग जो शेष है, उसे षट्त्रिंश कहा जाता है। त्वष्टा एवं अरुण उत्तान (चित्त) नहीं होते। रवि तथा इन्द्र मस्तक का अतिक्रम करते हैं॥२७॥
यमस्तथैव सूर्येण अंशुमान्स्वणरितसा।
उभौ गभस्तिधातारौ पृष्ठलग्नौ समुच्छ्रितौ ॥२८॥
मुद्रा व्योमशिखा नाम कथितेयं विधानतः।
एतन्मया समुद्दिष्टं मुद्राणां लक्षणं शुभम् ॥२९॥
येन सम्यक् प्रयुक्तेन परां सिद्धिमवाप्नुयात् ॥३०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मुद्रालक्षणं नामाष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
इसी प्रकार यम भी सूर्य के साथ स्वणरित द्वारा किरणयुक्त हो जाते हैं। दोनों ही किरण धारणकारी हैं। ये पृष्ठ देश से संलग्न होकर उत्थित होते हैं। इसे विधानपूर्वक व्योमशिखा कहा गया है। यह मैंने मुद्राओं का शुभ लक्षण कहा। सम्यक् रूप से प्रयुक्त होने पर इससे परमसिद्धि प्राप्त होती है॥२८-३०॥
श्री साम्बपुराणोक्त मुद्रा लक्षण नामक अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त