साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ श्रीसाम्बपुराणम्
वामहस्तगता भुग्नं कृत्वा करतले रविम्।
वामपाणिप्रकोष्ठं च संस्पृशेत्स्वणरितसा ॥२४॥
लग्नतुङ्ग को विधानपूर्वक खड्गमुद्रा कहते हैं। अरुण के मुख का स्पर्श किये बिना सूर्यमुख द्वारा कुञ्चित करे। बाँयें हाथ के करतल को टेढ़ा करके रवि को वाम हाथ के प्रकोष्ठ में स्वणरित के द्वारा स्पर्श करे॥२३-२४॥
त्वष्टास्ये दक्षिणाशेषा नीलास्याश स उच्यते।
शक्तिं वामनतामीयात्कुर्वन्नङ्कुश उच्यते ॥२५॥
ईषत्तु कुञ्चिताग्रस्य स्वस्थौ दक्षिणहस्तगाः।
पतितौ यतधातारौ पृष्ठलग्नौ समुत्थितौ ॥२६॥
त्वष्टा के मुख में दक्षिणाशेष को नीलास्याश कहते हैं। शक्ति को बाँयीं ओर नत करके जो स्थिति होती है, वह अंकुश कहलाती है। दाहिने हाथ के अग्रभाग को तनिक कुञ्चित करने से उससे पतित धाताद्वय पृष्ठलग्न होकर उत्थित होते हैं॥२५-२६॥
क्रोडलग्नौ समुत्तुङ्गौ शेषाः षट्त्रिंश उच्यते।
त्वष्टारुणौ न चोत्तानौ रवीन्द्रौ क्रान्तमस्तकौ ॥२७॥
क्रोड लग्न दोनों के समुत्तुङ्ग जो शेष है, उसे षट्त्रिंश कहा जाता है। त्वष्टा एवं अरुण उत्तान (चित्त) नहीं होते। रवि तथा इन्द्र मस्तक का अतिक्रम करते हैं॥२७॥
यमस्तथैव सूर्येण अंशुमान्स्वणरितसा।
उभौ गभस्तिधातारौ पृष्ठलग्नौ समुच्छ्रितौ ॥२८॥
मुद्रा व्योमशिखा नाम कथितेयं विधानतः।
एतन्मया समुद्दिष्टं मुद्राणां लक्षणं शुभम् ॥२९॥
येन सम्यक् प्रयुक्तेन परां सिद्धिमवाप्नुयात् ॥३०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मुद्रालक्षणं नामाष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
इसी प्रकार यम भी सूर्य के साथ स्वणरित द्वारा किरणयुक्त हो जाते हैं। दोनों ही किरण धारणकारी हैं। ये पृष्ठ देश से संलग्न होकर उत्थित होते हैं। इसे विधानपूर्वक व्योमशिखा कहा गया है। यह मैंने मुद्राओं का शुभ लक्षण कहा। सम्यक् रूप से प्रयुक्त होने पर इससे परमसिद्धि प्राप्त होती है॥२८-३०॥
श्री साम्बपुराणोक्त मुद्रा लक्षण नामक अड़तालीसवाँ अध्याय समाप्त