भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 424 में से

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(शौचादिविधानम्)

नारद उवाच

शौचं स्नानं करन्यासं रवीकरणमाह्निकम्।
योगज्ञानं विशेषेण तस्य च शृणु देवताः ॥१॥
दीक्षितायार्कभक्त्या तु श्रद्दधानाय धीमते।
कथनीयमिदं शास्त्रं सद्यः सर्वार्थसाधनम् ॥२॥
शुचौ देशे समासीनः कुर्यादाचम्यकं विधिम्।
कृत्वावगुण्ठनं मौनी कुर्वन्नभिमुखः स्थितः ॥३॥
स मृज्जलाभ्यां शौचं तु कुर्वति प्रागुदङ्मुखः।
भूताग्निदिग्वारणैश्च ह्यधःपादगुदादितः ॥४॥
करान्तरिततोयेन कार्यं पादावनेजनम्।
मृत्पूर्वकं तथा पाणिं प्रक्षाल्यन्तकोष्ठतः ॥५॥

नारद कहते हैं—शौच, स्नान, करन्यास, रवीकरण, आह्निक तथा योगस्थान के साथ-साथ विशेषतः इनके देवता का वर्णन सुनो। दीक्षित, श्रद्धाशील, बुद्धिमान सूर्यभक्त को सद्यः सर्वार्थ-साधक इस शास्त्र का वर्णन कर देना चाहिये। पवित्र स्थान में समासीन होकर आचमन विधि का अनुष्ठान करे। अवगुंठन करके मौनी होकर सामने की ओर मुख करके रहे। पूर्व तथा उत्तर-मुखीन होकर भूताग्नि एवं दिग्वारण के पैर तथा गुह्यदेशादि का मृत्तिका एवं जल के द्वारा शौच-विधान करे। हाथ में लिये जल द्वारा पाद- प्रक्षालन करे। इसी प्रकार हाथ तथा अन्तःप्रकोष्ठ का मृत्तिका तथा जल से प्रक्षालन करना चाहिये॥१-५॥

उपवीती जलं प्राश्य ब्रह्मतीर्थेन वा पिवेत्।
ह्रदं द्विर्वचनं मृद्य खानि सर्वाण्युपस्पृशेत् ॥६॥

उपवीतधारी व्यक्ति जल लेकर आचमन करे अथवा पुष्कर तीर्थ के जल का पान करे। हृदय का दो बार मृत्तिका से स्पर्श करे तथा आकाश के अतिरिक्त सबका स्पर्श करे॥६॥

भूयोऽर्कधर्महृदयैस्त्रिः प्राश्याथ जलं पिवेत्।
शिरश्च वदनं मृज्य शिखाग्रान् खान्युपस्पृशेत् ॥७॥

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