साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २६१
अंगुष्ठे तर्जनी लग्ने प्रगुणे करमूलयोः।
अन्योन्यक्रोडसंलग्ना ह्यर्चाः शेषाः सुकुञ्चिताः ॥१६॥
मुद्रा कवचसंज्ञेयं मया वः परिकीर्तिता।
रविन्दुमूलादारभ्य ऊर्ध्वं त्वष्टारुणावुभौ ॥१७॥
अंगुष्ठ को तर्जनी से सटाये। करमूल में स्थापित करे। परस्पर क्रोड़ संलग्न करके अवशिष्ट को कुञ्चित करके अर्चना करे। इसका नाम है—मुद्रा कवच। यह मैंने तुमसे कहा। रवि तथा चन्द्र के मूल से प्रारम्भ करके ऊर्ध्व में त्वष्टा तथा अरुण को जानना चाहिये।।१६-१७।।
स्पृशेदग्रान्नतान्सर्वांन्नतांश्चैव समाक्षिपेत्।
कुञ्चितानामिकाग्रं च ह्यङ्गुष्ठाग्रेण योजयेत् ॥१८॥
अग्र तथा नत, सबका स्पर्श करे। नत को आक्षिप्त करे। अनामिका के अग्रभाग को कुञ्चित करे एवं अंगुष्ठ के अग्रभाग से लग्न करे।।१८।।
कुर्याच्छेषान् समुत्तुङ्गान् वसुमुद्रा उदीरिताः।
अधोमुखे वामकरे कृत्तोत्तानं तु दक्षिणम् ॥१९॥
अरुणो रविरिन्द्रश्च चन्द्रस्त्वष्टारमाक्रमेत्।
यमांशमत्तावुत्तुङ्गे गुल्फौ क्रोड़ेन सङ्गतौ ॥२०॥
अवशिष्ट अंगुलियों को ऊर्ध्व में उत्तोलित करे। यह है—वसुमुद्रा। बाँयाँ हाथ नीचे करे। दक्षिण हाथ (दाहिना हाथ) उत्तान (चित्त) करे। अरुण, रवि, इन्द्र तथा चन्द्र, त्वष्टा पर आक्रमण करके रहें। यमांशुमत्त (?) उत्तुङ्ग में तथा दोनों गुल्फ क्रोड़ में मिलित हो।।१९-२०।।
अन्योऽन्यं रंध्रनिर्याताः शेषाः श्लिष्टाश्च कुञ्चिताः।
कृत्वा दक्षिणहस्तस्य तथाङ्गुष्ठं समुन्नतम् ॥२१॥
परस्परतः कुछ फांक देकर (अलग करके) बहिर्गत होकर शेष को कुञ्चित (टेढ़ा) तथा परस्पर युक्त करके दाहिने हाथ के अंगूठे को उन्नत करे।।२१।।
योधा वै करतले चैव चत्वारो दण्ड उच्यते।
शक्त्याप्येवं प्रकुर्वीत स सूर्यं स्वणरितसम् ॥२२॥
करतल को योधा तथा चारो को दण्ड कहा जाता है। शक्ति द्वारा ऐसा करने से सूर्य हैं—स्वणरिता।।२२।।
लग्नतुङ्गं समाख्याता खड्गमुद्रा विधानतः।
अरुणास्यं न संस्पृश्य सूर्यास्येन तु कुञ्चितम् ॥२३॥