साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 270, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० श्रीसाम्बपुराणम्
बाँयें तथा दाहिने हाथ को सर्प के देह के समान करना चाहिये। चक्र के समान दोनों हाथ भग्नमूल हो। करद्वय को पृष्ठदेश की ओर सटाकर तर्जनीद्वय को समान करे। कनिष्ठा अंगुली को क्रोड़लग्न करके दोनों अंगूठों को समान भाव से युक्त करे। चंचल तथा कुटिल शिखा क्रोड़ के अभिमुख रहेगी। इसे यथाविधान अरुण मुद्रा कहा गया है।।६-८।।
अष्टौ रणौ रवीन्द्रौ च लग्नान्यङ्गानि पूर्वगौ।
अरुणेन्द्रौ रविस्त्वष्टा एता मुद्राः पृथक्-पृथक् ॥९॥
आठ रणु (?) रवि तथा इन्द्र (?) अंगों को (?) पूर्वमुख लग्न करे। अरुण, इन्द्र रवि तथा त्वष्टा—यह पृथक्-पृथक् मुद्रा है।।९।।
नैवान्योन्यलग्नाः स्युः शेषायामक्रियाः स्मृताः।
यमसूर्यौ मिथः श्लिष्टावंशुमत्स्वर्णरेतसा ॥१०॥
ऊर्ध्वगौरविधातारौ युताविन्दुगभस्तिनौ।
यमस्य मूललग्नौ तु तथा त्वष्टारुणावुभौ ॥११॥
कोई भी परस्परतः लग्न न हो। अवशिष्ट (बाकी को) व्योमक्रिया जाने। यम तथा सूर्य दोनों परस्पर युक्त हों। यह किरणमय स्वर्ण के समान है। रवि एवं धाता ऊर्ध्वगामी हैं, चन्द्र तथा सूर्य युक्त हैं और त्वष्टा तथा अरुण यम के मूल में लग्न हैं।।१०-११।।
अन्तस्तु सूर्यारुणयोर्लग्नस्त्वष्टा त्वधोमुखः ॥१२॥
वाममुष्टौ सदा लग्नौ शेषाः शिर उदाहृताः।
अन्योन्यं तर्जनीलग्नौ तुङ्गेष्ठौ च तद्युतौ ॥१३॥
इसे अमृत कहा गया है। रथ के साथ हृदय के समान शेष भाग सूर्य तथा अरुण का है। निम्नमुख से त्वष्टा लग्न हैं। वाम मुष्टि सभी समय लग्न रहती है। शेष को मस्तक कहा गया है। परस्पर तर्जनी लग्न हो। तुङ्ग तथा ओष्ठ उसके साथ युक्त हों।।१२-१३।।
अन्योन्यं रन्ध्रगाः श्लिष्टाः शेषभग्नाः शिखाः स्मृताः।
अन्योन्या न च संलग्ना दिवसंघा वरुणादयः ॥१४॥
करमूलपृथग्भूता नेत्रानेत्राकृतिः स्मृताः।
उत्तानवाहमस्ते तु दृष्टं कृत्वा ह्यधोमुखम् ॥१५॥
परस्परतः रन्ध्रगत होकर युक्त रहते हैं। अवशिष्ट शिखा को भग्न कहा गया है। वरुण प्रभृति द्युलोकवासी देवगण परस्परतः संलग्न रहते हैं। कर तथा करमूल को पृथक् रूप से नेत्र तथा नेत्र की आकृति कहा गया है। बाँयें हाथ को उत्तान (चित्त) कर मुख नीचा करके देखा जाता है।।१४-१५।।