साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(मुद्रालक्षणम्)
नारद उवाच मुद्राणां लक्षणं सम्यगिदानीं कथयामि ते ॥१॥
नारद कहते हैं—अब तुम्हें मुद्रा का लक्षण सम्यक् रूप से बतलाता हूँ॥१॥
देव उवाच
करं शिखासु विन्यस्य अरुणादीन् यथाक्रमम्।
विजयं वा मूलमन्त्रमुद्राबन्धं समाचरेत् ॥२॥
लग्नस्य पृष्ठमध्यास्ये ईषद्गुप्ते तु तर्जनी।
तिर्यग् विन्यसेदङ्गुष्ठे शिरः कां ते त्वनायिके ॥३॥
कनिष्ठिके समे तुङ्गे पृष्ठलग्ने उभे अपि।
एषा विश्वात्मनो मुद्रा रथस्य परिकीर्तिताः ॥४॥
सूर्यदेव कहते हैं—कर (हथेली) तथा शिखा विन्यस्त करके अरुण प्रभृति का यथाक्रम से विजय, मूल मन्त्र तथा मुद्राबन्ध आचरण करना चाहिये। तर्जनीद्वय को तनिक भीतर छिपाकर उन्हें अंगुष्ठ में तिर्यक् रूप से विन्यास करे तथा अनामिका को ऊपर रखे। कनिष्ठ दोनों अंगुलियों को समान रूप से ऊपर करके पृष्ठ की ओर सटाये। इसे विश्वात्मा के रथ की मुद्रा कही गई है॥२-४॥
मध्यमानामिकानां च संपुष्टाङ्गुष्ठयोर्द्वयोः।
कुर्वीत शेषानुत्तुङ्गान् मुद्रेयं वाजिनां स्मृता ॥५॥
दोनों हाथों की मध्यमा तथा अनामिका को दोनों अंगूठे के साथ जोड़कर अंगुलियों को ऊर्ध्व में करने को अश्वदेव मुद्रा कहा गया है॥५॥
फणिभोगनिभाः कार्याः सव्यदक्षिणहस्ततः।
चक्रं बलात्तलांतुल्यो करयोर्भग्नमूलयोः ॥६॥
पृष्ठलग्नौ करौ कृत्वा प्रगुणे तर्जनीसमे।
कनिष्ठके क्रोडलग्ने अङ्गुष्ठौ तु समौ युतौ ॥७॥
शिखाश्चलास्तु कुटिलाः संक्रोडाभिमुखागताः।
इयं मुद्रा समुद्दिष्टा ह्यरुणस्य विधानतः ॥८॥