साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५८ श्रीसाम्बपुराणम्
विष्टरे चोपविष्टश्च जपं कुर्यादवेदनः ।
देवस्याभिमुखी भूत्वा संयतेनान्तरात्मना ॥१६॥
ग्रहोपरागे संप्राप्ते मेघाशनिसमुद्भवे ।
दुःस्वप्ने सागरोत्तारे समयालापभेदने ॥१७॥
उत्पातानिष्टसंप्राप्ते महापातकभाषिते ।
जपेन्मन्त्री च सावित्र्याः शतमष्टाधिकं शुचिः ॥१८॥
आसन पर बैठकर स्थिर मन से देवता की ओर मुँह करके अव्यग्र मन से जप करना चाहिये। सूर्य-चन्द्र के ग्रहण काल में, वज्रपात होने पर, दुष्ट स्वप्न देखने पर, सागर पार करते समय, कथा-भङ्ग होने पर, उत्पात अथवा अनिष्ट होने पर तथा महापातकी से बातें करने पर व्यक्ति को १०८ बार जप करना चाहिये।।१६-१८।।
एवं संक्षेपतः प्रोक्तः पुण्यो जपविधिर्मया ।
मुद्राणां लक्षणं तस्य इदानीं कथयामि ते ॥१९॥
इति श्रीसाम्बपुराणे जपविधिर्नाम सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
इस प्रकार संक्षेप में पवित्र एवं पुण्यप्रदायक पूजाविधि कही गई। अब तुमसे मुद्रासमूह का वर्णन करूँगा।।१९।।
श्री साम्बपुराणोक्त जपविधिनामक सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त