भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५७

वाचिक, कायिक तथा मानसिक रूप से त्रिविध जप कहा जाता है। शत-सहस्र तथा अयुत (जपसंख्या से) जप करे। उसका फल भी तीन प्रकार से कहा गया है। मणि द्वारा जप से अर्धलक्ष गुना, रुद्राक्ष से अयुत गुना (माला), पद्म द्वारा आठ हजार गुना तथा कुश आदि (दर्भ) की माला से जप करने से चार हजार गुना फल प्राप्त होता है॥७-८॥

जपे कृते प्रवालेन फलमानन्त्यमुच्यते।
हेम्ना कोटिगुणं प्रोक्तं लक्षं मुक्ताफलैः स्मृतम्॥९॥
अरिष्टाक्षाज्जपात्तस्य फलं साहस्रकं भवेत्।
शतानि जीवकैः पञ्च शङ्खे शतगुणं भवेत्॥१०॥

प्रवाल द्वारा जप करने से अनन्त गुना फल मिलता है। स्वर्ण माला से जप करने पर करोड़ों गुना फल एवं मुक्ता की माला से जप करने से लक्ष गुना फल मिलता है। अरिष्टाक्ष माला के जप से हजार गुना फल, जीवक की माला से जप करने से ५०० गुना फल तथा शङ्ख की माला से जप करने पर सौ गुणित फल मिलता है॥९-१०॥

जपं कुर्वन् यदि ष्ठीवेज्जल्पेद्विजृम्भतेऽपि वा।
आचमेद् भुवि विन्यस्य स्पृशेदम्भोऽथ गोमये॥११॥
अक्षसूत्रं निपतेद् भूमौ चेत्कुर्वतो जपम्।
उद्धारं तस्य कुर्वीत जापको हृदयेन तु॥१२॥
दक्षिणाङ्गुष्ठमध्याग्रे अष्टमैकैकमादृतः।
प्रत्येकमानुपूर्व्येण कर्षयन् जपमारभेत्॥१३॥

यदि जप करते-करते व्यक्ति थूकता है, अनर्थक बातें बोलता है, जंभाई लेता है, तब आचमन करके मिट्टी, जल तथा गोबर का स्पर्श करना चाहिये। जप करते-करते यदि अक्षसूत्र मिट्टी में गिर जाता है तब जपकारी हृदय से उसका उद्धार करे। दाहिने अंगूठा तथा मध्यमा उंगली के अगले भाग से एक-एक करके आठ में से सादर एक-एक को खींचते हुये (फेरते हुये) जप करे॥११-१३॥

शतमष्टाधिकं चैव चतुःपञ्चाशदेव च।
सप्तविंशतिसंख्या वा अक्षसंख्योपदिष्यते॥१४॥
जपं कुर्वन्न कुर्वीत संख्याग्रन्थिकलङ्घनम्।
कृते जपं जपः स्यात्तु कृतेऽष्टौ च शतं जपेत्॥१५॥

१०८ बार, ५४ बार अथवा २७ बार अक्षमाला की जपसंख्या कही गयी है (इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि माला में १०८, ५४ अथवा २७ दाने हो सकते हैं)। जप करते-करते माला के सुमेरु का लङ्घन न करे। ऐसा करने से जप 'जप' होता है। १०८ बार जप करना उचित है॥१४-१५॥

साम्ब०—१७