साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(जपविधिः)
नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि जपयज्ञविधिक्रमम्।
यैर्यत्नैः सर्वथा चैव कर्तव्यः कथयामि ते॥१॥
सर्वेषामेव यज्ञानां जपयज्ञो विशिष्यते।
कृतेन विधिनानेन प्रीतो भवति भास्करः॥२॥
यदन्यत् कुरुते कर्म यदि वा न करोति च।
कृतेन जपयज्ञेन परां सिद्धिमवाप्नुयात्॥३॥
महद्भिः पातकैर्युक्ता ये चान्ये कार्यकारिणः।
खखोल्कजाप्यान्मुच्यन्ते सर्वे तैस्तैस्तु पातकैः॥४॥
नारद कहते हैं—इसके अनन्तर जपयज्ञ की विधि तथा क्रम कहूँगा, जिसे सयत्न सभी (नियमानुसार) करना होगा, यह सब तुमसे कहता हूँ। सभी यज्ञों में जपयज्ञ श्रेष्ठ है। उसे यथाविधि अनुष्ठित करने पर सूर्यदेव की कृपा मिलती है। अन्य कोई कर्म किया जाय अथवा नहीं किया जाय, केवल जपयज्ञ करने से ही परम सिद्धि मिल जाती है। जो महापातकयुक्त अन्य कर्म करते हैं, वे सभी खखोल्क (सूर्ययन्त्र सम्बन्धित) जप द्वारा पापों से मुक्त हो जाते हैं॥१-४॥
जप्यं जपन्तः संन्यासं कुर्वन्ति सुसमाहिताः।
असुरास्तं तु हिंसन्ति चान्यथा दुष्टचेतसः॥५॥
प्रवालहेममुक्ताभिर्मणिरुद्राक्षपुष्करैः।
दर्भारिष्टकजीवैश्च शङ्खेन च रविं यजेत्॥६॥
जप्य मन्त्र का जप करके सुसमाहित होकर उसका सम्यक् न्यास करना चाहिये। अन्यथा दुष्टचित्त असुरगण (असुरवृत्ति) हिंसा (अनिष्ट) कर देते हैं। प्रवाल, स्वर्ण, मुक्ता, मणि, रुद्राक्ष, पद्म, दर्भ, अरिष्टक, जीव तथा शङ्ख की माला द्वारा रवि का जप करना चाहिये॥५-६॥
शब्दकायमनोवृत्त्या स चापि त्रिविधः स्मृतः।
शतं सहस्रमयुतं तस्यापि त्रिविधं फलम्॥७॥
लक्षाद्धं चैव मणिना रुद्राक्षेणायुतं स्मृतम्।
पुष्करेणाष्टसाहस्रं दर्भैश्चैव तदर्धकम्॥८॥