साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५५
कुण्डल, अंगद प्रभृति भूषण से भूषित अप्सरागण द्वारा गीत सुनते हुये विचित्र माला तथा आभूषण से युक्त होकर सूर्यलोक जाते हैं॥३८-३९॥
तपसोऽन्ते पुनः साम्ब कुले महति जायते।
एवं यजेद्विवस्वन्तं प्रतिमासं समाहितः॥४०॥
यथाक्रमं प्रयत्नेन नामानि परिकीर्तयेत्।
मधौ मासे विष्णुरिति माधवे त्वर्यमेति च॥४१॥
शुक्रे विवस्वानिति च शुचौ मासेऽंशुमानिति।
पर्जन्यः श्रावणे मासि नभस्ये वरुणस्तथा॥४२॥
इषे त्विन्द्र इति ज्ञेयं ऊर्जे धातेति वा पुनः।
मार्गशीर्षे मित्र इति पौषे पूषेति कीर्त्यते॥४३॥
माघमासे भग इति त्वष्टा इत्येव फाल्गुने।
एवं क्रमेण तीक्ष्णांशुं नामभिः परिपूजयेत्॥४४॥
हे साम्ब! जो इस प्रकार प्रतिमास समाहित होकर सूर्य का यजन करता है, वह तपस्या के अन्त में महान् वंश में जन्म लेता है। यथाक्रम से प्रतिमास सूर्य के पृथक्-पृथक् नाम का कीर्तन करना चाहिये। चैत्र में विष्णु का, वैशाख में अर्यमा का, ज्येष्ठ में विवस्वान् का, आषाढ़ में अंशुमान का, श्रावण में पर्जन्य का, भाद्र में वरुण का, आश्विन में इन्द्र का, कार्तिक में धाता का, अग्रहायण में मित्र का, पौष में पूषा का, माघ में भग का तथा फाल्गुन में त्वष्टा का कीर्तन करना चाहिये। इस प्रकार सूर्य के नामों से पूजन करना चाहिये॥४०-४४॥
पुष्पार्चनविधानेन सप्तम्यां सुसमाहितः।
नैतद्देयमशिष्याय नाभक्ताय च भास्वतः॥४५॥
न च पापकृते साम्ब देयं नैवाभ्यसूयके।
पठेद्यश्चापि नियतो विधिना तं नरः सदा।
इह लोके सुखं प्राप्य सूर्यलोके महीयते॥४६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सप्तमीकल्पे षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
सप्तमी को समाहित होकर पुष्पार्चन-विधान से पूर्वोक्त नामों द्वारा पूजन करे। हे साम्ब! पाप करने वाले अथवा असूयारत व्यक्ति को यह व्रतविधान नहीं देना चाहिये। जो व्यक्ति सर्वदा इस प्रकार से पाठ करता है, वह इस लोक में सुख पाकर (मरणोपरान्त) सूर्य लोक में सम्मानित होता है॥४५-४६॥
श्री साम्बपुराणान्तर्गत सप्तमीव्रत-विधान नामक छियालीसवाँ अध्याय समाप्त