साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 264, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ श्रीसाम्बपुराणम्
सप्तैव यावत् संप्राप्ताः सप्तम्यः सप्तसद्गुणाः । अभ्यर्च्य सूर्यं सप्तम्यां माल्यधूपादिभिर्नरः ॥३०॥ भोजयित्वा द्विजान् भक्त्या प्राप्नुयात् स्वर्गमक्षयम् । सप्तम्यां विप्रमुख्येभ्यो वस्तु यद्यत् प्रयच्छति ॥३१॥ तत्तदक्षयमाप्नोति सूर्यलोकं स गच्छति । इति ते कीर्तितः साम्ब सप्तम्या विधिरुत्तमः ॥३२॥
सात गुणान्वित सात सप्तमी व्रत जब अनुष्ठित हो जाता है, उस सप्तम सप्तमी को माला-धूप आदि से सूर्य की अर्चना करके भक्ति से ब्राह्मणों को भोजन कराने से अक्षय स्वर्ग मिलता है। सप्तमी को श्रेष्ठ ब्राह्मणों को जो-जो वस्तु दान में दिया जाता है, वह अक्षय हो जाता है (दान अक्षय हो जाता है)। वह व्यक्ति सूर्यलोक प्राप्त करता है। हे साम्ब! इस प्रकार तुमसे उत्तम तिथि सप्तमी का वर्णन किया॥३०-३२॥
भूय एवाभिधानस्य शृणुष्वैकाग्रमानसः । यः कुर्याद् गोमयाहारः शुक्ला द्वादशीसप्तमी ॥३३॥ अथवा यवकाहारः शीर्णपत्राशनोऽथवा । क्षीराशी चैकभक्तोऽथ भिक्षाहारोऽथवा पुनः ॥३४॥ जलाहारोऽपि वा विद्वान् पूजयित्वा दिवाकरम् । पुष्पोपहारैर्विविधैः नैवेद्यैः सुमनोहरैः ॥३५॥ नानाप्रकारैर्गन्धैश्च धूपैर्गुग्गुलचन्दनैः । कृसरैः पायसान्नाद्यैर्विविधैश्च विभूषणैः ॥३६॥ अर्चयित्वा द्विजाञ्छ्रेष्ठान् हिरण्यान्नादिभिर्नरः । स यत्फलमवाप्नोति तच्छृणुष्व समाहितः ॥३७॥
और भी कहता हूँ, एकाग्र होकर सुनो। जो गोमय का भक्षण करके शुक्ल पक्ष की द्वादशी को सप्तमी व्रत का अनुष्ठान करते हैं (?) अथवा यवक आहार, शुष्क पत्ते का आहार अथवा दुग्ध पीकर रहते हैं, अथवा मात्र एक बार भोजन अथवा भिक्षा का आहार करते हैं, अथवा केवल जल पीकर जो विद्वान् पुष्पोपहार, विविध मनोहर नैवेद्य, खिचड़ी, पायस, अन्नादि तथा विविध आभूषणों से सूर्य की पूजा करते हैं, श्रेष्ठ ब्राह्मणों की अन्नादि से अर्चना करते हैं, वे जो फल प्राप्त करते हैं, उसे समाहित होकर सुनो॥३३-३७॥
काञ्चनेन विमानेन मनो मारुतरंहसा । वैडूर्यमणिरत्नेन किङ्किणीजालमालिना ॥३८॥ कुण्डलाङ्गदभूषाढ्यैर्गीयमानोऽप्सरोगणैः । विचित्रमालाभरणैः स याति सूर्यलोकताम् ॥३९॥
मनोहर वायु की गति से स्वर्णमय विमान में वैदूर्य मणि रत्न, किङ्किणी जाल,