साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५३
जो भक्त संयतेन्द्रिय होकर लोकपालक सूर्य का व्रत करते हैं, वे प्रचुर दक्षिणायुक्त यज्ञों का फल प्राप्त करते हैं।।२१।।
व्रतैरेवंविधैस्त्वन्यैस्तपोभिस्तु सुदुष्करैः।
कर्मभिः शमनैर्वापि दानहोमजपैरपि ॥२२॥
यत्फलं समवाप्नोति चरित्वा सप्तमीव्रतम्।
सूर्यलोकेषु नियतं वासो नैवात्र संशयः॥२३॥
इस प्रकार से अन्यान्य व्रत, सुदुष्कर तप, कर्मों का शमन, दान, होम तथा जप से जो फल प्राप्त होता है, वही फल सप्तमी व्रतानुष्ठान से भी प्राप्त हो जाता है। वह निःसंदिग्ध रूप से सूर्यलोक में वास करता है।।२२-२३।।
ब्रह्मेन्द्ररुद्रलोकेषु तस्याप्रतिहता गतिः।
नान्धः कुष्ठी न च क्लीबो व्यङ्गो नापि च निर्धनः ॥२४॥
कुले तस्य भवेत् कश्चिद्यश्चरेत् सप्तमीव्रतम्।
नारीहस्त्यश्वयानानां विविधानां च वाससाम् ॥२५॥
ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक तथा रुद्रलोक में उसकी अप्रतिहत गति हो जाती है। उसके वंश में कोई भी अन्धा, कुष्ठी, क्लीब, अंगहीन अथवा निर्धन व्यक्ति जन्म नहीं लेता (जो सप्तमी व्रतानुष्ठान करता है, उसके वंश की बात कही गयी है)। सप्तमी व्रतकारी को नारी, हाथी, अश्वादि यान, विविध वस्त्र भोगार्थ प्राप्त होते हैं।।२४-२५।।
ध्रुवं स भाजनं साम्ब यश्चरेत् सप्तमीव्रतम्।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥२६॥
भार्यार्थी रूपसम्पन्नां लभेद् भार्यां कुलोद्भवाम्।
पुत्रार्थी श्रुतसम्पन्नांल्लभेत् पुत्रांश्चिरायुषः ॥२७॥
विद्यार्थी को विद्या एवं धनार्थी को धन मिलता है। भार्यार्थी को भार्या जो रूपसम्पन्न एवं सद्वंश में उत्पन्न है, प्राप्त होती है। पुत्रार्थी दीर्घायु पुत्रों को प्राप्त करता है।।२६-२७।।
भोगार्थी लभते भोगान् व्रतेनानेन यादव।
मोहात् प्रमादाल्लोभाद्वा व्रतभङ्गं समाचरेत् ॥२८॥
त्रिरात्रं न तु भुञ्जीत कुर्याद्वा केशमुण्डनम्।
प्रायश्चित्तमिदं कृत्वा पुनरेव व्रती भवेत् ॥२९॥
हे यादव! इस व्रत से भोगार्थी समस्त भोगों को प्राप्त करते हैं। यदि मोह से, प्रमाद से अथवा लोभ से व्रतभंग हो जाय, तब दिन-रात भोजन न करे अथवा बाल का मुण्डन कराये। ऐसे प्रायश्चित्त को करके पुनः व्रतानुष्ठान करना चाहिये।।२८-२९।।