भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २५१

सर्वासु ब्रह्मचारी स्याच्छौचयुक्तो जितेन्द्रियः ।
सूर्यार्चनपरो दान्तो जपहोमसमन्वितः ॥७॥
पञ्चम्यामेव पुरुषः कुर्यान्नियसिमात्मनः ।
षष्ठ्यां न मैथुनं गच्छेन्मधुमांसानि वर्जयेत् ॥८॥

सभी सप्तमियों में ब्रह्मचारी होकर, शौचयुक्त होकर, जितेन्द्रिय रहकर सूर्य के अर्चनपरायण होकर यम, बहिरिन्द्रिय संयत (दान्त) होकर जप तथा होमपरायण हो जाय। पञ्चम सप्तमी को आत्मसंयम करे। षष्ठ सप्तमी को मैथुन-मधु तथा मांस का वर्जन करना चाहिये॥७-८॥

अर्कसम्पुटमेकैकं प्रथमायां विधानवित् ।
अन्यदत्तमभुञ्जानः सप्तम्यां भक्षयेन्नरः ॥९॥
एकैकवृद्धानि पुनर्मरिचानि च भक्षयेत् ।
तथैव निम्बपत्राणि परमं व्रतमास्थितः ॥१०॥

विधान का ज्ञाता व्यक्ति अर्कसम्पुट के एक-एक में (?) प्रथमतः दूसरे के द्वारा दिया भक्षण न करके (?) सप्तमी को भक्षण करे। इसका तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि अर्कसम्पुट सप्तमी को अन्य वस्तु का भक्षण न करे। द्वितीय में एक-एक की वृद्धि करके अब (अर्कसम्पुट के अनन्तर) मरिच का भक्षण करे। तृतीय में व्रत-पालनार्थ निम्ब पत्र का भक्षण करे॥९-१०॥

फलाख्यायां फलेनैव आमे नात्र विधीयते ।
अनादिन्यामोदनेन रहितमप्यनाश्नीयात् ॥११॥

फलाख्य चतुर्थ सप्तमी में फल-भक्षण द्वारा व्रत करे। इसमें बिना पकाये द्रव्य ग्रहण का विधान है। अनादिनी सप्तमी में अन्नरहित होने पर भी यहाँ भक्षण करे (क्या भक्षण करे? स्पष्ट नहीं है)॥११॥

अहोरात्रं वायुभक्षः कुर्याद्विजयसप्तमीम् ।
अथैकैकां सप्तमीं तु प्रतिपक्षे विचक्षणः ॥१२॥

दिन-रात वायु भक्षण द्वारा विजयसप्तमी व्रतानुष्ठान होता है। विचक्षण व्यक्ति प्रत्येक पक्ष में इस प्रकार का व्रत करे॥१२॥

कृत्वा विधानकुशलस्तुतः कुर्वीत कामिकाम् ।
आसां लिखित्वा नामानि पत्रकेषु पृथक्-पृथक् ॥१३॥
तानि सर्वाणि पत्राणि प्रक्षिपेन्नवके घटे ।
तदर्थं यो न जानाति बालो वान्योऽपि वा नरः ॥१४॥
तेनैवोद्धारयेदेकं तत्कुर्यादविचारयन् ।
तेनैव विधिना कुर्यात् पक्षे पक्षे विचक्षणः ॥१५॥