भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 424 में से

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एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २१९

अब दक्षिण में स्थित योगियों की पूजा करे—ॐ संस्तुताय स्वाहा अघोरः, ॐ अनन्ताय स्वाहा बड़वामुखः, ॐ क्रुद्धाय स्वाहा ऊर्ध्वरोमा, ॐ समाय स्वाहा मृत्युहस्तः, ॐ अनन्तविजयाय स्वाहा मेघनादः, ॐ स्फुरिताय स्वाहा कौस्तुभः, ॐ क्रूराय स्वाहा धूमकालः, ॐ समोनवाढ़ाय स्वाहा उग्रजिह्वः, ॐ करभाय स्वाहा मासमूर्तिः, ॐ अग्नये स्वाहा वल्कली, ॐ रक्तवर्णाय स्वाहा दिनी, ॐ सुरक्ताय स्वाहा कर्मसाक्षी। ये दक्षिण दिशा के योगी हैं।

अब पश्चिम के योगियों का पूजन करे—ॐ सरस्वत्यै स्वाहा वायुभक्षः, ॐ कारवे स्वाहा पञ्चमूर्तिः, ॐ क्रीड़ते स्वाहा अग्निपाशः, ॐ विक्रीड़ते स्वाहा पशुपतिः, ॐ हस्ताय स्वाहा महापाशः, ॐ विहन्ताय स्वाहा कृष्णदेहः, ॐ ध्रुवाय स्वाहा अमोघः, ॐ विशिखाय स्वाहा अच्युतः। ये पश्चिम के योगी हैं।

अब उत्तर स्थित योगिगण का पूजन करे—ॐ सवित्रे स्वाहा शिखिलिङ्गः, ॐ मध्यमाय स्वाहा ग्रन्थिवासः, ॐ युक्ताय स्वाहा योगवासः, ॐ खड्गिने स्वाहा त्रिशिखः, ॐ ज्येष्ठाय स्वाहा शतक्रतुः, ॐ मध्यगताय स्वाहा पञ्चशिखः, ॐ कनिष्ठाय स्वाहा सहस्रकिरणः, ॐ सर्वैराग्याय स्वाहा पद्मकेतुः, ॐ कातराय स्वाहा यज्ञरूपः, ॐ युगाय स्वाहा भुवनाधिपः, ॐ अनन्तशक्तये स्वाहा पद्मनाभः। ये उत्तर दिशा में अवस्थित हैं।

वेदोद्धृतमिदं राजन्मन्त्राकाशं पुरातनम्।
यजंस्त्रिकालमव्यग्रः सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥१॥

हे महाराज! वेद से उद्धृत तथा पुरातन मन्त्रों से सुबह, दोपहर तथा सायंकाल यजन करने से समस्त कामना पूर्ण हो जाती है॥१॥

इदमेव परं ज्ञानं कर्मयोगं च निष्कलम्।
इदं दत्तं मया तुभ्यं यथा साम्बाय भास्वते ॥२॥

यह परम ज्ञान तथा निष्कल कर्मयोग है। सूर्य ने साम्ब से जो कहा था, वह मैंने तुमसे कहा॥२॥

कृत्वा दिशां बलिं सम्यक् दिक्पालानां समाहितः।
होमं कृत्वा च तेनैव ततो ध्यानं विवस्वतः ॥३॥

समाहित होकर सब दिशाओं के दिक्पाल गण को बलि देनी चाहिये तथा पूर्वोक्त प्रकार से होम करके नीचे लिखे मन्त्रों से सूर्य का आह्वान करना चाहिये॥३॥

एह्येहि देवाकृतशब्दमूर्ते सर्वैर्वृतो यागमिमं प्रपश्य।
त्वमेव पूज्योऽसि सुरासुराणां धर्मादिवर्गस्य समीहकानाम् ॥४॥

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