भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 242

२३२ श्रीसाम्बपुराणम्

एतत्स्थानं सुरेशस्य सर्व्वैर्देवैरधिष्ठितम्।
शान्तिं पुष्टिं सुखं कामं सर्व्वभूतार्त्तिनाशनम्॥४८॥

यह स्थान देवेश सूर्यदेव का है। यहाँ सभी देवता अधिष्ठित हैं। शान्ति, पुष्टि, सुख, कामप्रदायक तथा समस्त प्राणियों की आर्त्ति का नाशक यह स्थान है॥४८॥

एतदेव हि सा कीर्त्तिः कीर्त्तिता मुनिभिः पुरा।
अत्र पश्यन्ति ये भानुमुद्यन्तं मूर्त्तिसंस्थितम्॥४९॥
तारयन्ति नराः पूता आत्मानं गोलवर्द्धनम्।
यां यां क्रियां समारभे सूर्यक्षेत्रेषु मानवः॥५०॥
तां तां सिद्धिमवाप्नोति इह लोके परत्र च।
जम्बूद्वीपो महाद्वीपः कर्मभूमिरनुत्तमः॥५१॥
यत्रेयमीदृशी कीर्त्तिर्देवेनैव प्रकीर्त्तिता।
यत्र पश्येत् सहस्त्रांशुमित्यसौ शोध्यते जनैः॥५२॥

सूर्य की इस प्रकार की कीर्त्ति की बात का मुनिगण पुराकाल से कीर्त्तन करते हैं। यहाँ मूर्त्तिस्थित उदीयमान सूर्य को जो देखते हैं, वे पवित्र लोग अपने वंश का तथा लोक का उद्धार करते हैं। लोग सूर्यक्षेत्र में जिस-जिस कार्य को प्रारम्भ करते हैं, इहलोक तथा परलोक में उनको वही-वही सिद्धि प्राप्त होती है। जम्बूद्वीप महाद्वीप है। यह श्रेष्ठ कर्मभूमि है। यहाँ सूर्यदेव ने ऐसी कीर्त्ति स्थापित की है कि यहाँ जो सहस्त्रांशु सूर्य का दर्शन करेंगे, वे शुद्ध हो जायेंगे॥४९-५२॥

एका मूर्त्तिर्द्विधा कृत्वा भूतलेष्ववतारिता।
प्रत्यूषे चैव मुण्डीरं ये पश्यन्ति नराः सकृत्॥५३॥
न कदाचिद् भयं शोको रोगस्तेषां प्रपद्यते।
कालहृत् कालप्रीत्या च मध्याह्ने ये त्ववेक्षकाः।
तेषामेव सुखोदर्को ह्यचिरेणैव जायते॥५४॥
साम्बकृतपुरे भानुः सायाह्ने यैरुदीक्षितः।
सद्यः सम्पद्यते तेषां धर्मकामार्थसाधनम्॥५५॥

एक ही मूर्त्ति पृथ्वी पर दो भाग में अवतीर्ण है। प्रत्यूष काल में जो मुण्डीर (सूर्य) को देखते हैं, उन्हें शोक तथा रोग नहीं होता। काल की प्रीति में जो मध्याह्न में कल्याणकारी सूर्य को देखते हैं, उन्हें अतिशीघ्र सुख मिलता है। साम्ब द्वारा निर्मित नगरी में जो सन्ध्याकाल में सूर्य का दर्शन करते हैं, उनको तत्क्षण धर्म, अर्थ तथा काम का साधन प्राप्त हो जाता है॥५३-५५॥