भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३१

अथ कृतार्थसंज्ञाश्च निगमज्ञैरुदाहृताः ।
मुडि प्रमर्दने धातुः संज्ञायां च विधीयते ।
प्रकर्षाद्दर्द्येद्येन तेन मुण्डीर उच्यते ॥४१॥

शास्त्रज्ञों द्वारा इनका नाम यथार्थ संज्ञा वाला हो गया। प्रदर्शन अर्थ में 'मुडि' धातु का संज्ञार्थ में प्रयोग होता है। जहाँ सम्यक् रूप से अर्दन किया गया हो, वह 'मुण्डित' होता है।।४१।।

वशिष्ठ उवाच

एवमाद्यमिदं स्थानं कीर्त्यते च युगे युगे।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वतीर्थमयं शुभम् ॥४२॥
ये तु केचिन्नराः लोके भक्तियुक्तात्तिर्वेदकाः ।
तस्मिन् यन्त्रे समापन्नाः सद्यो मुञ्चन्ति वर्तिताः ॥४३॥
केचित्तत्र महामोहादस्मिंस्तीर्थे विबुद्धयः ।
न तेषां सम्पदां स्थैर्यं यदि प्राप्तुं सुदुष्करम् ॥४४॥

वशिष्ठ देव कहते हैं—इस प्रकार से इस आदि स्थान का युग-युग में वर्णन किया गया है। यह समस्त पापों का हरण करने वाला है। पुण्यप्रद, शुभ तथा समस्त तीर्थमय है। जो कोई भी पृथ्वी का व्यक्ति भक्तियुक्त तथा आर्त स्थिति में इस सूर्ययन्त्र के पास आयेगा, वह सदा मुक्त हो जायेगा। यदि कोई ज्ञानी इस तीर्थ के सम्बन्ध में मोहग्रस्त हो जाता है, तब सुदुष्कर सम्पत्तिवान होने पर भी उसकी (सम्पत्ति में) स्थिरता नहीं रहती।।४२-४४।।

यावत् प्रतपते भानुर्यावच्च लवणोदधिः ।
यावद् भूमिधरा देवास्तावत् कीर्त्तिर्विभावसोः ॥४५॥
ये च पापसमायुक्ता जायन्ते भुवि मानवाः ।
तेषामेव रविस्त्राता ये तत्क्षेत्रसमाश्रिताः ॥४६॥
एवंविधो ह्ययं सूर्यः सदा कार्यों विजानता ।
देवः कीर्त्तिधनाकाङ्क्षी किं पुनर्भूवि मानवाः ॥४७॥

जब तक सूर्य अपनी किरणें प्रसारित करते रहेंगे, जब तक यह लवण समुद्र रहेगा। जब तक पर्वत तथा देवगण रहेंगे, तब तक सूर्य की कीर्ति स्थायी रहेगी। इस पृथ्वी पर जो समस्त मनुष्य पापयुक्त होकर जन्म लेते हैं, उनके सूर्य ही त्राणकर्त्ता हैं। यदि वे मनुष्य उनके स्थान का आश्रय लेते हैं, तब सूर्य उनका त्राण करते हैं। ऐसे प्रभाव से युक्त ये सूर्य हैं। यह सब जानकर सदैव उनकी सेवा करना ही उचित है। उनसे ही देवता भी कीर्ति तथा धन की आकांक्षा करते हैं, पृथ्वी के मनुष्य की तो बात ही क्या है।।४५-४७।।