साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(यज्ञस्थानविधिः)
अतः परं प्रवक्ष्यामि यज्ञस्थानविधिं शुभम्।
अधियज्ञोऽस्ति यज्ञानां यज्ञाङ्गो यज्ञसम्भवः ॥१॥
यज्ञमूर्त्तिं नमस्कृत्य त्वां यज्ञेन यजामहे।
अब शुद्ध यज्ञस्थान-विधि का वर्णन किया जाता है। हे सूर्यदेव! आप यज्ञों में अधियज्ञ हैं। आप यज्ञ के अंगस्वरूप हैं। यज्ञ से उद्भूत हैं। आप यज्ञमूर्त्ति को नमस्कार करके यज्ञ द्वारा ही आपका पूजन करता हूँ॥१॥
ज्वालामालाकुलप्रख्ये सर्वकारणसम्भवे ॥२॥
विग्रहे देवदेवस्य वर्णस्थानं निबोध मे।
हृदये सिद्धिराद्यस्तु रवेः सकलनिष्कला ॥३॥
कर्मनिर्वाणगावेतावाकारौ परिकीर्त्तितौ।
ईईविद्येशयोगीशौ नाभेस्तस्य बभूवतुः ॥४॥
ज्वालामाला द्वारा विस्तृत, समस्त कारणों के उत्पत्तिस्वरूप देवदेव सूर्य के विग्रह का वर्ण एवं स्थान कहता हूँ, सुनो। रवि हृदय में आद्य अक्षर (अ) सकल तथा निष्कल सिद्धियों का कारण तथा सिद्धिरूप है। 'आ' कर्म का निर्वाण प्रापक कहा गया है। सूर्य की नाभि में 'इ ई' वर्णद्वय अवस्थान करते हैं। ये विद्या तथा योग के ईश्वर हैं॥२-४॥
उ ऊ भावादिबीजे तु ऊरूभ्यां चास्य धीमतः।
ऋ ॠ ऋतं च सत्यं च पद्भ्यां तस्य बभूवतुः ॥५॥
धर्मादिवर्गविपुलं लृकारं ग्रहणार्णवम्।
ए ऐ देवस्य मातरौ श्लोके अं अः मद्द्योममूर्त्ति द्वौ ॥६॥
धीमान् सूर्य के ऊरुद्वय में समस्त प्राणियों के आदि बीजरूप 'उ ऊ' वर्णद्वय अवस्थान करते हैं। उनके चरणयुगल में रहते हैं—ऋ तथा ॠ, जो ऋत तथा सत्य के प्रतीक हैं। 'लृ'कार है—धर्मादि वर्णसकल तथा 'ओ' है—समुद्रस्वरूप (ग्रहणार्णव समुद्ररूप)। 'ए ऐ' सूर्य के प्रसिद्ध मातृद्वय हैं। 'अं तथा अः' ये दोनों महत् आकाश मूर्त्तिरूप हैं॥५-६॥
कखौ स्यन्दनमित्युक्तं गघौ मण्डलकीर्त्तितौ।
ङकारः सारथिः साक्षाद् देवदेवस्य धीमतः ॥७॥