भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222

२१२ श्रीसाम्बपुराणम्

यत्तदेकाक्षरं ज्ञानं शान्तं सम्यक् प्रतिष्ठितम्।
क्षकारेण क्षयं याति जगत्स्थावरजंगमम्॥१६॥
अक्षयश्चाव्ययश्चैव क्षकारः परिपठ्यते।
शुभा ह्येते तव प्रोक्ता बीजाः सूर्यस्य नित्यशः॥१७॥

'स'कार को छन्दों का जन्मस्थल तथा 'ह'कार को शाश्वत ब्रह्म का अवस्थान कहा गया है। उसे क्षत्र अर्थात् विपद से उद्धारकारक, परमनिर्वाण स्थान, अभय, कामप्रद तथा प्रभु कहा गया है। उनका एकाक्षर ज्ञान शान्त तथा सम्यक् प्रतिष्ठित है। 'क्ष' द्वारा समस्त स्थावर-जंगम जगत् विनष्ट हो जाता है। सूर्य के इन समस्त बीजसमूहों को तुमसे कहा॥१५-१७॥

यथाकर्मणि योगेन वर्णा ह्येते प्रकीर्तिताः।
तथा फलप्रदाः सर्वे भवन्ति पर्युपासिताः॥१८॥

जिस प्रकार के कर्म के योग से इन वर्णों को कहा गया (अर्थात् जिस वर्ण का जो कर्म बताया गया), उसी प्रकार यथायथ रूप से उपासित होने पर ये सभी फलदायक हो जाते हैं॥१८॥

बृहद्वल उवाच
यदुक्तं वर्णजातीनां फलं कर्मसमुद्भवम्।
तन्न शक्यं समाख्यातुं चित्तेनास्थिरवृत्तिना॥१९॥
दीक्षावसाने साम्बस्य यदुक्तं भास्करेण तु।
तन्मे ब्रूहि महामन्त्रं सर्वकामार्थसाधनम्॥२०॥

महाराज बृहद्वल जिज्ञासा करते हैं—वर्णसमूह के कर्मसमुद्भूत जिस फल की बात आपने कही, उसे मैं अस्थिर वृत्ति चित्त के द्वारा धारण नहीं कर पा रहा हूँ। दीक्षा के अन्त में सूर्यदेव ने साम्ब से जो कहा था, उस सर्वकामार्थसाधक महामन्त्र का वर्णन कृपा करके मुझसे करें॥१९-२०॥

वशिष्ठ उवाच
शृणु राजन् महामन्त्रं भूतसंहारकारकम्।
उत्पत्तिव्यञ्जकं चैव जगतश्च पराभवम्॥२१॥
भास्करं कर्णिकाभूतं व्यापकं पूर्वपश्चिमे।
याम्ये सौम्ये तदा विष्णुर्ब्रह्मा ऐशान नैर्ऋते॥२२॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—महाराज! महामन्त्र की बात सुनिये। यह प्राणियों का संहार-कारक, उत्पत्ति, प्रकाशक तथा जगत् के पराभवरूप है। पद्म की कर्णिका के स्थल में भास्कर पूर्व तथा पश्चिम में व्याप्त रहते हैं। दक्षिण तथा उत्तर में विष्णु रहते हैं। ऐसे ही ईशान तथा नैर्ऋत्य कोण में ब्रह्मा रहते हैं॥२१-२२॥