साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः
(द्वादशमूर्त्युपाख्यानम्)
बृहद्वल उवाच
स्थापितो यदि साम्बेन सूर्यश्चन्द्रसरित्तटे।
तस्मान्नाद्यमिदं स्थानं यथैतद् भाषितं त्वया ॥१॥
राजा बृहद्वल पूछते हैं—यदि साम्ब ने चन्द्रभागा नदी के तट पर सूर्य के मूर्त्ति की स्थापना की थी, तब उसे आपने जिस प्रकार कहा है (उससे प्रतीत होता है कि) यह सूर्य का आद्य स्थान नहीं है॥१॥
वशिष्ठ उवाच
आद्यं स्थानमिदं भानोः पश्चात् साम्बेन निर्मितम्।
विस्तरेणास्य चाद्यत्वं कथ्यमानं निबोध मे ॥२॥
ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—यही सूर्य का आद्य स्थान है। बाद में साम्ब ने यहाँ निर्माण कराया। मैं विस्तार से इस आद्यत्व का वर्णन करता हूँ, तुम सुनो॥२॥
अनाद्यो लोकनाथः स विश्वमाली जगत्पतिः।
मित्रत्वेऽवस्थितो देवस्तपस्तेपे नराधिपः ॥३॥
अनादि लोकनाथ जगत्पति नरगण के अधिपति मित्ररूपेण अवस्थित देवता ने पूर्व में एक बार तपस्या किया था॥३॥
अनादिनिधनो ब्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च।
सृष्ट्वा प्रजापतीन् सर्वान् सृष्ट्वा च विविधाः प्रजाः ॥४॥
जिनकी उत्पत्ति तथा विनाश नहीं है, ऐसे नित्य अक्षररूप (क्षररहित) ब्रह्मा ने समस्त प्रजापतियों एवं विविध प्रजा की सृष्टि की॥४॥
ततः स च सहस्त्रांशुरव्यक्तपुरुषः स्वयम्।
कृत्वा द्वादशधात्मानमदित्यमुदपद्यत ॥५॥
तदनन्तर उन अव्यक्त पुरुष सहस्त्रांशु (सूर्य) स्वयं द्वादश रूपों में देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुये॥५॥
इन्द्रो धाताथ पर्जन्यः पूषा त्वष्टाऽर्यमा भगः।
विवस्वान् विष्णुरंशुश्च वरुणो मित्र एव च ॥६॥