साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशतमोऽध्यायः २६७
ॐ आदित्याय हेममिहिरागच्छागच्छ स्ववर्गे ह्रस्व स्वाहा।
सूर्यदेव का मूल मन्त्र इस प्रकार है—ॐ उषषोल्काय स्वाहा। सूर्यदेव का स्थापना मन्त्र यह है—ॐ व्योमव्यापिने सर्वलोकाधिपतये तिष्ठ स्वाहा।
तदनन्तर अङ्गादिन्यास कहते हैं—ॐ अर्काय स्वाहा हृदयम्। ॐ प्रदीप्ताय स्वाहा शिरः। (इसमें प्रणव नहीं लगेगा) विपिटये स्वाहा शिखायाम्। ॐ जगच्चक्षुषे स्वाहा नेत्रम्। ॐ प्रभाकराय स्वाहा कवचम्। ॐ महातेजसे हुं फट् अस्त्रम्।
ॐ गणाधिपतये सहस्रकिरणाय संरोधात्मने स्वाहा—संरोधन मन्त्र।
ॐ आकाशविकासिने जगच्चक्षुषे सान्निध्यं कुरु कुरु स्वाहा—सन्निधानमन्त्र।
पाद्यमन्त्र—ॐ हुं रिटिचिरण्टये दीप्तांशवे नमः।
अर्घ्यदान मन्त्र—ॐ गभस्तिने केलि किलि कालि कालि सर्वार्थसाधनं करके काकि हं नमः।
स्नानमन्त्र—सवित्रे वरुणाय नमः।
वस्त्रदानमन्त्र—ॐ षषनेत्राय सहस्रहस्ततनवे नमः।
गन्धदान मन्त्र—ॐ पिङ्गलाय अच्छच्छले नमः।
पुष्पदान मन्त्र—ॐ अहि अहि लिहि लिहि हिममालाधरतेजोऽधिपतये नमः।
धूपदान मन्त्र—ॐ ज्वलितार्काय नमः।
तदनन्तर इन देवताओं को धूपदान करे—ॐ मिहिराय त्रिधारिणे नमः, ॐ अङ्गेभ्यो नमः, ॐ महाश्वेतायै नमः, ॐ दण्डपाणये नमः, ॐ अरुणादेव्यै नमः, ॐ पिङ्गलायै नमः, ॐ अरुणादिभ्यो हूं नमः, ॐ हरिकेशादिरश्मिपतिभ्यो नमः, ॐ पुञ्जिकस्थल्याद्यप्सराभ्यो नमः, ॐ दीप्ताननादिकिरणेभ्यो नमः, ॐ तेजोऽधिपतये नमः।
दीपमन्त्र—अर्काय गृहाणामृते नमः (मूल में इसमें प्रणव नहीं लगा है)।
नैवेद्यमन्त्र—ॐ जलकुन्दलाय दिव्यातोद्यभिप्रियाय नमः।
अर्घ्यमन्त्र—ॐ सुषोल्काय नमः स्वाहा।
जपोपरान्त जपन्यास मन्त्र—ॐ अंशुमते देवाय गोपतये स्वाहा।
अब इस स्तोत्र को पढ़कर सर्वार्थसाधक अग्निकार्य (होम) करना चाहिये। स्तोत्र मूल में अंकित है (ॐ नमस्ते दिव्यरूपाय इत्यादि)। उसका शब्दार्थ इस प्रकार है—दिव्यरूप समस्त प्राणिगण के आत्मस्वरूप सूर्यदेव को नमस्कार है, समस्त तेज के अधिपति लोकचक्षु सूर्यदेव को नमस्कार है।
संहार मन्त्र—ॐ संहर संहर विरोचन स्वाहा।
शुद्धिमन्त्र—ॐ शान्तात्मने सर्वलोकप्रियाय स्वाहा।
अब नमस्कार इस मन्त्र से करे—ॐ खखोल्काय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो रविः प्रचोदयात् स्वाहा।