साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 282, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें२७२ श्रीसाम्बपुराणम्
मुद्रा तथा आरोहण कर्म में व्योमाकृति तथा व्योमाशिख होता है। इसमें सूर्य के गमन तथा पोषण से अक्षय तृप्ति होती है। रथ तथा रथादि के दिगीश्वर की मुद्रा द्वारा तृप्ति-विधान करे। यह उत्तम विधि है। शातपद्म द्वारा तृप्तिविधान मध्यम तथा कनिष्ठ होता है॥१२०-२१॥
आगमः स्थापनं रोधः सान्निध्यं पाद्यमेव च।
अर्घ्यः स्नानं तथा वासो लेपनं कुसुमानि च॥१२२॥
धूपं विभूषणं चैव तथान्येषां च पूजनम्।
अङ्गादीनां च देवानां शेषांश्चान्यान्यथाक्रमम्॥१२३॥
आवाहन, स्थापन, रोधन, सान्निध्य, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गन्धादि लेपन, पुष्प, धूप (दीप) तथा विभूषण प्रदान से सूर्य की तथा अन्य की पूजा सम्पन्न होती है। इसी प्रकार अंगादि देवों की तथा शेष अन्य की भी यथाक्रम से पूजा करनी चाहिये॥१२२-२३॥
दीपं बलिमथातोऽर्घं जपं न्यासं स्तवं तथा।
अग्निक्रियां च संहारं शुद्धिपातं विहारणम्॥१२४॥
विसर्जनं च निर्हारं कुर्यात् सर्वं पृथक्-पृथक्।
मन्त्रैर्यथोदितैः स्वैः स्वैर्भक्त्या परमयान्वितः॥१२५॥
निष्कलं सकलीकृत्य मन्त्रेणाह्वाययेत्ततः।
आहूयन्ते हि यद्देवमागमः समुदाहृतः॥१२६॥
दीप, पूजोपहार (बलि), अर्घ्य, जप, न्यास, स्तव, अग्निक्रिया (होम), संहार, शुद्धिपात, विहार, विसर्जन तथा निर्हार (बाहर करना) सब कुछ पृथक्-पृथक् यथोक्त रूप से उन-उन देवताओं के मन्त्र से परम भक्तिपूर्वक करने पर निष्कल को सकल करने के लिये आह्वान करना पड़ता है॥१२४-२६॥
उपवेशनं च कमले तस्यैव स्थापनं विदुः।
विघातोऽन्यत्र गमने रोधोऽसौ परिकीर्तितः॥१२७॥
युक्ताग्रमनसः स्थानं यत्र सान्निध्यमुच्यते।
पादयोः सलिलैः सद्भिः पाद्यं देवस्य कथ्यते॥१२८॥
कमल पर उनके बैठने को 'स्थापन' करना कहते हैं। अन्यत्र न जायें, इस गमन के व्याघात को 'रोध' कहा गया है। एकाग्र मन से अवस्थान करना 'सान्निध्य' है। चरणों पर जल अर्पण करना 'पाद्य' है॥१२७-२८॥
हेमपात्रे तथा ताम्रे चन्दनोदकसम्मिते।
आदाय सलिलं पुण्यं हस्ताभ्यां परिगृह्य च॥१२९॥