साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २७१
करके योगाङ्ग द्वारा अनुष्ठान करते हुये सम्यक् चित्त होकर उनका पूजन सम्पन्न करना चाहिये॥१०-१२॥
मित्रालये नदीतीरे गोष्ठेषु पवनेषु च।
प्रफुल्लपद्मखण्डेषु नदेषु सरसीषु च॥१३॥
नदीनां सङ्गमे तीर्थे पर्वतेषु वनेषु च।
घर्मपृष्ठे समे देशे कुश-पुष्प-फलान्विते॥१४॥
अनुर्वरे प्रकृष्टे तु प्रागुदक्प्रवणे शुभे।
यत्र वा रमते ये च तत्र पूजा विधीयते॥१५॥
मित्रवन में, नदीतीर में, गोष्ठ में, उपवन में, प्रस्फुटित पद्मसमूह में, नद में, जलाशय में, नदीसंगम में, तीर्थ में, पर्वत-वन-घर्मस्थान में, कुश-पुष्पयुक्त समान देश में, अनुर्वर उत्तम स्थान में, नीचे जल निःसरण के शुभ स्थान में अथवा जहाँ मन प्रसन्न हो, ऐसे स्थान में पूजा करनी चाहिये॥१३-१५॥
भूम्यर्कानलतोयेषु प्रतिमायां महाध्वरे।
काञ्चनं ताम्रपात्रे वा कुर्यात्पूजां वटेऽथवा॥१६॥
विना मन्त्रविधानेन पूजा व्यर्था नृणां भवेत्।
सा चैव सनमस्कारा कर्तुः शतगुणा भवेत्॥१७॥
भूमि, सूर्यमण्डल, अग्नि, जल, प्रतिमा, महायज्ञ, स्वर्ण अथवा वटवृक्ष में पूजन करना चाहिये। मन्त्र-विधान के बिना पूजा व्यर्थ होती है। नमस्कार के साथ पूजा करने से सौगुना फल मिलता है॥१६-१७॥
कनीयांस्तु विधिर्मन्त्रो मध्यमो वा तथोत्तमः।
सहस्रलक्षकोटिस्तु क्रमशः फलमाहरेत्॥१८॥
प्रत्येकं मन्त्रजापेन पूजाविधिरिहोत्तमः।
मध्यमः पादपिण्डेन कनीयान्पिण्ड एव च॥१९॥
कनिष्ठ, मध्यम तथा उत्तम—ये तीन प्रकार के विधान तथा मन्त्र होते हैं। कनिष्ठ में सहस्र गुण, मध्यम में लक्षगुण तथा उत्तम में कोटिगुण लाभ होता है। प्रत्येक मन्त्र के जप को उत्तम कहा गया है। पादपिण्ड मध्यम है तथा पिण्ड कनिष्ठ होता है।
व्योमाकृतो व्योमशिखो मुद्रावाहनकर्मणि।
गमने च खखोल्कस्य शोषणे तृप्तिरक्षया॥२०॥
रथस्य च रथादीनां दिगीशानां समुद्रया।
उत्तमो हि विधिर्मध्यः कनीयान् शातपद्मया॥२१॥