भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

२७० श्रीसाम्बपुराणम्

धर्मरूप अस्त्र—नेत्र द्वारा (धर्म का आश्रय लेकर) ब्राह्मणों के साथ मन्त्रणा करे (उपदेश ले)। सूर्यमन्त्र से दो बार पूरक करके सूर्यदर्शन करे। क्रमशः त्वक्, अंगुष्ठ प्रभृति द्वारा मन्त्र से योग करे। तदनन्तर अपने हाथों के तलद्वय की संख्या द्वारा वरुणादि के मन्त्र का न्यास करे। तदनन्तर अमृता मुद्रा बनाकर मुद्रा का ध्यान करे। तत्पश्चात् पूरक में ली गयी वायु द्वारा जठराग्नि को प्रज्वलित करे।।३-५।।

कुम्भकेनापि संरुद्धात् त्रिविधं कल्मषं हरेत्।
रेचकेन च निष्क्रम्य हृदि शुद्धिं समाचरेत् ॥६॥
आकृष्य पूरकेणार्कं तेजःपिण्डं पुनः पिबेत्।
खखोल्केन च तत्तेजः स्वमूर्तौ विनिवेशयेत् ॥७॥
हृदये मूर्ध्नि मूले तु नेत्रवर्त्म करेषु च।
हृदयादीनि चाङ्गानि विन्यसेत् तत्त्वयोगतः ॥८॥

कुम्भक द्वारा भी वायु को रोककर कायिक, वाचिक तथा मानसिक पापों का क्षालन करना चाहिये। रेचक में वायु को बाहर निकालकर हृदयशुद्धि का आचरण करना चाहिये। पूरक के द्वारा सूर्य का आकर्षण करके पुनः उसके तेजपिण्ड का पान करना चाहिये। सूर्यमन्त्र द्वारा उस तेज को अपने देह में अभिनिविष्ट कराना चाहिये। हृदय, मस्तक, मूलाधार, नेत्रपथ, करसमूह तथा हृदय प्रभृति में तत्त्वयोग (तत्त्वन्यास) द्वारा न्यास करे।।६-८।।

सुशुभे द्वादशदले कमले च स्थितं तदा।
आत्मानं चिन्तयेद्युक्तः शुद्धचामीकरप्रभम् ॥९॥

तदनन्तर सुशोभन द्वादश दलयुक्त कमल में स्थित विशुद्ध स्वर्ण की प्रभा के समान आत्मा का एकाग्र भाव से चिन्तन करना चाहिये।।९।।

एवं कृत्वैव चात्मानं मन्त्रमुद्रादियोगतः।
ततः परमया भक्त्या तदा पूजां समाचरेत् ॥१०॥
काष्ठैः काष्ठं विनिर्मथ्य मणेर्वा तापदर्शनात्।
आकृष्यते यथा वह्निः क्रियाशेषकरः क्षमः ॥११॥
तद्वन्मन्त्रादियोगेन निष्कलात् सकलो रविः।
आहूय पूजयेत्सम्यक् योगाङ्गो हृष्टमानसः ॥१२॥

इस प्रकार मन्त्र मुद्राओं की सहायता से आत्मा का चिन्तन करके भक्तिभावयुक्त होकर पूजा का प्रारम्भ करे। जैसे काठ से काठ का मन्थन करके अग्नि प्रज्वलित करके अथवा तापदर्शन मणि से जैसे क्रिया सम्पन्न कराने योग्य अग्नि का आकर्षण किया जाता है, उसी प्रकार मन्त्रादि द्वारा निष्कल स्थिति में से सकल (कलायुक्त) रवि का आवाहन