साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें२७४ || श्रीसाम्बपुराणम् ||
सूर्य के मूल मन्त्र का सयत्न जप करे तथा समस्त पाद्यादि विधान से पूजन एवं वाचिक, उपांशु, मानस जप करना उचित है। रथाङ्ग समूह का न्यास सूर्य का हृदय-स्वरूप कहा गया है। गुण एवं विग्रह के सम्यक् वर्णन को स्तव कहते हैं।।३७-३८।।
मन्त्रमुद्रावियोगेन द्रव्यै राज्यादिभिः शुभैः।
उद्दिष्टं देवयजनं वषट् स्वाहान्तसंयुतम्॥३९॥
अग्नावियं समुद्दिष्टां निखिलाग्निक्रिया सुराः।
कृते पूजा विधानेन विप्रकीर्णे च चेतसि॥४०॥
मन्त्र तथा मुद्रादि द्वारा राज्यादि शुभ द्रव्यों द्वारा अन्त में वषट् तथा स्वाहा शब्द से सूर्यपूजा कही गयी है। अग्नि में समस्त होमादि क्रिया को देवगणों ने कहा है। चित्त को उन्नत करके पूजा विधान द्वारा पूजा सम्पन्न करनी चाहिये।।३९-४०।।
संहतिः क्रियते यत्र संहारं तं विनिर्दिशेत्।
पूजाविधाने सर्वस्मिन् द्रव्यमुद्रादिहानितः॥४१॥
यः कश्चित्तनुजो दोषो विशुद्ध्यान्तं समुन्नयेत्।
शिरसा मनसा वाचा दृष्ट्या बुद्ध्या च शुद्धया॥४२॥
जानुभ्यामथ पाणिभ्यां प्रणिपातो हि सप्तधा।
सप्त सप्त समुद्देशाद् दद्याद् विप्राय शक्तितः॥४३॥
दानं गुणवते देयमिदं वितरणं स्मृतम्।
जहाँ संहति की जाती है, उसे संहार कहा गया है। पूजाविधान में सर्वत्र द्रव्य तथा मुद्रादि की हीनता का जो देहजात दोष है, उसे विशुद्ध कर लिया जाता है। मस्तक, मन, वाक्य, दृष्टि तथा शुद्ध बुद्धि, जानुद्वय तथा हस्तद्वय—इन सबके सहयोग से सात बार प्रणिपात करे। गुणवान ब्राह्मण को यथाशक्ति दान भी करे। यह 'वितरण' कहा गया है।।४१-४३।।
सकलीकृत एवाथ निष्कलीकरणात्पुनः॥४४॥
विसर्जनेन मन्त्रेण प्राप्नोति पुरुषोत्तमम्।
यजतः कुसुमस्तोकं गृहीत्वा होमभस्म च॥४५॥
निक्षिपेद्दिशि कौबेर्यां निर्हारोऽयमुदाहृतः।
आगमाद्या तु या पूजा सानन्दा परिकीर्तिता॥४६॥
सर्वास्तास्संविधातव्याः सपुष्पचन्दनादिभिः।
सकलीकृत वस्तु को पुनः निष्कल करने से विसर्जन मन्त्र द्वारा पुरुषोत्तम की प्राप्ति होती है। यज्ञ के पश्चात् सामान्य पुष्प तथा होमभस्म को उत्तर दिशा की ओर फेंके। इसे निर्हार (अभ्यवकर्षण) कहते हैं। आगमादि में विहित जो पूजा है, उसे शुभजनक कहा गया है। सभी पूजन पुष्प तथा चन्दनादि से करना चाहिये।।४४-४६।।