भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 285

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २७५

मन्त्रमुद्रा तथा ध्यानं योगाङ्गं सुसमाहितम् ॥४७॥
समं सम्पादयेत्सर्वमक्लिष्टं यत्परायणम् ।
यामद्वयपरिच्छन्नं प्रातर्वेलादितः क्रमात् ॥४८॥

मन्त्र, मुद्रा एवं सुसमाहित ध्यान-योग से सूर्यदेव की समस्त पूजा अनायास ही सम्पन्न हो जाती है। प्रातःकाल से लेकर क्रमशः दो प्रहर व्यापी पूजन करना चाहिये॥४७-४८॥

शान्तिं पुष्टिं च शान्त्यर्थं शान्तवत्कीर्तितं मया ।
ज्योतिरलस्तथाग्निश्च ज्योतिष्मानपरः स्मृतः ॥४९॥
शुभ्रश्च हरितोऽत्यग्निरित्यश्वाः परिकीर्तिताः ।
सर्पिस्त्रिनाभ्यरुणिऋर्ग्विधातेत्यमी तथा ॥५०॥

शान्ति तथा पुष्टि कर्म करे। शान्ति-हेतु कर्म शान्त भाव से करना चाहिये। ज्योति-रत्न, अग्नि तथा ज्योतिष्मान (सूर्यमण्डल को) पूजास्थान कहते हैं। शुभ्र हरित तथा अग्नि को अश्व कहते हैं। सर्पि, त्रिनाभि, अरुणि—ये अग्निधाता कहे गये हैं॥४९-५०॥

प्रणवादि समायुक्ता नमस्कारान्तकल्पिताः ।
हृदयादिरथादीनां यज्वन्तानां पदक्रमात् ॥५१॥

आदि में प्रणव युक्त करके तथा अन्त में नमस्कार करना चाहिये (अर्थात् नाम के आदि में ॐ तथा अन्त में नमस्कार लगाये)। हृदयादि एवं रथ प्रभृति के पदक्रम से अर्चना करनी चाहिये॥५१॥

आदित्याय सहेहेति मिहिरागच्छतिद्वयम् ।
स्ववर्गेणेति हुंपश्चान्नgeneric text: हुंपश्चानमः स्वाहान्तकल्पितः ॥५२॥

पहले 'आदित्याय', तत्पश्चात् 'इह', तदनन्तर 'मिहिर' तदनन्तर दो बार 'आगच्छ' लगाये। तदनन्तर 'हुं नमः स्वाहा' लगाने से मन्त्रोद्धार होता है—आदित्याय इह मिहिर आगच्छ आगच्छ हुं नमः स्वाहा॥५२॥

अयमाकाशमन्त्रो हि तथोङ्कारादिसंयुतम् ।
खखोल्कायेति स्वाहान्तो मूलमन्त्र उदाहृतः ॥५३॥
प्रणवादिव्योमव्यापी सर्वलोकाधिपस्तथा ।
तिष्ठतिष्ठेति निर्दिष्टः स्वाहान्तः स्थापने मतः ॥५४॥

यह आकाश मन्त्र कहा गया। ऐसे ही ॐ युक्त 'खखोल्काय' तथा अन्त में स्वाहा शब्द का योग करने से मन्त्रोद्धार होता है—ॐ खखोल्काय स्वाहा'। यह सूर्यदेव का मूल मन्त्र है। पहले प्रणव तत्पश्चात् 'व्योमव्यापी' तत्पश्चात् 'सर्वलोकाधिप' शब्द