साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ श्रीसाम्बपुराणम्
तत्पश्चात् 'तिष्ठ-तिष्ठ' लगाये। अन्त में 'स्वाहा' कहे। मन्त्रोद्धार होता है—ॐ व्योमव्यापिन् सर्वलोकाधिप तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा। यह स्थापन मन्त्र है॥५३-५४॥
अर्कप्रदीप्तिचिपिटजगच्चक्षुः प्रभाकरः। स महातेजसो मन्त्रः खखोल्कहृदयादिभिः ॥५५॥ एते प्रतिपदं सौख्याः स्वाहान्ताः प्रणवादिकाः। कवचस्तु सहुङ्कारो हुंफडस्त्रं तु योजयेत् ॥५६॥
अर्कप्रदीप्ति, चिपिट, जगच्चक्षु, प्रभाकर, महातेजस्वी, खखोल्क हृदयादि के साथ इस मन्त्र के आदि में प्रणव तथा अन्त में 'हुं स्वाहा' लगाये। यह संरोधन मन्त्र कहलाता है। मन्त्रोद्धार होता है—ॐ अर्कप्रदीप्ति चिपिट जगच्चक्षु प्रभाकर महातेजस्वी खखोल्क हृदयादि हुं स्वाहा॥५५-५६॥
गायनाधिपतिश्चैव सहस्रकिरणस्तथा। संरोधात्मेति संरोधो ॐ स्वाहाद्यन्तकल्पितः ॥५७॥
गायनाधिपति सहस्रकिरण संरोधात्मा संरोध ॐ स्वाहा—यह है संरोधन मन्त्र॥५७॥
ॐमाकाशविकासिने जगच्चक्षुषे तथा। सान्निध्यं कुर्वीतिविश्वस्वाहान्तः सन्निधाय च ॥५८॥
ॐ आकाशविकासिने जगच्चक्षुषे सान्निध्यं कुरु कुरु स्वाहा—यह है सन्निधापन मन्त्र॥५८॥
हां चीरिन्टि चिरिन्तीति दीप्ताङ्घ्रिरिति स्मृतः। प्रणवादिकः पाद्यमन्त्रो नमःशब्दान्तसंयुतः ॥५९॥
ॐ हां चिरिण्टि चिरिण्टि दीप्ताङ्घ्रिः नमः—यह है पाद्यदान मन्त्र॥५९॥
ॐ गभस्तिने द्विः किलि कालि कालीति चापरः। सर्वार्थसाधिनीत्येव ककिद्विस्त्रिः सहुंकृतिः ॥६०॥ अर्घ्यमन्त्रो विनिर्दिष्टोऽप्यन्ते कृतनमस्कृतिः। ॐ सवित्रे च वरुणाय नमः स्यात्स्थापने मन्त्रः ॥६१॥
ॐ गभस्तिने किलि किलि कालि कालि सर्वार्थसाधिनि ककि ककि हुं फट् नमः—यह अर्घ्यदान का मन्त्र है। तदनन्तर 'ॐ सवित्रे वरुणाय नमः' मन्त्र से स्थापन करना चाहिये॥६०-६१॥
खखनेत्रसहस्रं तु नमोऽन्तः परिकल्पितः। वस्त्रगन्धस्तु विज्ञेयः पिङ्गलाश्छन्दलेति च ॥६२॥