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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

२७६ श्रीसाम्बपुराणम्

तत्पश्चात् 'तिष्ठ-तिष्ठ' लगाये। अन्त में 'स्वाहा' कहे। मन्त्रोद्धार होता है—ॐ व्योमव्यापिन् सर्वलोकाधिप तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा। यह स्थापन मन्त्र है॥५३-५४॥

अर्कप्रदीप्तिचिपिटजगच्चक्षुः प्रभाकरः। स महातेजसो मन्त्रः खखोल्कहृदयादिभिः ॥५५॥ एते प्रतिपदं सौख्याः स्वाहान्ताः प्रणवादिकाः। कवचस्तु सहुङ्कारो हुंफडस्त्रं तु योजयेत् ॥५६॥

अर्कप्रदीप्ति, चिपिट, जगच्चक्षु, प्रभाकर, महातेजस्वी, खखोल्क हृदयादि के साथ इस मन्त्र के आदि में प्रणव तथा अन्त में 'हुं स्वाहा' लगाये। यह संरोधन मन्त्र कहलाता है। मन्त्रोद्धार होता है—ॐ अर्कप्रदीप्ति चिपिट जगच्चक्षु प्रभाकर महातेजस्वी खखोल्क हृदयादि हुं स्वाहा॥५५-५६॥

गायनाधिपतिश्चैव सहस्रकिरणस्तथा। संरोधात्मेति संरोधो ॐ स्वाहाद्यन्तकल्पितः ॥५७॥

गायनाधिपति सहस्रकिरण संरोधात्मा संरोध ॐ स्वाहा—यह है संरोधन मन्त्र॥५७॥

ॐमाकाशविकासिने जगच्चक्षुषे तथा। सान्निध्यं कुर्वीतिविश्वस्वाहान्तः सन्निधाय च ॥५८॥

ॐ आकाशविकासिने जगच्चक्षुषे सान्निध्यं कुरु कुरु स्वाहा—यह है सन्निधापन मन्त्र॥५८॥

हां चीरिन्टि चिरिन्तीति दीप्ताङ्घ्रिरिति स्मृतः। प्रणवादिकः पाद्यमन्त्रो नमःशब्दान्तसंयुतः ॥५९॥

ॐ हां चिरिण्टि चिरिण्टि दीप्ताङ्घ्रिः नमः—यह है पाद्यदान मन्त्र॥५९॥

ॐ गभस्तिने द्विः किलि कालि कालीति चापरः। सर्वार्थसाधिनीत्येव ककिद्विस्त्रिः सहुंकृतिः ॥६०॥ अर्घ्यमन्त्रो विनिर्दिष्टोऽप्यन्ते कृतनमस्कृतिः। ॐ सवित्रे च वरुणाय नमः स्यात्स्थापने मन्त्रः ॥६१॥

ॐ गभस्तिने किलि किलि कालि कालि सर्वार्थसाधिनि ककि ककि हुं फट् नमः—यह अर्घ्यदान का मन्त्र है। तदनन्तर 'ॐ सवित्रे वरुणाय नमः' मन्त्र से स्थापन करना चाहिये॥६०-६१॥

खखनेत्रसहस्रं तु नमोऽन्तः परिकल्पितः। वस्त्रगन्धस्तु विज्ञेयः पिङ्गलाश्छन्दलेति च ॥६२॥

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २७७

‘खखनेत्रसहस्राय नमः’ मन्त्र से वस्त्र प्रदान करे तथा ‘पिङ्गला छन्दला’ मन्त्र से गन्ध-दान करे।।६२।।

प्रणवादिहिलीतिद्विर्महामालाधरस्तथा ।
तेजोऽधिपतिर्नमोन्तऽश्च पुष्पमन्त्र उदाहृतः ॥६३॥
ज्वलितार्कस्तु तारादिर्धूपद्भिर्मिहिरज्वलः ।
विचित्ररत्नधारीति नमोऽन्तो भूषणः स्मृतः ॥६४॥

‘ॐ हिलि हिलि महामालाधारतेजोऽधिपतये नमः’ यह पुष्पदान का मन्त्र है। ‘ॐ ज्वलितार्क धूप धूप मिहिर ज्वल विचित्ररत्नधारिन् नमः’ इस मन्त्र से भूषणादि प्रदान किया जाता है।।६३-६४।।

महाश्वेता दण्डपाणिररुणिः पिङ्गलस्तथा।
प्रणवादिनमोऽन्ताश्च संयोज्याः पद सन्त्वि मे ॥६५॥

‘ॐ महाश्वेता दण्डपाणि अरुणि पिङ्गलाय नमः’।

अरुणः सूर्योऽशुमाली धातेन्द्रश्च रविस्तथा।
गभस्तिश्च यमश्चैव स्वर्णरितास्तथैव च ॥६६॥
त्वष्टामित्रोऽथ विष्णुश्च द्वादशैव प्रकीर्तिताः ।
आदित्याः प्रतपन्त्येते माघमासादिषु क्रमात् ॥६७॥

अरुण, सूर्य, अंशुमाली, धाता, इन्द्र, रवि, गभस्ति, यम, स्वर्णरिता, त्वष्टा, मित्र तथा विष्णु—इन बारह नामों से सूर्य क्रमशः माघ आदि बारह मास में ताप देते हैं। माघ में अरुण, फाल्गुन में सूर्य, चैत्र में अंशुमाली, वैशाख में धाता, ज्येष्ठ में इन्द्र, आषाढ़ में रवि, श्रावण में गभस्ति, भाद्रपद में यम, आश्विन में स्वर्णरिता, कार्तिक में त्वष्टा, अग्रहायण में मित्र एवं पौष मास में विष्णु ताप देते हैं।।६६-६७।।

प्रणवादिस्मायुक्तानेतानेवं च संज्ञया ।
सहुंकारनमस्कारान् संयुक्तान् संप्रयोजयेत् ॥६८॥

इन नामों के आदि में प्रणव तथा अन्त में हुं नमः लगाये अर्थात् ॐ अरुणाय हुं नमः, ॐ सूर्याय हुं नमः इत्यादि।।६८।।

हरिकेशो रथः कृच्छ्रो रथौजाः पुञ्जिकस्थलः।
क्रतुस्थलो विश्वकर्मा तथा चैव रथस्वनः ॥६९॥
रथचित्रोऽथ मेनाख्यः सहजन्यस्तथाप्सराः।
विश्वव्यचा रथप्रोतः सहासमाठरेण तु ॥७०॥
प्रम्लोचन्त्यनुम्लोचन्ती संयद्वसुरथापरः।
तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च विश्वाची च घृताचिका ॥७१॥

२७८ श्रीसाम्बपुराणम्

अर्वाग्वसुः सेनजिच्च सुषेणश्चोर्वशी तथा।
पूर्वचित्तिश्च संयोज्याः पूज्याः मन्त्रविधानतः॥७२॥

हरिकेश, रथकृच्छ्र, रथौजा, पुञ्जिकस्थल, क्रतुस्थल, विश्वकर्मा, रथस्वन, रथचित्र, मेना एवं सहजादि अप्सरागण, विश्वव्यचा, रथप्रोत, सहास, माठर (यम), प्रम्लोचन्ती, अनुम्लोचन्ती, संयद्द्रसु, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, विश्वाची, घृताचिका, अर्वाग्वसु, सेनजित्, सुषेण, उर्वशी तथा पूर्वचित्ति—इनकी यथाविधान मन्त्र से पूजा करनी चाहिये।।६९-७२।।

दीप्ताननः कुमारश्च घृणिर्योगवहो विराट्।
केशीसूणपरिष्टौ च माठरानन्तनिक्षुभाः॥७३॥
तेजोवाह इति ख्याता द्वादशार्कगणाधिपः।
एते स्वनामतोऽभ्यर्च्य नमोऽन्ताः प्रणवादिकाः॥७४॥

दीप्तानन, कुमार, घृणि, योगवह, विराट्, केशीसूण, परिष्ट, माठर, अनन्त, निक्षुभा तथा तेजोवाह—ये बारहो सूर्य के गणाधिप हैं। इनके नाम के पूर्व में प्रणव तथा अन्त में नमः लगाकर अर्चन करनी चाहिये। जैसे—ॐ दीप्ताननाय नमः, ॐ कुमाराय नमः इत्यादि प्रकार से।।७३-७४।।

क्षुभामैत्रीप्रभाश्यामारोचिर्दीप्तिः सुवर्चला।
योज्यास्तारादिसंयुक्ता नमोऽन्ता सप्त मातरः॥७५॥

क्षुभा, मैत्री, प्रभा, श्यामा, रोचि, दीप्ति, सुवर्चला—ये सातो मातृगण हैं। इनके आदि में ॐ तथा अन्त में नमः लगाकर पूजा करनी चाहिये।।७५।।

वक्रं शुक्रं गुरुं भौमं सौरिं केतुं बुधाननौ।
सहुङ्कारान्सप्रणवान्नमोऽन्तान्योजयेद् ग्रहान्॥७६॥

वक्र (क्रूरगति) रवि, शुक्र, गुरु, मंगल, शनि, केतु, बुध तथा राहु—इन नामों के आदि में ‘हुं’ तथा ‘ॐ’ एवं अन्त में नमः लगाकर पूजा करनी चाहिये।।७६।।

इन्द्रोऽग्निर्यमो निर्ऋतिर्वरुणो वायुरेव च।
कुबेरः शङ्करो ब्रह्मा शेषश्चेति दिगीश्वराः॥७७॥
एतेष्वनव संयुक्तास्तथाधिपतियोजिताः।
नमस्कारान्तसंयुक्ताः संयोज्या नामतो दश॥७८॥

इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, शंकर, ब्रह्मा तथा शिव—ये दिगीश्वर हैं अर्थात् पूर्वादि दिक् के अधीश्वर हैं। इन दस लोगों के नाम के पश्चात् जो जिस दिक् का अधिपति है, उसका उल्लेख करके अन्त में ‘नमः’ लगाकर पूजा करनी चाहिये। जैसे—पूर्वाधिपतये इन्द्राय नमः, पूर्वदक्षिणकोणाधिपतये अग्नये नमः, दक्षिणाधिपतये यमाय नमः इत्यादि।।७७-७८।।

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २७९

तारादितेजोऽधिपतिर्यस्त्वयैव नमस्कृतः। अर्कायाप्य गृहाणेति ह्यमृतेति निवेदने ॥७९॥

आदि में तार (ॐ) लगाकर जल निवेदन करना चाहिये; मन्त्र है—ॐ तेजोऽधिपतये अर्काय नमः अमृतं गृहाण।।७९।।

जलकुन्दलायेत्यादौ दिव्यातोद्यप्रियाय च। प्रणवादिनमोऽन्ताय मत्तोद्ये मन्त्र उच्यते ॥८०॥

ॐ जलकुन्दलाय दिव्यातोद्यप्रियाय नमः—इसे मत्तोद्य मन्त्र कहा गया है।।८०।।

अंशुमानथ देवश्च द्वौ शब्दौ गीयतेति च। ॐ स्वाहाद्यन्तसंयुक्तो न्यासमन्त्र उदाहृतः ॥८१॥

अंशुमान् तथा देव शब्द के पूर्व में ‘ॐ’ तथा अन्त में स्वाहा लगाने से न्यास मन्त्र होता है—ॐ अंशुमान् देवाय स्वाहा।।८१।।

आदौ नमस्ते इत्येव दिव्यरूपाय चेत्यथ। सर्वभूतात्मने चैव नमः सर्वस्य तेजसे ॥८२॥ तथाधिपतयेत्येवं भानवे लोकचक्षुषे। नम ओंकारसंयुक्तः स्तोत्रमन्त्र उदाहृतः ॥८३॥

‘ॐ नमस्ते दिव्यरूपाय सर्वभूतात्मने नमः सर्वतेजसे ताराधिपतये भानवे लोकचक्षुषे नमः—यह स्तोत्र मन्त्र कहा गया है।।८२-८३।।

नमस्कारान्तिका पूजा इह एषा उदाहृता। स्वाहावषट्कारयुता होमे चानेन तर्पयेत् ॥८४॥

शेष में ‘नमः’ शब्द का योग करके पूजा की जाती है। स्वाहा तथा वषट्कार का योग करके होम तथा तर्पण किया जाता है (स्वाहा से होम एवं वषट् से तर्पण)।।८४।।

आदौ तारसमायुक्तं संहरेति पदद्वयम्। विरोचनेति स्वाहान्तो मन्त्रः संहारसंज्ञकः ॥८५॥

ॐ संहर संहर वैरोचनाय स्वाहा—यह संहारमन्त्र है।।८५।।

आदौ शान्तात्मने कृत्वा सर्वलोकजयाय च। तारादिकः शुद्धमन्त्रः स्वाहान्तः परिकीर्तितः ॥८६॥ खखोल्कायेति कृत्वा यस्तत्पश्चाद्विग्रहेति च। सहस्रकिरणायेति धीमहीति तु चापरम् ॥८७॥ तन्नो रविः प्रचोदयादित्योङ्कारादिसंयुतः। स्वाहान्तो हि नमस्कारो विधेयः सम्प्रकीर्तितः ॥८८॥

द्वादशादित्य इति द्विर्हिलीत्योङ्कारसंयुतम्॥८९॥

२८० श्रीसाम्बपुराणम्

ॐ शान्तात्मने सर्वलोकजयाय स्वाहा—इसे शुद्धमन्त्र कहते हैं। ॐ खखोल्काय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो रविः प्रचोदयात्—इसके अन्त में 'स्वाहा' लगाकर नमस्कार करने का नियम है॥८६-८८॥

स्वर्गेणेति च वास्यादौ द्विर्गच्छेति सविग्रहम्।
द्वादशादित्य इति द्विर्हिलीत्योङ्कारसंयुतम्॥८९॥
गच्छ देवेति च ततः कृत्वा चापि यथागतम्।
मन्त्रः प्रणवादिरेष स्यात् स्वाहान्तो हि विसर्जने ॥९०॥

'ॐ गच्छ गच्छ दिवं द्वादशादित्य हिलि हिलि ॐ गच्छ देव यथागतं स्वाहा'—यह विसर्जन मन्त्र है।

आदावोङ्कारसंयुक्तश्चण्डपिङ्गल इत्ययम्।
निर्माल्यहरणे मन्त्रः स्वाहान्तः परिकीर्तितः॥९१॥
प्रागुद्दिष्टे भुवो भागे देवीं शुद्धमृदोद्भवाम्।
चतुरस्रां विदिक्कोणां कुर्यात्प्राक्प्रवणोत्तराम्॥९२॥

आदि में 'ॐ' तदनन्तर 'चण्डपिङ्गल' तदनन्तर 'स्वाहा' अर्थात् 'ॐ चण्डपिङ्गल स्वाहा' मन्त्र से (चण्डपिङ्गल को) निर्माल्य प्रदान करे। (विधानोक्त) पूर्वनिर्दिष्ट भूमि पर शुद्ध मृत्तिका द्वारा निर्मित देवी को चतुरस्र विदिक् कोण तथा पूर्व की ओर प्रवणोत्तरा करे॥९१-९२॥

गोमयेनोपलिप्यादौ समृदा च भुवं तथा।
चन्दनागुरुपङ्केन कुर्यादर्चनमण्डलम् ॥९३॥

मृत्तिका तथा गोमय (गोबर) के द्वारा भूमिभाग में प्रथमतः लेपन करे। तत्पश्चात् चन्दन एवं अगुरु द्वारा पूजा की वेदी बनाये॥९३॥

वक्ष्यमाणविधानेन स्यन्दनं शश्वदालिखेत्।
पूजाविधाने ध्येयः स्यात्तत्र देवो रविः स्थितः॥९४॥
सप्तभिः सप्तभिर्युक्तं हरिद्भिरहियोक्तृभिः।
एकचक्रं रथं तस्य चिन्तयेदरुणान्वितम्॥९५॥

वक्ष्यमाण विधानोक्त रथ अंकित करे। पूजाविधान में उस स्थान में सूर्य का ध्यान करे। सात-सात हरित् वर्ण अश्व द्वारा वाहित एक चक्रयुक्त विशिष्ट तथा अरुण युक्त सूर्य के रथ का चिन्तन करना चाहिये॥९४-९५॥

रवे रजं मासदलं शुभ्रं मध्ये रथस्य तु।
ध्यात्वा तत्कर्णिकामध्ये वह्निशृङ्गशिखोज्ज्वलम्॥९६॥

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८१

आवाहनेन मन्त्रेण मुद्रया व्योमसंज्ञया।
कुर्वीत रश्मिनिचयं तमेकत्र पृथक् स्थितः ॥९७॥
पिण्डीकृत्य च तत्तेजो मूलमन्त्रेण चार्कवत्।
तत्र तत्स्थापयेद् व्योम्नि मन्त्रेण स्थापनेन तु ॥९८॥

रवि के रथ में (मध्य में) मासरूप दलविशिष्ट (द्वादशदल) शुभ्र कमल का ध्यान करे। उसकी कर्णिकामध्ये में अग्नि, शङ्ख तथा शिखा के समान उज्ज्वल वर्ण रश्मि-समूह को आकाश मुद्रा तथा आवाहन मन्त्र से एकत्र रूप तथा पृथक् रूप स्थित तेज को सूर्य के मूल मन्त्र से पिण्डीकृत करके आकाश में स्थापन मन्त्र द्वारा स्थापित करना चाहिये।।९६-९८।।

तत्रस्थं चिन्तयेद् देवं षड्बीजं प्रणवान्वितम्।
हृदादिभिर्यथायोगं षड्भिरङ्गैः समन्वितम् ॥९९॥
कण्ठादापादसंवीतं पद्महस्तं महाप्रभम्।
खखोल्कं चिन्तयेद्देवं द्वादशादित्यदैवतम् ॥१००॥

उस आकाश-स्थित देव का चिन्तन करे, जो षड्बीज तथा प्रणवयुक्त हैं। यथायुक्त हृदयादि छः अंगों से समन्वित भी हैं। वे कण्ठ से लेकर पैरों पर्यन्त कान्तिमान हैं। पद्महस्त, महाप्रभायुक्त द्वादश आदित्यों के दैवत रूप में खखोल्क (सूर्य) देव का चिन्तन करे।।९९-१००।।

शिरोऽथ हृदयं चैव शिखां कवचमेव च।
एतानि क्रमतोऽङ्गानि पूजयेद्व्योममूर्द्धनि ॥१०१॥
पद्मपत्राग्रवृन्दान्ते ज्वलदस्तं तथैव च।
महाश्वेतो दण्डपाणिररुणः पिङ्गलस्तथा ॥१०२॥
दिक्षु केसरमूले तु न्यस्य ऐन्द्रीक्रमादिमे।
केशराग्रे तु पद्मस्य पत्रेष्वभ्यर्च्य पूर्ववत् ॥१०३॥
तत्र तत्कर्णिकामध्ये तेजोरूपं तु चिन्तयेत्।
विन्यसेद् द्वादशादित्यान् इन्द्रादीन् हि यथाक्रमम् ॥१०४॥

सूर्यदेव के मस्तक, हृदय, शिखा तथा कवच—इन अंगों की आकाश में क्रमशः पूजा करनी चाहिये। पद्म पत्र के आगे एवं वृन्दान्त में प्रज्वलित तथा अस्तमित महाश्वेत, दण्डपाणि (इन्द्र), अरुण (सूर्य के सारथी), पिङ्गल (अग्नि) की तथा इसी प्रकार पूर्वादि दिक् के केशरमूल में तथा केसराग्र में एवं पद्म के पत्रों में पहले की तरह अर्चना करके उसकी कर्णिका में तेजोरूप का चिन्तन करे। यथाक्रमेण रुद्रादि द्वादश आदित्यों का विन्यास करे।।१०१-१०४।।

२८२ || श्रीसाम्बपुराणम् ||

हरिकेशस्तथा चैन्द्री रथकृच्छ्ररथौजसौ। पुञ्जिक्रतुस्थलयुतौ योज्यौ सव्यापसव्ययोः ॥१०५॥ न्येसेदाभ्यां विश्वकर्मा पार्श्वयोश्च रथस्वनः। रथचित्रश्च मेनाख्या सहजन्यान्वितौ तथा ॥१०६॥ विश्वव्यचाः प्रतीच्यां तु न्यस्य चाश्वसमीपतः। पार्श्वयोरथ प्रोतश्च माठरोऽथ प्रकीर्तितः ॥१०७॥

हरिकेश, ऐन्द्री, रथकृच्छ्र, रथौज तथा बाँयीं एवं दाहिनी ओर पुञ्जिक्रतु तथा स्थलयुक्त को युक्त करे। विश्वकर्मा ने उभय पार्श्व में रथस्वन तथा रथचित्र को मेना एवं सहजनी के साथ युक्त किया है। पश्चिम दिशा में अश्व के निकट विश्वव्यचा को स्थापित किया है। पार्श्व में प्रोत तथा माठर (यम) की स्थिति कही गयी है॥१०५-१०७॥

प्रम्लोचाम्लोविसंयुक्तो देवदेवस्य कीर्तितः। संयद्वसूकस्तूत्तरस्यां तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिनौ ॥१०८॥ विश्वाचीघृताचीभ्यां संयुक्तौ सव्यवामतः। ऊर्ध्वमर्वावसुस्तस्य सेनजिच्च सुषेणकः ॥१०९॥ उर्वशी पूर्वचित्तिश्च सहस्ताभ्यां यथाक्रमम्। दीप्ताननाद्या ये प्रोक्ता द्वादशार्कगणाधिपाः ॥११०॥

प्रम्लोचा तथा म्लोवि संयुक्त देवदेव की महिमा कीर्तित हुई है। ऐसे ही उत्तर में संयद्वसु, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि तथा दाहिनी ओर विश्वाची एवं बाँयीं ओर घृताची स्थित हैं। ऊर्ध्व में अर्वावसु तथा सेनजित् एवं सुषेण हैं। उनके साथ यथाक्रम से उर्वशी तथा पूर्वचित्ति हैं। ये उज्ज्वल वदन द्वादश सूर्य के गणाधिप कहे गये हैं॥१०८-११०॥

ते हि पूर्वात्समारभ्य तस्याः पर्णस्य सन्धिषु। क्षुपाद्या पर्णतो न्यस्या कंदराया रथस्य तु ॥१११॥ दिग्विदिग्ग्रहपर्यन्ते चन्द्राद्या इन्द्रदिक्क्रमात्। वासवादींश्च दिग्देवान् न्यसेद्दिक्षु दशस्वपि ॥११२॥

पूर्व से प्रारम्भ करके पत्तों की सन्धियों तथा क्षुपादि अन्य पर्ण-पर्यन्त, रथ के कन्दर में, दिग् विदिग् ग्रह-पर्यन्त, पूर्व दिक् क्रम से चन्द्रादि एवं दश दिशाओं में वासवादि दिक् देवताओं का विन्यास करे॥१११-११२॥

एवं विन्यस्य सर्वांस्तु ततः कुर्वीत पूजनम्। अथ मन्त्रान्नवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥११३॥

इस प्रकार सभी का विन्यास करके पूजन करना चाहिये। अब आनुपूर्वीक मन्त्रों को यथावत् कहता हूँ॥११३॥

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८३

ॐ विश्वात्मने नमः। ॐ हृदयशुक्रज्योतिषे नमः। ॐ चित्रज्योतिषे नमः। ॐ सत्यज्योतिषे नमः। ॐ ज्योतिष्मदग्नये नमः। ॐ शुक्राय नमः। ॐ हरिताय नमः। ॐ अत्यग्नये नमः। एते यथाक्रममश्वानां संग्रहाः।

ॐ सर्पाय नमः वासुकिहृदयम्। ॐ चित्रनाभवे नमः चक्रहृदयम्। ॐ अरुणाय नमः अरुणहृदयम्। ॐ ऋत्विग्विधात्रे नमः पन्नगहृदयम्। ॐ आदित्याय-हे हे मिहिरागच्छ गच्छ हुं खः ठः ठः सर्वाह्लादनमन्त्राः।

खखोल्काय ठः ठः मूलमन्त्रः। ॐ व्योमव्यापिने सर्वलोकाधिपतये तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनमन्त्रः। ॐ अर्काय ठः ठः हृदयम्। ॐ प्रदीप्ताय ठः ठः शिरः। ॐ विपिटये ठः ठः शिखाम्। ॐ जगच्चक्षुषे ठः ठः नेत्रम्। ॐ पद्माकराय हुं ठः ठः कवचम्। ॐ महातेजसे हुं फड्रस्त्रम्।

ॐ गं गणाधिपतये सहस्रकिरणाय संरोधात्मने नमः—संरोधमन्त्रः। ॐ आकाशविकासिने जगच्चक्षुषे सान्निध्यं कुरु कुरु ठः ठः—सन्निधापनमन्त्रः। ॐ इरिटिचिरिटये दीप्ताङ्घ्रये नमः—पाद्यमन्त्रः। ॐ गभस्तिने किलिकिलिकालिकालि-सर्वार्थसाधिनि ककि ककि हुं नमः, ॐ सवित्रे वरुणाय नमः—स्नानमन्त्रः। ॐ खखनेत्राय सहस्रतनवे नमः—वस्त्रमन्त्रः। पिङ्गलायाछले नमः—गन्धमन्त्रः। ॐ हिलिहिलि महामालाधरतेजोऽधिपतये नमः—पुष्पमन्त्रः। ॐ ज्वलिताकार्याय नमः—धूपमन्त्रः। ॐ मिहिराय ज्वलविचित्ररत्नधारिणे नमः—भूषणमन्त्रः।

भ्रं आनिम्बमन्त्रेणैवं पूजयेत्। ॐ महाश्वेतायै नमः। ॐ दण्डपाणये नमः। ॐ अरुणादेव्यै नमः। ॐ पिङ्गलायै नमः। ॐ अरुणाय हुं नमः। ॐ सूर्याय हुं नमः। ॐ अंशुमालिने हुं नमः। ॐ धात्रे हुं नमः। ॐ इन्द्राय हुं नमः। ॐ रवये हुं नमः। ॐ गभस्तिने हुं नमः। ॐ यमाय हुं नमः। ॐ स्वणरितसे हुं नमः। ॐ त्वष्ट्रे हुं नमः। ॐ मित्राय हुं नमः। ॐ विष्णवे हुं नमः—एते आदित्यानां मन्त्राः।

ॐ हरिकेशाय हुं नमः। ॐ रथकृच्छ्राय नमः। ॐ रथौजसे नमः। ॐ पुञ्जिकस्थलायै नमः। ॐ ऋतुस्थलायै नमः। ॐ विश्वकर्मणे नमः। ॐ रथस्वनाय नमः। ॐ रथचित्राय नमः। ॐ मेनकायै नमः। ॐ सहजन्यायै नमः। ॐ विश्वव्यचसे नमः। ॐ रथप्रोताय नमः। ॐ अंशमाठराय नमः। ॐ प्रम्लोचन्त्यै नमः। ॐ अनुम्लोचन्त्यै नमः। ॐ तार्क्ष्याय नमः। ॐ अरिष्टनेमिने नमः। ॐ विश्वाच्यै नमः। ॐ घृताच्यै नमः। ॐ आर्वाग्वसवे नमः। ॐ सेनजिते नमः। ॐ सुषेणाय नमः। ॐ उर्वश्यै नमः। ॐ पूर्वचित्त्यै नमः—एते रश्मिपतीनामप्सरसां च मन्त्राः।

२८४ श्रीसाम्बपुराणम्

ॐ प्रदीप्ताननाय नमः। ॐ कुमाराय नमः। ॐ घृणिपाय नमः। ॐ अंगावहाय नमः। ॐ विराजे नमः। ॐ केशिने नमः। ॐ सुरराजाय नमः। ॐ अरिष्टाय नमः। ॐ माषाय नमः। ॐ अनन्ताय नमः। ॐ निक्षुभाय नमः। ॐ तेजोवहाय नमः—एते गणाधिपानां मन्त्राः।

ॐ क्षुपायै नमः। ॐ मैत्र्यै नमः। ॐ प्रेमायै नमः। ॐ श्यामायै नमः। ॐ रोचिषे नमः। ॐ दीप्तये नमः। ॐ सुवर्चलायै नमः—एते मातृमन्त्राः।

ॐ चन्द्राय हुं नमः। ॐ शुक्राय हुं नमः। ॐ बृहस्पतये हुं नमः। ॐ अङ्गारकाय हुं नमः। ॐ शनैश्चराय हुं नमः। ॐ राहवे हुं नमः। ॐ केतवे हुं नमः। ॐ बुधाय हुं नमः—एते ग्रहाणां मन्त्राः।

ॐ इन्द्राय सुराधिपतये नमः। ॐ अग्नये तेजोऽधिपतये नमः। ॐ यमाय प्रेताधिपतये नमः। ॐ निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये नमः। ॐ वरुणाय जलाधिपतये नमः। ॐ वायवे प्राणाधिपतये नमः। ॐ कुबेराय यक्षाधिपतये नमः। ॐ शङ्कराय सर्वविद्याधिपतये नमः। ॐ ब्रह्मणे सर्वलोकाधिपतये नमः। ॐ शेषाय सर्वनागाधिपतये नमः—एते दिग्देवतानां मन्त्राः।

ॐ तेजोऽधिपतये नमः—दीपमन्त्रः। ॐ अर्काय गृहाणामृतम्—नैवेद्यमन्त्रः। ॐ जलकुन्दलाय दिव्याय तोद्यप्रियाय नमः—आतोद्यमन्त्राः। ॐ अंशुमते देवाय गोपाय ठः ठः—पूजाजपन्यासमन्त्रः।

अब मूल में 'ॐ विश्वात्मने नमः' इत्यादि मन्त्रों से विश्वात्मा, हृदयशुक्रज्योतिष, चित्रज्योतिष, सत्यज्योतिष, अग्नि, शुक्र, हरित तथा अत्यग्नि की पूजा करे। यह यथाक्रमेण अश्वसमूह का संग्रह है।

तदनन्तर ‘ॐ सर्पाय नमः' इत्यादि मूल में अंकित मन्त्रों से वासुकिहृदय, चक्रहृदय, अरुणहृदय, पद्महृदय की अर्चना करके ‘ॐ आदित्याय हे हे मिहिरागच्छ गच्छ हुं ख स्वाहा' मन्त्र से सूर्य का आवाहन करना चाहिये। यह है—सर्वाह्लादन मन्त्र।

'खखोल्काय स्वाहा' मूल मन्त्र है। आकाशवासी सभी लोकों के अधिपति यहाँ रहिये—स्वाहा (ॐ व्योमव्यापिने सर्वलोकाधिपतये तिष्ठ तिष्ठ स्वाहा)—यह स्थापना मन्त्र है। तदनन्तर ॐ अर्काय स्वाहा—हृदयम्, ॐ प्रदीप्ताय स्वाहा—शिरः, ॐ विपिटये स्वाहा—शिखाम्, ॐ जगच्चक्षुषे स्वाहा—नेत्रम्, ॐ पद्माकराय हुं स्वाहा—कवचम्। ॐ महातेजसे हुं फट्—अस्त्रम्। इस प्रकार न्यास करना चाहिये।

अब ‘ॐ गं गणाधिपतये' इत्यादि संरोध मन्त्र है। 'ॐ आकाशविकासिने' इत्यादि सन्निधान मन्त्र है। (यहाँ-जहाँ भी 'ठः ठः' लिखा है, वहाँ 'ठः ठः' के स्थान पर 'स्वाहा' लगाये।) ‘ॐ इरिष्ट' इत्यादि मन्त्र से पाद्य प्रदान करे। ‘ॐ गभस्तिने' इत्यादि मन्त्र से

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८५

स्नान कराये। ‘ॐ खखनेत्राय’ इत्यादि वस्त्रदान मन्त्र है। ‘पिङ्गलायाच्छले नमः’ गन्ध मन्त्र है। ‘ॐ हिलि हिलि’ इत्यादि पुष्पदान मन्त्र है। ‘ॐ ज्वलितार्काय नमः’ इत्यादि मन्त्र से धूपदान किया जाता है। ‘ॐ मिहिराय’ इत्यादि मन्त्र से भूषणादि प्रदान करना चाहिये।

मूल में लिखित मन्त्रों से क्रमशः महाश्वेता, दण्डपाणि, अरुणादेवी, पिङ्गला, अरुण, सूर्य, अंशुमाली, धाता, इन्द्र, रवि, गभस्ति, यम, स्वर्णरिता, त्वष्टा, मित्र तथा विष्णु का पूजन करे। ये आदित्य गणों के मन्त्र हैं।

मूल में लिखित ‘ॐ हरिकेशाय’ इत्यादि मन्त्रों से क्रमशः हरिकेश, रथकृच्छ्र, रथौजा, पुञ्जिकस्थला, क्रतुस्थला, विश्वकर्मा, रथस्वन, रथचित्र, मेनका, सहजन्या, विश्वव्यचा, रथप्रोता, अंशमाठर, प्रम्लोचन्ती, अनुम्लोचन्ती, तार्क्ष्य, अरिष्टनेनि, विश्वाची, घृताची, अर्वाग्वसु, सेनजित्, सुषेण, उर्वशी तथा पूर्वचिति का पूजन करना चाहिये। यह सब रश्मिपति तथा अप्सराओं का मन्त्र है।

‘ॐ प्रदीप्ताननाय नमः’ इत्यादि मन्त्रों से प्रदीप्तासन, कुमार, घृणीश, अङ्गावह, विराज, केशी, सुरराज, अरिष्ट, माष, अनन्त, निक्षुभ तथा तेजोवहा का पूजन करे। यह सब गणाधिपों का मन्त्र है।

तत्पश्चात् ‘ॐ क्षुपायै नमः’ इत्यादि मन्त्रों द्वारा मातृगण का पूजन कर्तव्य है। क्षुपा, मैत्री, प्रेमा, श्यामा, रोचि, दीप्ति तथा सुवर्चला का पूजन करे, जो मातृगण हैं।

‘ॐ चन्द्राय हुं नमः’ इत्यादि मन्त्र से चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, शनि, राहु, केतु तथा बुध ग्रहों का पूजन करे।

तत्पश्चात् मूल में अंकित मन्त्रों से दिक् देवतागण का पूजन करे। जो जिसके अधिपति हैं, उनके साथ उसका उल्लेख करके पूजन करना चाहिये। जैसे—‘इन्द्राय सुराधिपतये नमः—देवताओं के अधिपति इन्द्र को नमस्कार, तेज के अधिपति अग्नि को नमस्कार इत्यादि। ऐसे ही इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, शङ्कर, ब्रह्मा तथा शेष (अनन्त) को नमस्कार किया जाता है।

अब ‘ॐ तेजोऽधिपतये नमः’ इत्यादि मूल में अंकित मन्त्रों से दीप तथा नैवेद्य प्रदान करे। ‘ॐ जलकुन्दलाय’ इत्यादि आतोद्य मन्त्र है। ‘ॐ अंशुमते’ इत्यादि पूजा, जप एवं न्यास मन्त्र हैं।

ॐ नमस्ते दिव्यरूपाय सर्वभूतात्मने नमः।
सर्वतेजोऽधिपतये भानवे लोकचक्षुषे ॥११४॥

मूल में अंकित श्लोक ११४ द्वारा सूर्यदेव की स्तुति करे। अर्थ है—हे दिव्य रूप! आपको नमस्कार है। हे समस्त प्राणीगण के आत्मरूप! आपको नमस्कार है। हे समस्त तेज के अधिपति! लोकचक्षुस्वरूप भानु! आपको नमस्कार है॥११४॥

२८६ श्रीसाम्बपुराणम्

अग्निक्रिया ततो वक्ष्ये मन्त्रमुद्रादितः क्रमात्। उल्लेखनं धारणं तु कुर्यादर्कहृदस्तथा ॥१९५॥ तदनन्तर अग्निक्रिया कहता हूँ। तदनन्तर क्रमपूर्वक मन्त्र मुद्राप्रभृति का उल्लेखन तथा सूर्य का हृदय में धारण करना चाहिये॥१९५॥

आज्येन व्रीहिभिः पक्वैर्कस्य कुसुमैश्च वा। प्रत्येकमाहुतीर्दद्याद्घे पूज्याः परिकीर्तिताः ॥१९६॥ सूर्य की यहाँ जो पूजा कही गयी है, उनमें प्रत्येक में घृत, पके गेहूँ-यवादि अथवा कुसुम के द्वारा आहुति देनी चाहिये॥१९६॥

ॐ संहर संहर विरोचन ठः ठः—उपसंहारमन्त्रः। ॐ शांतात्मने सर्वलोकप्रियाय ठः ठः—शुद्धिमन्त्रः। ॐ खखोल्काय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो रविः प्रचोदयात्—नमस्कारविद्यावार्कहृदयेन दानः। गच्छागच्छ स्ववर्गेण द्वादशादित्यविग्रहम्। ॐ हिलि हिलि गच्छ देव यथागतः स्वाहा—विसर्जनमन्त्रः। ॐ चण्डपिङ्गलाय ठः ठः—निर्माल्यमन्त्रः।

ॐ संहर संहर विरोचन स्वाहा—यह उपसंहार मन्त्र है। ॐ शान्तात्मने सर्वलोकप्रियाय स्वाहा—शुद्धिमन्त्र है। 'ॐ खखोल्काय विद्महे' इत्यादि मूल में अंकित मन्त्र से नमस्कार विधान द्वारा सूर्यहृदय में (नमस्कार को) दान करे। 'गच्छागच्छ' इत्यादि मन्त्र से विसर्जन करना चाहिये। ॐ चण्डपिङ्गलाय स्वाहा—यह निर्माल्य मन्त्र है।

एतद्यः प्रत्यहं कुर्याद्रविवासर एव च। सकृद्वा यो विधानं च तस्य पुण्यफलं शृणु ॥१९७॥ आयुरारोग्यमैश्वर्यं बलं तेजो यशस्तथा। पुत्रान् प्राप्नोत्यपुत्रश्च सूर्यलोकं स गच्छति ॥१९८॥

जो प्रतिदिन, रविवार को अथवा एक बार भी इस विधान का पालन करते हैं, उनकी पूजा के फल सुनो। वे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, बल, तेज तथा यश प्राप्त करते हैं। अपुत्रक को पुत्र प्राप्त होता है और वह सूर्यलोक में (मरणोपरान्त) जाता है॥१९७-१९८॥

अष्टपुष्टिकाविधिः

देवा ऊचुः अर्के कार्या सदा भक्तिः सर्वकालमतन्द्रितैः। आचार्यस्य गुरूणां च रविशास्त्रविदां तथा ॥१९९॥

अब अष्टपुष्टिका विधि कहते हैं। देवगण कहते हैं—सर्वकाल में आलस्य छोड़कर सूर्य की भक्ति करना उचित है। इसी प्रकार आचार्य की, गुरुगण की तथा सूर्यशास्त्र जानने वालों की भी भक्ति करना उचित है॥१९९॥

पञ्चम्यां तु हविर्भुक्त्वा सायं दशनधावनम्।

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८७

पञ्चम्यां तु हविर्भुक्त्वा सायं दशनधावनम्।
भक्षयित्वा तु गृह्णीयाद् व्रतं नियमपूर्वकम्॥१२०॥
व्यायामं मैथुनक्रोधामत्स्यं मांसं च गृञ्जनम्।
हिंसामधुशिलापृष्ठनिवृत्तं कांस्यभोजनम्॥१२१॥
उदक्याः स्पर्शनं तैलं सर्वनिर्माल्यलङ्घनम्।
षष्ठ्यान्तु वर्जनीयानि सप्तम्यां चैव दीक्षितः॥१२२॥

पञ्चमी के दिन घृत खाकर सायंकाल दाँत साफ करके भक्षण करके नियमपूर्वक व्रत करे। व्यायाम, मैथुन, क्रोध, मत्स्य, मांस, विषाक्त पशुमांस, लहसुन-भक्षण, हिंसा, मधु, शिलापृष्ठ पर लगा तथा कांस्य पात्र में भोजन निषिद्ध है। रजस्वला स्त्री का स्पर्श, तैल, सकल निर्माल्य लंघन—इन सबका षष्ठी तथा सप्तमी को सूर्यपूजा में दीक्षित व्यक्ति परित्याग करे॥१२०-१२२॥

सकलो निष्कलः सूर्य इत्युक्तं हि त्वया विभो।
सकलं निष्कलं चैव समाख्यातुमिहार्हसि॥१२३॥

हे विभु! सूर्य सकल तथा निष्कल हैं, यह आपने कहा है। अतः सकल एवं निष्कल सूर्य के विषय में आपका ही बतलाना उचित है॥१२३॥

देव उवाच

सकलो निष्कलश्चैव यथा सूर्यः प्रकीर्तितः।
कथ्यमानं मया सर्वं निबोधत तथा सुरा॥१२४॥
निर्व्यापारं तथा भूतमासीत्सर्वमिदं जगत्।
निद्रोहममलं ज्ञानं निरानन्दं निरात्मकम्॥१२५॥
अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं चेति यमाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥१२६॥

सूर्यदेव कहते हैं—मैं यह बतलाता हूँ कि सूर्य को सकल तथा निष्कल क्यों कहा गया है। हे देवगण! सुनो। यह समस्त जगत् निर्व्यापार, निर्द्रोह, अमल, ज्ञानरूप, निरानन्द एवं निरात्मक था। जो अव्यक्त कारण है, वह नित्य है। सत् एवं असदात्मक है। तत्त्वविद्गण उसे प्रधान एवं पुरुष कहते हैं॥१२४-१२६॥

गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।
जगद्योनिं तु सर्वार्थं देवशक्यं सनातनम्॥१२७॥
यमाहुः सर्वभूतानां परमं कारणं महत्।
अयमाद्यमजं सूक्ष्मं त्रिगुणप्रभवाव्ययम्॥१२८॥
यमाहुः पुरुषं श्रेष्ठं परमं परमेश्वरम्।

२८८ श्रीसाम्बपुराणम्

येनात्मना सर्वमिदं जगद्व्याप्तं चराचरम्॥१२९॥

वह गन्ध-स्पर्श-रसरहित तथा शब्द-स्पर्शविवर्जित है। जगत् की योनि सर्वार्थ है। देवगण की शंका भी सनातन है। जिनको सभी प्राणीगण का परम महत् कारण कहा गया है, वह आद्य, अज, सूक्ष्म, त्रिगुण-स्वरूप, प्रभव (जिससे सब उत्पन्न होता है) एवं अव्यय भी है। उसे श्रेष्ठ पुरुष परमपरमेश्वर कहते हैं। इस आत्मस्वरूप से ही सचराचर जगत् व्याप्त है॥१२७-१२९॥

जगत्सृष्टिक्षयाव्यक्तश्चोदितः स तदा स्वयम्।
महदादिगुणैर्युक्तस्तेजोरूपसमन्वितः ॥१३०॥
अव्यक्तं कारणं यत्तदुद्दिष्टं त्रिगुणात्मकम्।
स्वयमेकाग्रमापन्नं खखोल्कमिति तत्स्मृतम्॥१३१॥
योगमास्थाय परमं स देवः सर्वतत्त्ववित्।
ततः प्रजाः स्रष्टुमनाः ससर्ज सलिलं पुनः॥१३२॥

जगत् की सृष्टि, क्षय तथा अव्यक्त रूप से वे स्वयं कथित हैं। महदादि गुणों से युक्त तथा तेजोरूप से समन्वित हैं। जिनको अव्यक्त कारण कहा गया है, जो त्रिगुणात्मक हैं, जो एकाग्रतापन्न हैं, उन्हें खखोल्क (सूर्य) कहते हैं। जो देव सर्वतत्त्व के वेत्ता हैं, उन्होंने परम-योग का साहाय्य लेकर प्रजा-सृष्टि की कामना से जल की सृष्टि किया॥१३०-१३२॥

आप एकार्णवे चैव यदस्यायतनङ्गतः।
नारास्ताः सृष्टिकरणे तेन नारायणस्तु सः॥१३३॥
एकार्णवे ततस्तस्मिन्निर्विभागे समन्ततः।
नारायणः खखोल्कोऽसौ सुष्वाप सलिले रविः॥१३४॥
दिव्यं शतसहस्रं च वत्सराणां तदाम्भसि।
तेजोरूपेण महता न्यस्य सत्सलिले स्वयम्॥१३५॥

एकार्णव में जल, जो इनका आयतन (गृह) था, वे सब नर जिसके आश्रित हैं, उनको नारायण कहा जाता है। तदनन्तर चारो ओर निर्विभाग रूप उस एकार्णव जल में खखोल्क सूर्यरूपी नारायण शयन कर रहे थे। तब दिव्य शत-सहस्र वर्ष जल में महान् तेजोरूप उन्होंने निवास किया॥१३३-१३५॥

ततः काले व्यतीते तु कृत्वा त्वण्डं हिरण्मयम्।
आत्मानं सृष्टवांस्तत्र नैकशक्तिसमन्वितः ॥१३६॥
खखोल्क इति चाख्यातस्तत्रैकः संप्रकाशकः।
विराट् यः पुरुषश्चान्यः ख्यातो ब्रह्मेति चापरः॥१३७॥

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८९

पञ्चानां तु सुखादीनां कारणं हि यतः स्मृतः।
खखोल्क इति तेनासौ निगमज्ञैरुदाहृतः ॥१३८॥

तदनन्तर बहुत समय पश्चात् हिरण्मय अण्ड का निर्माण करके वहाँ अनेक शक्ति-समन्वित होकर उन्होंने अपनी सृष्टि किया। वे खखोल्क नाम से प्रसिद्ध थे। वे एक प्रकाशकस्वरूप थे। ‘विराट्’ संज्ञा से अपर पुरुष के रूप में वे ही ख्यात हुये। ये अपर पुरुष ही ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध हैं; क्योंकि ये पञ्च सुखों के हेतु हैं। इसीलिये वेदज्ञ विद्वान् इनको खखोल्क कहते हैं॥१३६-१३८॥

हिरण्येन च गर्भस्थो यस्मादेष समावृतः।
हिरण्यगर्भ इत्येवं तस्मात् स तु निगद्यते ॥१३९॥
बृहत्वाद्वृंहणत्वाद्वा ब्रह्माऽसौ परिकीर्तितः।
पुरे प्रतिष्ठितत्वाच्च पुरुषत्वमुपागतः ॥१४०॥

यह गर्भस्थ स्थिति में स्वर्ण (हिरण्य) द्वारा घिरे हुये थे, अतएव इनको हिरण्यगर्भ कहा जाता है। बृहत्तम तथा सर्वव्यापक होने के कारण इनको ब्रह्मा कहते हैं। पुर (देह) में प्रतिष्ठित होने के कारण ही इनकी प्रसिद्धि ‘पुरुष’ नाम से हुई॥१३९-१४०॥

देवेषु च महादेवो महादेवस्ततः स्मृतः।
सदेशत्वाच्च लोकानामवश्यत्वान्महेश्वरः ॥१४१॥
याति यस्मात्प्रजाः सर्वा प्रजापतिरिति स्मृतः।
स्वयं बभूव पूर्णत्वात्स्वयम्भूरिति विश्रुतः ॥१४२॥
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रभुक्।
सहस्रबाहुः प्रथमः पुरुषोऽसौ निगद्यते ॥१४३॥

देवों में इनको महान् कहा जाता है, अतः ये महादेव हैं। सभी लोकों के शासनकर्त्ता तथा अन्य के वश में न आने वाले होने के कारण इनको महेश्वर कहते हैं। समस्त प्राणीगण इनसे ही उत्पन्न हैं, अतएव ये प्रजापति कहलाते हैं। परिपूर्ण तथा स्वयंजात होने के कारण इनको स्वयम्भू कहा जाता है। सहस्र मस्तक-विशिष्ट पुरुष, जिनके हजारो पैर हैं, जो सहस्र भोक्ता, सहस्र बाहुयुक्त हैं; इसीलिये इनको पुरुष भी कहा गया है (यहाँ सहस्र शब्द असंख्यवाचक है)॥१४१-१४३॥

यत्किञ्चिद्दृश्यते लोके तेजोरूपं प्रकाशकम्।
खखोल्क इति तत्सर्वं निर्दिष्टं लोककारणम् ॥१४४॥
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
विज्ञानमात्रमव्यक्तं तमाहुः कारणं परम् ॥१४५॥

साम्ब०—१९

२९० श्रीसाम्बपुराणम्

इस जगत् में जो कुछ तेजोरूप प्रकाशक वस्तु परिलक्षित हो रही है, वह सब खखोल्क है। ये लोक के हेतु हैं। वे सभी उपाधि से मुक्त हैं। नित्य, सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं। विज्ञानस्वरूप तथा अव्यक्त होने के कारण ही इनको 'कारण' कहा गया है।।१४४-१४५।।

अव्यक्तात्प्रकृतिर्जज्ञे महांस्तु सदसद्गुणः।
महत्तत्त्वादहङ्कारस्तस्मात् सर्वेन्द्रियाणि च॥१४६॥
इन्द्रियाणि च तन्मात्रं सन्निवेश्यात्मनि प्रभुः।
सृष्टवान्सर्वभूतानि खखोल्कः पुरुषः प्रभुः॥१४७॥

अव्यक्त से प्रकृति उत्पन्न है। महान् सत् तथा असत् गुणयुक्त है। महत्तत्त्व से अहंकार तथा अहंकार से इन्द्रियाँ उत्पन्न हैं। समस्त इन्द्रिय तथा तन्मात्रा को अपनी आत्मा में सन्निविष्ट करके प्रभु ने समस्त प्राणियों की सृष्टि की है। अतः खखोल्क पुरुष तथा प्रभु हैं (सबके नियन्ता हैं)।।१४६-१४७।।

खखोल्कात्कारणाद्यस्मादव्यक्तान्तं चतुर्विधम्।
जगद् व्यक्तं समुत्पन्नं विकारैर्महदादिभिः॥१४८॥
स यदा मनसा सार्धं संयोगमधिच्छति।
तदा ही सर्वभूतानां प्रवृत्तिरुपजायते॥१४९॥
आत्मनो दिवसस्यान्ते सर्वकर्मात्मनः स्वयम्।
यः समारोप्यात्मसुखं तेजोराशिः स्वपीत्यसौ॥१५०॥

कारणस्वरूप खखोल्क से अव्यक्तान्त चतुर्विध व्यक्त जगत् महदादि विकार द्वारा समुत्पन्न हुआ है। जब वे मन के साथ संयुक्त हो गये (मन से संकल्प किया) तब समस्त प्राणियों में प्रवृत्ति की उत्पत्ति हो गयी। अपने दिन के अन्तिम भाग में अपने समस्त कर्म का स्वयं में समापन करके आत्मसुख में वे तेजोराशि (सूर्य) शयन करते हैं।।१४८-१५०।।

प्रतिबुद्धः पुनरसौ महाभूतादिभिः सह।
करोति सर्गं स तदा गुणत्रयसमन्वितम्॥१५१॥
एवंविधश्च सप्ताश्वः सहस्रकिरणो ह्यसौ।
सृजति ग्रसते चैव जगत्सर्वं चराचरम्॥१५२॥
तपति प्रकाशते चैव स च गर्जति वर्षति।
स एव तोयस्य पतिः संस्तृतो वडवानलः॥१५३॥
कालाग्निरुद्रो विख्यातः स च स्यान्नीललोहितः।
सर्वतेजोऽधिपो योगी महांल्लोकश्च स स्मृतः॥१५४॥

एकपञ्चाशतमोऽध्यायः २९१

पुनः वे जाग्रत् होकर महाभूतों (पञ्चमहाभूत) के साथ त्रिगुणात्मिका सृष्टि रचते हैं। इस प्रकार सात अश्वों से युक्त सहस्रकिरण सूर्य सचराचर जगत् की सृष्टि करते हैं एवं पुनः उसका ग्रास (संहार) कर देते हैं। वे ताप देते तथा प्रकाश करते हैं। वे ही गर्जनयुक्त वर्षण करते हैं। वे ही जल के पति तथा बड़वानलों के रचयिता भी हैं। वे कालाग्नि रुद्र नाम से ख्यात हैं। वे ही नीललोहित हैं। समस्त तेज के अधिपति, योगी तथा महान् पुरुष हैं॥१५१-१५४॥

अनादिनिधनो ब्रह्माऽक्षरश्चाक्षर एव च।
तस्मात्परतरो नास्ति देवानमपि दैवतम्॥१५५॥
तेन सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।
सर्वात्मानं च तं यान्ति प्रलये समुपस्थिते॥१५६॥
संतापयति लोकांस्त्रींश्चित्रभानुः स्वरश्मिभिः।
वर्षाणां सर्वकामानां पर्जन्य इति स स्मृतः॥१५७॥

वे अनादिनिधन (जिनका आदि भी नहीं है, अन्त भी नहीं है), क्षररहित अक्षर ब्रह्म हैं। उनसे परतर कोई भी नहीं है। वे देवताओं के भी देवता हैं। उनके द्वारा सृष्ट इस समस्त स्थावर-जंगमात्मक जगत् का प्रलय उपस्थित होने पर वे सर्वात्मस्वरूप में प्रवेश कर जाते हैं। चित्रभानु (सूर्य) अपनी रश्मि के द्वारा तीनों लोकों को सन्तप्त करते हैं। समस्त कामनाओं का वर्षण करने के कारण उनको 'पर्जन्य' कहा गया है॥१५५-१५७॥

तेजोरूपेण महता बाह्यतश्चापि तेन वै।
युगान्तवह्निना सर्वमिदं ब्रह्माण्डमावृतम्॥१५८॥

उनके महान् तेज के कारण बाह्यतः दिखाई देने वाली, युग को अन्त करने वाली अग्नि से यह समस्त ब्रह्माण्ड घिरा हुआ है॥१५८॥

संहारकाले च जगद्भुक्त्वा संवर्तकोऽनलः।
भस्मीकरोति त्रैलोक्यं द्वादशादित्यरूपकैः॥१५९॥
स्वर्गधारणाविद्यातः संहारान्नकरोति सः।
ब्रह्मा विष्णुः खखोल्कः सरूपकैर्जगतः क्रमात्॥१६०॥
उद्यन् स पूर्वदिग्भागे गच्छंश्चापि स पश्चिमे।
मेरु-प्रदक्षिणं कुर्वन् जगत्सर्वं प्रकाशते॥१६१॥

संहारकाल में संवर्तक अनल होकर वे द्वादश आदित्यरूप से त्रिभुवन को भस्म कर देते हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु तथा खखोल्क रूप से क्रमशः जगत् की सृष्टि, स्थिति तथा विनाश करते हैं। वे पूर्व दिग् भाग में उदित होकर पश्चिम दिशा के अन्त में जाते-जाते मेरु की प्रदक्षिणा करके समस्त जगत् को प्रकाशित करते हैं॥१५९-१६१॥

२९२ श्रीसाम्बपुराणम्

सर्वभूतशरीराणि यस्मादावृत्य तिष्ठति। अरुणः कीर्तितस्तेन देवोऽसौ सर्वलोकधृक् ॥१६२॥ शश्वच्च जायते यस्माच्छश्वत् संतिष्ठते च यत्। यस्मात् स वै स्मृतः सूर्यो निगमज्ञैर्मनीषिभिः ॥१६३॥ अंशवः किरणाः प्रोक्ताः स्मृतस्तेनांशुमानिति। ऐश्वर्यं परमं तस्य वशगाश्च सुरासुराः ॥१६४॥

वे समस्त प्राणिगण के शरीर को आवृत्त करके अवस्थान करते हैं। अतएव वे अरुण कहे जाते हैं। वे देव समस्त लोकों को धारण करते हैं। वे निरन्तर उत्पन्न होते हैं तथा निरन्तर अवस्थित रहते हैं। इसीलिये उन्हें सूर्य कहा गया है। उनके अंश को किरण कहा जाता है। अतएव सूर्य को अंशुमान कहते हैं। उनका परम ऐश्वर्य है। इसीलिये देवता तथा असुरगण सब उनके वश में हैं।।१६२-१६४।।

इदीति परमैश्वर्ये धातुरिन्द्रस्ततः स्मृतः। अवतीमांस्तु लोकांस्त्रीन् यस्मादेष परिभ्रमन् ॥१६५॥ अवेति रक्षणे धातुस्तस्मात् स च रविः स्मृतः। गभस्तिभिः समायोगाद् गभस्तिदेव उच्यते ॥१६६॥

‘इदि’ धातु परम ऐश्वर्य के अर्थ में प्रयुक्त होती है। इसीलिये उनको इन्द्र कहा गया है। ये परिभ्रमण करके तीनों लोकों का पालन करते हैं। ‘अव्’ धातु का प्रयोग रक्षा के अर्थ में किया जाता है। इसलिये इनको रवि कहते हैं। किरणों (गभास्ति) के समायॊग के कारण ये ‘गभस्तिदेव’ कहे गये हैं।।१६५-१६६।।

संयच्छते यतः सर्वान् यमस्तेन स उच्यते। प्रजाः संसृजतो रेतः स्वर्णमस्याद्रवत् पुरा। सुवर्णरेतास्ततो देवैः कीर्तितोऽसौ दिवाकरः ॥१६७॥ सृजत्येष प्रजास्त्वष्टो यस्मात्त्वष्टा ततः स्मृतः। त्वष्टृत्वेनापि यत्सर्वमौषधीष्वेव यः स्थितः ॥१६८॥

सबको संयत करने के कारण ये ‘यम’ हैं। पूर्व में प्रजागण की सृष्टि के समय इनका सुवर्णमय रेत स्खलित हुआ। अतः इनको सुवर्णरेता कहा जाता है। विश्वकर्मारूपेण प्रजागण की ये सृष्टि करते हैं; अतः इन्हें त्वष्टा कहा जाता है। त्वष्टृत्वरूप से (सूत्रधारण रूप से) सभी औषधियों में ये ही अवस्थित हैं।।१६७-१६८।।

स्नेहेन सर्वभूतानि यस्माद् भजति भास्करः। बन्धुभूतो हि जगतो मित्रस्तेन स कीर्तितः ॥१६९॥

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २९३

यस्माज्जातमिदं सर्वमादित्येनेह रश्मिभिः। प्रवेशनात्पालनाच्च विष्णुस्तेन स कीर्तितः॥१७०॥ प्रणवेन समायुक्तः सप्तबीजः स्मृतस्तु सः। मूलमन्त्रं खखोल्कस्य देवस्यामिततेजसः॥१७१॥

भास्कर स्नेहवशात् समस्त प्राणियों का भजन करते हैं। समस्त जगत् के बन्धु-स्वरूप हैं। अतः इनको मित्र कहा गया है। आदित्य रश्मियों द्वारा इस जगत् के सब कुछ को उत्पन्न करते हैं। उनके प्रवेश तथा पालन के कारण वे 'विष्णु' नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रणवयुक्त सप्तबीज अमित तेजस्वी खखोल्क का मूल मन्त्र कहा गया है—ॐ खखोल्काय स्वाहा॥१६९-१७१॥

प्रणवो दीपकस्तस्य मकारः साम्प्रदायिकः। स्वाहाकारनमस्कारौ कुर्यात्पूजा पदे स्थितौ॥१७२॥ वर्णत्रयं तु यच्छेषं खखोल्क इति संज्ञितम्। तन्महाभूतभेदैस्तु भिद्यते पञ्चधा पुनः॥१७३॥ खकारः खं विनिर्दिष्टं सूर्यत्वात् पार्थयोगतः। अनादिनिधनं शुद्धं तस्य शब्दं गुणं विदुः॥१७४॥

प्रणव उनका दीपक है। मकार साम्प्रदायिक है। स्वाहा एवं नमः शब्द पूजनकाल में व्यवहृत होता है। शेष तीन वर्ण 'खखोल्क'—यह सूर्य का नाम है। वह महाभूत के भेद से पुनः पाँच प्रकार का हो जाता है। खकार शब्द आकाश का निर्देश करने वाला है। पार्थयोग से सूर्य अनादि निधन, शुद्ध हैं। शब्द उनका गुण कहा गया है॥१७२-१७४॥

सज्जनात्सर्जनाच्चैव ककारो वायुरुच्यते। स्पर्शस्तस्य गुणो ज्ञेयः पूर्वश्वासविकारतः॥१७५॥ ओरस्तेजो विज्ञेयं तच्च रूपगुणं स्मृतम्। विकारात्पूर्वयोगश्च तद्गुणाभ्यां च संशयः॥१७६॥ लपनात्प्रलयाच्चैव लकारो वरुणः स्मृतः। रसेन पूर्वैश्च गुणैरप्युक्तत्वाच्चतुर्गुणः॥१७७॥ ककारा संस्मृता पृथ्वी पित्र्यागम्यगुणा तु सा। पूर्वैश्चतुर्भिश्श्च गुणैर्युक्ता पञ्चगुणा भवेत्॥१७८॥

सज्जन (सुजात) तथा सर्जन (सृष्टि) के कारण 'क' शब्द को वायु कहा गया है। उसका गुण है—स्पर्श। पूर्वश्वास विकार से उसे समझा जाता है (?)। ओकार को तेज जानना चाहिये। वह रूप का गुण है। विकार-हेतु को पूर्वयोग और उसके गुण द्वारा जाना जाता है (?)। लपन (मुख) तथा प्रलय हेतु 'ल'कार शब्द से वरुण को कहा जाता है।

२९४ श्रीसाम्बपुराणम्

रस तथा पूर्वगुणों के द्वारा इसे चतुर्गुण कहते हैं। ककार शब्द पृथ्वी का वाचक है। वह पृथिवी पिता का गुण (गन्ध) प्राप्त करती है तथा पूर्व के चार गुण (शब्द-स्पर्श रूप-रस) से युक्त होकर पञ्चगुण-विशिष्ट हो जाती है॥१७५-१७८॥

खखोल्क इति यत्प्रोक्तं महाभूतानि पञ्च तत्।
प्राणाद्या वायवः पञ्च तथा बुद्धीन्द्रियाणि च॥१७९॥
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव सत्त्वाद्यास्तद्गुणास्त्रयः।
मनोबुद्धिरहङ्कार इत्येतदपरत्रयम्॥१८०॥
खखोल्कानीति बीजानि चोक्तान्येकोनविंशतिः।
षड्विंशकेतनासञ्च सर्वव्याप्तमनेन तु॥१८१॥

खखोल्क = पञ्चमहाभूत, प्राणादि पञ्चवायु तथा बुद्धि, इन्द्रियाँ एवं पाँच कर्मेन्द्रिय तथा उनके सत्त्वादि तीन गुण, मन-बुद्धि-अहंकार। इस प्रकार खखोल्क एवं १९ बीज कहे गये। २६ चिह्नों द्वारा सब कुछ इसी से व्याप्त है॥१७९-१८१॥

स एव देव उत्पाद्यानुष्ठाद्यात्मानमात्मना।
सर्वं करोति जगतः पालनं प्रलयं तथा॥१८२॥
आदित्यः सततं नाम तपत्येष मरीचिभिः।
वह्निः सहस्रकिरणवृत्तं कुम्भनिभं स्मृतम्॥१८३॥
नदीनदसमुद्रेभ्यः सर्वेभ्यः सलिलं ह्यसौ।
किरणानां सहस्रेण समादत्ते सदा रविः॥१८४॥

वे देव स्वयं ही स्वयं को उत्पन्न करके तथा अनुष्ठान करके जगत् का पालन-प्रलयादि सब कुछ करते हैं। आदित्य निरन्तर अपनी किरणों से ताप प्रदान करते हैं। अग्नि को सहस्र किरण वृत्त कुम्भतुल्य कहा गया है। सभी नद-नदी तथा समुद्र से रवि अपनी किरणों से जल खींचते रहते हैं, संग्रह करते रहते हैं॥१८२-१८४॥

अस्तकाले खखोल्कस्य प्रभापादेन पावकम्।
समाविशति सूर्यं च दिवा तच्चापि पावकः॥१८५॥
एवमेतद्भवेद्धेतुः परस्परनिवेशनात्।
प्राकाश्यमौष्णवृत्तिं च कुरुते हि दिवानिशि॥१८६॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष देवो महेश्वरः।
ऋचो यजूंषि सामानि एष एव न संशयः॥१८७॥

अस्तगमन काल में खखोल्क की प्रभा का एक पाद अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है। दिन में अग्नि उसे सूर्य को प्रदान करते हैं। परस्पर निवेशन के फल का यही कारण है।

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २९५

ये दिन-रात प्रकाश तथा उष्णता देते हैं। ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही हैं— ऋक्, यजुः तथा साम। इस विषय में कोई सन्देह नहीं है॥१८५-१८७॥

उद्यन् स दीप्यते ऋग्भिर्मध्याह्ने यजुभिस्तथा। सामभिश्चैव सायाह्ने भास्करः प्रतपत्यसौ ॥१८८॥ त्रीणि रश्मीनि तस्यैव भूलोकन्द्योतयन्त्यधः। चत्वारि तु पितॄंस्तिर्यक् त्रीण्येवोर्ध्वसुरालयम् ॥१८९॥

उदयकाल में सूर्य ऋक् समूह द्वारा दीप्ति प्राप्त करते हैं। मध्याह्न में यजुःसमूह द्वारा तथा सन्ध्याकाल में सामसमूह द्वारा भास्कर ताप प्रदान करते हैं। उनकी तीन रश्मि भूलोक तथा अधःलोक को प्रकाशित करती है। चार रश्मि पितृलोक को तथा तीन तिर्यक् रश्मि ऊर्ध्व देवलोक को आलोकित करती है॥१८८-१८९॥

सुषुम्नो हरिवेशश्च विश्वकर्मा तथैव च। विश्वव्यचा पुनश्चान्यः संयद्वसुरथापरः ॥१९०॥ उदावसुः पुनश्चान्यः पुरोऽन्यः परिकीर्तितः। रवेः करसहस्राद्धि सप्तश्रेष्ठास्तु रश्मयः ॥१९१॥ एवं हि रश्मिभिर्देवो जगत्सर्वं प्रकाशते। तथा वर्द्धयति क्षीणं क्रमतोऽयं निशाकरम् ॥१९२॥ एवं हि स्वल्प उद्दिष्टः सर्वव्यापी दिवाकरः। अध्वरैर्विविधैः पुण्यैरीज्योऽसौ पापनाशनः ॥१९३॥

सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संयद्वसु, उदावसु तथा पुर—ये सूर्यकिरणों में से सात श्रेष्ठ रश्मियाँ हैं। सूर्यदेव इन रश्मियों द्वारा समस्त जगत् को प्रकाशित करते हैं तथा क्रमश क्षीण चन्द्र को वर्द्धित करते हैं। यहाँ कुछ सामान्य रूप से कहा गया दिवाकर विश्वव्यापी है। पापनाशक दिवाकर पुण्यरूप विविध यज्ञों द्वारा पूजित होते हैं॥१९०-१९३॥

तस्य तावत्खखोल्कस्य महाध्वरविधिं शुभम्। शृणुष्वाख्यायमानं वै पश्चाच्छ्रोष्यथ निष्कलम् ॥१९४॥ नमः सवित्रे देवाय समीहितफलप्रदः। अदीक्षितस्तु यः कश्चिदिदन्तन्त्रं विचारयेत् ॥१९५॥ स कुष्ठी भवति क्षिप्रं प्रेत्येह नरकं व्रजेत्।

इन खखोल्क के मंगलकारी महायज्ञों की विविध कथा कहता हूँ, सुनो। तदनन्तर निष्कल की बात सुनना। देव सविता को नमस्कार है, जो सम्यक् रूप से पूजित होकर