भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 424 में से

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पृष्ठ 289

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २७९

तारादितेजोऽधिपतिर्यस्त्वयैव नमस्कृतः। अर्कायाप्य गृहाणेति ह्यमृतेति निवेदने ॥७९॥

आदि में तार (ॐ) लगाकर जल निवेदन करना चाहिये; मन्त्र है—ॐ तेजोऽधिपतये अर्काय नमः अमृतं गृहाण।।७९।।

जलकुन्दलायेत्यादौ दिव्यातोद्यप्रियाय च। प्रणवादिनमोऽन्ताय मत्तोद्ये मन्त्र उच्यते ॥८०॥

ॐ जलकुन्दलाय दिव्यातोद्यप्रियाय नमः—इसे मत्तोद्य मन्त्र कहा गया है।।८०।।

अंशुमानथ देवश्च द्वौ शब्दौ गीयतेति च। ॐ स्वाहाद्यन्तसंयुक्तो न्यासमन्त्र उदाहृतः ॥८१॥

अंशुमान् तथा देव शब्द के पूर्व में ‘ॐ’ तथा अन्त में स्वाहा लगाने से न्यास मन्त्र होता है—ॐ अंशुमान् देवाय स्वाहा।।८१।।

आदौ नमस्ते इत्येव दिव्यरूपाय चेत्यथ। सर्वभूतात्मने चैव नमः सर्वस्य तेजसे ॥८२॥ तथाधिपतयेत्येवं भानवे लोकचक्षुषे। नम ओंकारसंयुक्तः स्तोत्रमन्त्र उदाहृतः ॥८३॥

‘ॐ नमस्ते दिव्यरूपाय सर्वभूतात्मने नमः सर्वतेजसे ताराधिपतये भानवे लोकचक्षुषे नमः—यह स्तोत्र मन्त्र कहा गया है।।८२-८३।।

नमस्कारान्तिका पूजा इह एषा उदाहृता। स्वाहावषट्कारयुता होमे चानेन तर्पयेत् ॥८४॥

शेष में ‘नमः’ शब्द का योग करके पूजा की जाती है। स्वाहा तथा वषट्कार का योग करके होम तथा तर्पण किया जाता है (स्वाहा से होम एवं वषट् से तर्पण)।।८४।।

आदौ तारसमायुक्तं संहरेति पदद्वयम्। विरोचनेति स्वाहान्तो मन्त्रः संहारसंज्ञकः ॥८५॥

ॐ संहर संहर वैरोचनाय स्वाहा—यह संहारमन्त्र है।।८५।।

आदौ शान्तात्मने कृत्वा सर्वलोकजयाय च। तारादिकः शुद्धमन्त्रः स्वाहान्तः परिकीर्तितः ॥८६॥ खखोल्कायेति कृत्वा यस्तत्पश्चाद्विग्रहेति च। सहस्रकिरणायेति धीमहीति तु चापरम् ॥८७॥ तन्नो रविः प्रचोदयादित्योङ्कारादिसंयुतः। स्वाहान्तो हि नमस्कारो विधेयः सम्प्रकीर्तितः ॥८८॥

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