भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 424 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 290

२८० श्रीसाम्बपुराणम्

ॐ शान्तात्मने सर्वलोकजयाय स्वाहा—इसे शुद्धमन्त्र कहते हैं। ॐ खखोल्काय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो रविः प्रचोदयात्—इसके अन्त में 'स्वाहा' लगाकर नमस्कार करने का नियम है॥८६-८८॥

स्वर्गेणेति च वास्यादौ द्विर्गच्छेति सविग्रहम्।
द्वादशादित्य इति द्विर्हिलीत्योङ्कारसंयुतम्॥८९॥
गच्छ देवेति च ततः कृत्वा चापि यथागतम्।
मन्त्रः प्रणवादिरेष स्यात् स्वाहान्तो हि विसर्जने ॥९०॥

'ॐ गच्छ गच्छ दिवं द्वादशादित्य हिलि हिलि ॐ गच्छ देव यथागतं स्वाहा'—यह विसर्जन मन्त्र है।

आदावोङ्कारसंयुक्तश्चण्डपिङ्गल इत्ययम्।
निर्माल्यहरणे मन्त्रः स्वाहान्तः परिकीर्तितः॥९१॥
प्रागुद्दिष्टे भुवो भागे देवीं शुद्धमृदोद्भवाम्।
चतुरस्रां विदिक्कोणां कुर्यात्प्राक्प्रवणोत्तराम्॥९२॥

आदि में 'ॐ' तदनन्तर 'चण्डपिङ्गल' तदनन्तर 'स्वाहा' अर्थात् 'ॐ चण्डपिङ्गल स्वाहा' मन्त्र से (चण्डपिङ्गल को) निर्माल्य प्रदान करे। (विधानोक्त) पूर्वनिर्दिष्ट भूमि पर शुद्ध मृत्तिका द्वारा निर्मित देवी को चतुरस्र विदिक् कोण तथा पूर्व की ओर प्रवणोत्तरा करे॥९१-९२॥

गोमयेनोपलिप्यादौ समृदा च भुवं तथा।
चन्दनागुरुपङ्केन कुर्यादर्चनमण्डलम् ॥९३॥

मृत्तिका तथा गोमय (गोबर) के द्वारा भूमिभाग में प्रथमतः लेपन करे। तत्पश्चात् चन्दन एवं अगुरु द्वारा पूजा की वेदी बनाये॥९३॥

वक्ष्यमाणविधानेन स्यन्दनं शश्वदालिखेत्।
पूजाविधाने ध्येयः स्यात्तत्र देवो रविः स्थितः॥९४॥
सप्तभिः सप्तभिर्युक्तं हरिद्भिरहियोक्तृभिः।
एकचक्रं रथं तस्य चिन्तयेदरुणान्वितम्॥९५॥

वक्ष्यमाण विधानोक्त रथ अंकित करे। पूजाविधान में उस स्थान में सूर्य का ध्यान करे। सात-सात हरित् वर्ण अश्व द्वारा वाहित एक चक्रयुक्त विशिष्ट तथा अरुण युक्त सूर्य के रथ का चिन्तन करना चाहिये॥९४-९५॥

रवे रजं मासदलं शुभ्रं मध्ये रथस्य तु।
ध्यात्वा तत्कर्णिकामध्ये वह्निशृङ्गशिखोज्ज्वलम्॥९६॥