साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २८१
आवाहनेन मन्त्रेण मुद्रया व्योमसंज्ञया।
कुर्वीत रश्मिनिचयं तमेकत्र पृथक् स्थितः ॥९७॥
पिण्डीकृत्य च तत्तेजो मूलमन्त्रेण चार्कवत्।
तत्र तत्स्थापयेद् व्योम्नि मन्त्रेण स्थापनेन तु ॥९८॥
रवि के रथ में (मध्य में) मासरूप दलविशिष्ट (द्वादशदल) शुभ्र कमल का ध्यान करे। उसकी कर्णिकामध्ये में अग्नि, शङ्ख तथा शिखा के समान उज्ज्वल वर्ण रश्मि-समूह को आकाश मुद्रा तथा आवाहन मन्त्र से एकत्र रूप तथा पृथक् रूप स्थित तेज को सूर्य के मूल मन्त्र से पिण्डीकृत करके आकाश में स्थापन मन्त्र द्वारा स्थापित करना चाहिये।।९६-९८।।
तत्रस्थं चिन्तयेद् देवं षड्बीजं प्रणवान्वितम्।
हृदादिभिर्यथायोगं षड्भिरङ्गैः समन्वितम् ॥९९॥
कण्ठादापादसंवीतं पद्महस्तं महाप्रभम्।
खखोल्कं चिन्तयेद्देवं द्वादशादित्यदैवतम् ॥१००॥
उस आकाश-स्थित देव का चिन्तन करे, जो षड्बीज तथा प्रणवयुक्त हैं। यथायुक्त हृदयादि छः अंगों से समन्वित भी हैं। वे कण्ठ से लेकर पैरों पर्यन्त कान्तिमान हैं। पद्महस्त, महाप्रभायुक्त द्वादश आदित्यों के दैवत रूप में खखोल्क (सूर्य) देव का चिन्तन करे।।९९-१००।।
शिरोऽथ हृदयं चैव शिखां कवचमेव च।
एतानि क्रमतोऽङ्गानि पूजयेद्व्योममूर्द्धनि ॥१०१॥
पद्मपत्राग्रवृन्दान्ते ज्वलदस्तं तथैव च।
महाश्वेतो दण्डपाणिररुणः पिङ्गलस्तथा ॥१०२॥
दिक्षु केसरमूले तु न्यस्य ऐन्द्रीक्रमादिमे।
केशराग्रे तु पद्मस्य पत्रेष्वभ्यर्च्य पूर्ववत् ॥१०३॥
तत्र तत्कर्णिकामध्ये तेजोरूपं तु चिन्तयेत्।
विन्यसेद् द्वादशादित्यान् इन्द्रादीन् हि यथाक्रमम् ॥१०४॥
सूर्यदेव के मस्तक, हृदय, शिखा तथा कवच—इन अंगों की आकाश में क्रमशः पूजा करनी चाहिये। पद्म पत्र के आगे एवं वृन्दान्त में प्रज्वलित तथा अस्तमित महाश्वेत, दण्डपाणि (इन्द्र), अरुण (सूर्य के सारथी), पिङ्गल (अग्नि) की तथा इसी प्रकार पूर्वादि दिक् के केशरमूल में तथा केसराग्र में एवं पद्म के पत्रों में पहले की तरह अर्चना करके उसकी कर्णिका में तेजोरूप का चिन्तन करे। यथाक्रमेण रुद्रादि द्वादश आदित्यों का विन्यास करे।।१०१-१०४।।