भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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२८२ || श्रीसाम्बपुराणम् ||

हरिकेशस्तथा चैन्द्री रथकृच्छ्ररथौजसौ। पुञ्जिक्रतुस्थलयुतौ योज्यौ सव्यापसव्ययोः ॥१०५॥ न्येसेदाभ्यां विश्वकर्मा पार्श्वयोश्च रथस्वनः। रथचित्रश्च मेनाख्या सहजन्यान्वितौ तथा ॥१०६॥ विश्वव्यचाः प्रतीच्यां तु न्यस्य चाश्वसमीपतः। पार्श्वयोरथ प्रोतश्च माठरोऽथ प्रकीर्तितः ॥१०७॥

हरिकेश, ऐन्द्री, रथकृच्छ्र, रथौज तथा बाँयीं एवं दाहिनी ओर पुञ्जिक्रतु तथा स्थलयुक्त को युक्त करे। विश्वकर्मा ने उभय पार्श्व में रथस्वन तथा रथचित्र को मेना एवं सहजनी के साथ युक्त किया है। पश्चिम दिशा में अश्व के निकट विश्वव्यचा को स्थापित किया है। पार्श्व में प्रोत तथा माठर (यम) की स्थिति कही गयी है॥१०५-१०७॥

प्रम्लोचाम्लोविसंयुक्तो देवदेवस्य कीर्तितः। संयद्वसूकस्तूत्तरस्यां तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिनौ ॥१०८॥ विश्वाचीघृताचीभ्यां संयुक्तौ सव्यवामतः। ऊर्ध्वमर्वावसुस्तस्य सेनजिच्च सुषेणकः ॥१०९॥ उर्वशी पूर्वचित्तिश्च सहस्ताभ्यां यथाक्रमम्। दीप्ताननाद्या ये प्रोक्ता द्वादशार्कगणाधिपाः ॥११०॥

प्रम्लोचा तथा म्लोवि संयुक्त देवदेव की महिमा कीर्तित हुई है। ऐसे ही उत्तर में संयद्वसु, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि तथा दाहिनी ओर विश्वाची एवं बाँयीं ओर घृताची स्थित हैं। ऊर्ध्व में अर्वावसु तथा सेनजित् एवं सुषेण हैं। उनके साथ यथाक्रम से उर्वशी तथा पूर्वचित्ति हैं। ये उज्ज्वल वदन द्वादश सूर्य के गणाधिप कहे गये हैं॥१०८-११०॥

ते हि पूर्वात्समारभ्य तस्याः पर्णस्य सन्धिषु। क्षुपाद्या पर्णतो न्यस्या कंदराया रथस्य तु ॥१११॥ दिग्विदिग्ग्रहपर्यन्ते चन्द्राद्या इन्द्रदिक्क्रमात्। वासवादींश्च दिग्देवान् न्यसेद्दिक्षु दशस्वपि ॥११२॥

पूर्व से प्रारम्भ करके पत्तों की सन्धियों तथा क्षुपादि अन्य पर्ण-पर्यन्त, रथ के कन्दर में, दिग् विदिग् ग्रह-पर्यन्त, पूर्व दिक् क्रम से चन्द्रादि एवं दश दिशाओं में वासवादि दिक् देवताओं का विन्यास करे॥१११-११२॥

एवं विन्यस्य सर्वांस्तु ततः कुर्वीत पूजनम्। अथ मन्त्रान्नवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥११३॥

इस प्रकार सभी का विन्यास करके पूजन करना चाहिये। अब आनुपूर्वीक मन्त्रों को यथावत् कहता हूँ॥११३॥