भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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२७८ श्रीसाम्बपुराणम्

अर्वाग्वसुः सेनजिच्च सुषेणश्चोर्वशी तथा।
पूर्वचित्तिश्च संयोज्याः पूज्याः मन्त्रविधानतः॥७२॥

हरिकेश, रथकृच्छ्र, रथौजा, पुञ्जिकस्थल, क्रतुस्थल, विश्वकर्मा, रथस्वन, रथचित्र, मेना एवं सहजादि अप्सरागण, विश्वव्यचा, रथप्रोत, सहास, माठर (यम), प्रम्लोचन्ती, अनुम्लोचन्ती, संयद्द्रसु, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, विश्वाची, घृताचिका, अर्वाग्वसु, सेनजित्, सुषेण, उर्वशी तथा पूर्वचित्ति—इनकी यथाविधान मन्त्र से पूजा करनी चाहिये।।६९-७२।।

दीप्ताननः कुमारश्च घृणिर्योगवहो विराट्।
केशीसूणपरिष्टौ च माठरानन्तनिक्षुभाः॥७३॥
तेजोवाह इति ख्याता द्वादशार्कगणाधिपः।
एते स्वनामतोऽभ्यर्च्य नमोऽन्ताः प्रणवादिकाः॥७४॥

दीप्तानन, कुमार, घृणि, योगवह, विराट्, केशीसूण, परिष्ट, माठर, अनन्त, निक्षुभा तथा तेजोवाह—ये बारहो सूर्य के गणाधिप हैं। इनके नाम के पूर्व में प्रणव तथा अन्त में नमः लगाकर अर्चन करनी चाहिये। जैसे—ॐ दीप्ताननाय नमः, ॐ कुमाराय नमः इत्यादि प्रकार से।।७३-७४।।

क्षुभामैत्रीप्रभाश्यामारोचिर्दीप्तिः सुवर्चला।
योज्यास्तारादिसंयुक्ता नमोऽन्ता सप्त मातरः॥७५॥

क्षुभा, मैत्री, प्रभा, श्यामा, रोचि, दीप्ति, सुवर्चला—ये सातो मातृगण हैं। इनके आदि में ॐ तथा अन्त में नमः लगाकर पूजा करनी चाहिये।।७५।।

वक्रं शुक्रं गुरुं भौमं सौरिं केतुं बुधाननौ।
सहुङ्कारान्सप्रणवान्नमोऽन्तान्योजयेद् ग्रहान्॥७६॥

वक्र (क्रूरगति) रवि, शुक्र, गुरु, मंगल, शनि, केतु, बुध तथा राहु—इन नामों के आदि में ‘हुं’ तथा ‘ॐ’ एवं अन्त में नमः लगाकर पूजा करनी चाहिये।।७६।।

इन्द्रोऽग्निर्यमो निर्ऋतिर्वरुणो वायुरेव च।
कुबेरः शङ्करो ब्रह्मा शेषश्चेति दिगीश्वराः॥७७॥
एतेष्वनव संयुक्तास्तथाधिपतियोजिताः।
नमस्कारान्तसंयुक्ताः संयोज्या नामतो दश॥७८॥

इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, शंकर, ब्रह्मा तथा शिव—ये दिगीश्वर हैं अर्थात् पूर्वादि दिक् के अधीश्वर हैं। इन दस लोगों के नाम के पश्चात् जो जिस दिक् का अधिपति है, उसका उल्लेख करके अन्त में ‘नमः’ लगाकर पूजा करनी चाहिये। जैसे—पूर्वाधिपतये इन्द्राय नमः, पूर्वदक्षिणकोणाधिपतये अग्नये नमः, दक्षिणाधिपतये यमाय नमः इत्यादि।।७७-७८।।