भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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२९२ श्रीसाम्बपुराणम्

सर्वभूतशरीराणि यस्मादावृत्य तिष्ठति। अरुणः कीर्तितस्तेन देवोऽसौ सर्वलोकधृक् ॥१६२॥ शश्वच्च जायते यस्माच्छश्वत् संतिष्ठते च यत्। यस्मात् स वै स्मृतः सूर्यो निगमज्ञैर्मनीषिभिः ॥१६३॥ अंशवः किरणाः प्रोक्ताः स्मृतस्तेनांशुमानिति। ऐश्वर्यं परमं तस्य वशगाश्च सुरासुराः ॥१६४॥

वे समस्त प्राणिगण के शरीर को आवृत्त करके अवस्थान करते हैं। अतएव वे अरुण कहे जाते हैं। वे देव समस्त लोकों को धारण करते हैं। वे निरन्तर उत्पन्न होते हैं तथा निरन्तर अवस्थित रहते हैं। इसीलिये उन्हें सूर्य कहा गया है। उनके अंश को किरण कहा जाता है। अतएव सूर्य को अंशुमान कहते हैं। उनका परम ऐश्वर्य है। इसीलिये देवता तथा असुरगण सब उनके वश में हैं।।१६२-१६४।।

इदीति परमैश्वर्ये धातुरिन्द्रस्ततः स्मृतः। अवतीमांस्तु लोकांस्त्रीन् यस्मादेष परिभ्रमन् ॥१६५॥ अवेति रक्षणे धातुस्तस्मात् स च रविः स्मृतः। गभस्तिभिः समायोगाद् गभस्तिदेव उच्यते ॥१६६॥

‘इदि’ धातु परम ऐश्वर्य के अर्थ में प्रयुक्त होती है। इसीलिये उनको इन्द्र कहा गया है। ये परिभ्रमण करके तीनों लोकों का पालन करते हैं। ‘अव्’ धातु का प्रयोग रक्षा के अर्थ में किया जाता है। इसलिये इनको रवि कहते हैं। किरणों (गभास्ति) के समायॊग के कारण ये ‘गभस्तिदेव’ कहे गये हैं।।१६५-१६६।।

संयच्छते यतः सर्वान् यमस्तेन स उच्यते। प्रजाः संसृजतो रेतः स्वर्णमस्याद्रवत् पुरा। सुवर्णरेतास्ततो देवैः कीर्तितोऽसौ दिवाकरः ॥१६७॥ सृजत्येष प्रजास्त्वष्टो यस्मात्त्वष्टा ततः स्मृतः। त्वष्टृत्वेनापि यत्सर्वमौषधीष्वेव यः स्थितः ॥१६८॥

सबको संयत करने के कारण ये ‘यम’ हैं। पूर्व में प्रजागण की सृष्टि के समय इनका सुवर्णमय रेत स्खलित हुआ। अतः इनको सुवर्णरेता कहा जाता है। विश्वकर्मारूपेण प्रजागण की ये सृष्टि करते हैं; अतः इन्हें त्वष्टा कहा जाता है। त्वष्टृत्वरूप से (सूत्रधारण रूप से) सभी औषधियों में ये ही अवस्थित हैं।।१६७-१६८।।

स्नेहेन सर्वभूतानि यस्माद् भजति भास्करः। बन्धुभूतो हि जगतो मित्रस्तेन स कीर्तितः ॥१६९॥