भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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एकपञ्चाशतमोऽध्यायः २९१

पुनः वे जाग्रत् होकर महाभूतों (पञ्चमहाभूत) के साथ त्रिगुणात्मिका सृष्टि रचते हैं। इस प्रकार सात अश्वों से युक्त सहस्रकिरण सूर्य सचराचर जगत् की सृष्टि करते हैं एवं पुनः उसका ग्रास (संहार) कर देते हैं। वे ताप देते तथा प्रकाश करते हैं। वे ही गर्जनयुक्त वर्षण करते हैं। वे ही जल के पति तथा बड़वानलों के रचयिता भी हैं। वे कालाग्नि रुद्र नाम से ख्यात हैं। वे ही नीललोहित हैं। समस्त तेज के अधिपति, योगी तथा महान् पुरुष हैं॥१५१-१५४॥

अनादिनिधनो ब्रह्माऽक्षरश्चाक्षर एव च।
तस्मात्परतरो नास्ति देवानमपि दैवतम्॥१५५॥
तेन सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।
सर्वात्मानं च तं यान्ति प्रलये समुपस्थिते॥१५६॥
संतापयति लोकांस्त्रींश्चित्रभानुः स्वरश्मिभिः।
वर्षाणां सर्वकामानां पर्जन्य इति स स्मृतः॥१५७॥

वे अनादिनिधन (जिनका आदि भी नहीं है, अन्त भी नहीं है), क्षररहित अक्षर ब्रह्म हैं। उनसे परतर कोई भी नहीं है। वे देवताओं के भी देवता हैं। उनके द्वारा सृष्ट इस समस्त स्थावर-जंगमात्मक जगत् का प्रलय उपस्थित होने पर वे सर्वात्मस्वरूप में प्रवेश कर जाते हैं। चित्रभानु (सूर्य) अपनी रश्मि के द्वारा तीनों लोकों को सन्तप्त करते हैं। समस्त कामनाओं का वर्षण करने के कारण उनको 'पर्जन्य' कहा गया है॥१५५-१५७॥

तेजोरूपेण महता बाह्यतश्चापि तेन वै।
युगान्तवह्निना सर्वमिदं ब्रह्माण्डमावृतम्॥१५८॥

उनके महान् तेज के कारण बाह्यतः दिखाई देने वाली, युग को अन्त करने वाली अग्नि से यह समस्त ब्रह्माण्ड घिरा हुआ है॥१५८॥

संहारकाले च जगद्भुक्त्वा संवर्तकोऽनलः।
भस्मीकरोति त्रैलोक्यं द्वादशादित्यरूपकैः॥१५९॥
स्वर्गधारणाविद्यातः संहारान्नकरोति सः।
ब्रह्मा विष्णुः खखोल्कः सरूपकैर्जगतः क्रमात्॥१६०॥
उद्यन् स पूर्वदिग्भागे गच्छंश्चापि स पश्चिमे।
मेरु-प्रदक्षिणं कुर्वन् जगत्सर्वं प्रकाशते॥१६१॥

संहारकाल में संवर्तक अनल होकर वे द्वादश आदित्यरूप से त्रिभुवन को भस्म कर देते हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु तथा खखोल्क रूप से क्रमशः जगत् की सृष्टि, स्थिति तथा विनाश करते हैं। वे पूर्व दिग् भाग में उदित होकर पश्चिम दिशा के अन्त में जाते-जाते मेरु की प्रदक्षिणा करके समस्त जगत् को प्रकाशित करते हैं॥१५९-१६१॥