साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें२९० श्रीसाम्बपुराणम्
इस जगत् में जो कुछ तेजोरूप प्रकाशक वस्तु परिलक्षित हो रही है, वह सब खखोल्क है। ये लोक के हेतु हैं। वे सभी उपाधि से मुक्त हैं। नित्य, सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं। विज्ञानस्वरूप तथा अव्यक्त होने के कारण ही इनको 'कारण' कहा गया है।।१४४-१४५।।
अव्यक्तात्प्रकृतिर्जज्ञे महांस्तु सदसद्गुणः।
महत्तत्त्वादहङ्कारस्तस्मात् सर्वेन्द्रियाणि च॥१४६॥
इन्द्रियाणि च तन्मात्रं सन्निवेश्यात्मनि प्रभुः।
सृष्टवान्सर्वभूतानि खखोल्कः पुरुषः प्रभुः॥१४७॥
अव्यक्त से प्रकृति उत्पन्न है। महान् सत् तथा असत् गुणयुक्त है। महत्तत्त्व से अहंकार तथा अहंकार से इन्द्रियाँ उत्पन्न हैं। समस्त इन्द्रिय तथा तन्मात्रा को अपनी आत्मा में सन्निविष्ट करके प्रभु ने समस्त प्राणियों की सृष्टि की है। अतः खखोल्क पुरुष तथा प्रभु हैं (सबके नियन्ता हैं)।।१४६-१४७।।
खखोल्कात्कारणाद्यस्मादव्यक्तान्तं चतुर्विधम्।
जगद् व्यक्तं समुत्पन्नं विकारैर्महदादिभिः॥१४८॥
स यदा मनसा सार्धं संयोगमधिच्छति।
तदा ही सर्वभूतानां प्रवृत्तिरुपजायते॥१४९॥
आत्मनो दिवसस्यान्ते सर्वकर्मात्मनः स्वयम्।
यः समारोप्यात्मसुखं तेजोराशिः स्वपीत्यसौ॥१५०॥
कारणस्वरूप खखोल्क से अव्यक्तान्त चतुर्विध व्यक्त जगत् महदादि विकार द्वारा समुत्पन्न हुआ है। जब वे मन के साथ संयुक्त हो गये (मन से संकल्प किया) तब समस्त प्राणियों में प्रवृत्ति की उत्पत्ति हो गयी। अपने दिन के अन्तिम भाग में अपने समस्त कर्म का स्वयं में समापन करके आत्मसुख में वे तेजोराशि (सूर्य) शयन करते हैं।।१४८-१५०।।
प्रतिबुद्धः पुनरसौ महाभूतादिभिः सह।
करोति सर्गं स तदा गुणत्रयसमन्वितम्॥१५१॥
एवंविधश्च सप्ताश्वः सहस्रकिरणो ह्यसौ।
सृजति ग्रसते चैव जगत्सर्वं चराचरम्॥१५२॥
तपति प्रकाशते चैव स च गर्जति वर्षति।
स एव तोयस्य पतिः संस्तृतो वडवानलः॥१५३॥
कालाग्निरुद्रो विख्यातः स च स्यान्नीललोहितः।
सर्वतेजोऽधिपो योगी महांल्लोकश्च स स्मृतः॥१५४॥