साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २९३
यस्माज्जातमिदं सर्वमादित्येनेह रश्मिभिः। प्रवेशनात्पालनाच्च विष्णुस्तेन स कीर्तितः॥१७०॥ प्रणवेन समायुक्तः सप्तबीजः स्मृतस्तु सः। मूलमन्त्रं खखोल्कस्य देवस्यामिततेजसः॥१७१॥
भास्कर स्नेहवशात् समस्त प्राणियों का भजन करते हैं। समस्त जगत् के बन्धु-स्वरूप हैं। अतः इनको मित्र कहा गया है। आदित्य रश्मियों द्वारा इस जगत् के सब कुछ को उत्पन्न करते हैं। उनके प्रवेश तथा पालन के कारण वे 'विष्णु' नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रणवयुक्त सप्तबीज अमित तेजस्वी खखोल्क का मूल मन्त्र कहा गया है—ॐ खखोल्काय स्वाहा॥१६९-१७१॥
प्रणवो दीपकस्तस्य मकारः साम्प्रदायिकः। स्वाहाकारनमस्कारौ कुर्यात्पूजा पदे स्थितौ॥१७२॥ वर्णत्रयं तु यच्छेषं खखोल्क इति संज्ञितम्। तन्महाभूतभेदैस्तु भिद्यते पञ्चधा पुनः॥१७३॥ खकारः खं विनिर्दिष्टं सूर्यत्वात् पार्थयोगतः। अनादिनिधनं शुद्धं तस्य शब्दं गुणं विदुः॥१७४॥
प्रणव उनका दीपक है। मकार साम्प्रदायिक है। स्वाहा एवं नमः शब्द पूजनकाल में व्यवहृत होता है। शेष तीन वर्ण 'खखोल्क'—यह सूर्य का नाम है। वह महाभूत के भेद से पुनः पाँच प्रकार का हो जाता है। खकार शब्द आकाश का निर्देश करने वाला है। पार्थयोग से सूर्य अनादि निधन, शुद्ध हैं। शब्द उनका गुण कहा गया है॥१७२-१७४॥
सज्जनात्सर्जनाच्चैव ककारो वायुरुच्यते। स्पर्शस्तस्य गुणो ज्ञेयः पूर्वश्वासविकारतः॥१७५॥ ओरस्तेजो विज्ञेयं तच्च रूपगुणं स्मृतम्। विकारात्पूर्वयोगश्च तद्गुणाभ्यां च संशयः॥१७६॥ लपनात्प्रलयाच्चैव लकारो वरुणः स्मृतः। रसेन पूर्वैश्च गुणैरप्युक्तत्वाच्चतुर्गुणः॥१७७॥ ककारा संस्मृता पृथ्वी पित्र्यागम्यगुणा तु सा। पूर्वैश्चतुर्भिश्श्च गुणैर्युक्ता पञ्चगुणा भवेत्॥१७८॥
सज्जन (सुजात) तथा सर्जन (सृष्टि) के कारण 'क' शब्द को वायु कहा गया है। उसका गुण है—स्पर्श। पूर्वश्वास विकार से उसे समझा जाता है (?)। ओकार को तेज जानना चाहिये। वह रूप का गुण है। विकार-हेतु को पूर्वयोग और उसके गुण द्वारा जाना जाता है (?)। लपन (मुख) तथा प्रलय हेतु 'ल'कार शब्द से वरुण को कहा जाता है।