साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९४ श्रीसाम्बपुराणम्
रस तथा पूर्वगुणों के द्वारा इसे चतुर्गुण कहते हैं। ककार शब्द पृथ्वी का वाचक है। वह पृथिवी पिता का गुण (गन्ध) प्राप्त करती है तथा पूर्व के चार गुण (शब्द-स्पर्श रूप-रस) से युक्त होकर पञ्चगुण-विशिष्ट हो जाती है॥१७५-१७८॥
खखोल्क इति यत्प्रोक्तं महाभूतानि पञ्च तत्।
प्राणाद्या वायवः पञ्च तथा बुद्धीन्द्रियाणि च॥१७९॥
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव सत्त्वाद्यास्तद्गुणास्त्रयः।
मनोबुद्धिरहङ्कार इत्येतदपरत्रयम्॥१८०॥
खखोल्कानीति बीजानि चोक्तान्येकोनविंशतिः।
षड्विंशकेतनासञ्च सर्वव्याप्तमनेन तु॥१८१॥
खखोल्क = पञ्चमहाभूत, प्राणादि पञ्चवायु तथा बुद्धि, इन्द्रियाँ एवं पाँच कर्मेन्द्रिय तथा उनके सत्त्वादि तीन गुण, मन-बुद्धि-अहंकार। इस प्रकार खखोल्क एवं १९ बीज कहे गये। २६ चिह्नों द्वारा सब कुछ इसी से व्याप्त है॥१७९-१८१॥
स एव देव उत्पाद्यानुष्ठाद्यात्मानमात्मना।
सर्वं करोति जगतः पालनं प्रलयं तथा॥१८२॥
आदित्यः सततं नाम तपत्येष मरीचिभिः।
वह्निः सहस्रकिरणवृत्तं कुम्भनिभं स्मृतम्॥१८३॥
नदीनदसमुद्रेभ्यः सर्वेभ्यः सलिलं ह्यसौ।
किरणानां सहस्रेण समादत्ते सदा रविः॥१८४॥
वे देव स्वयं ही स्वयं को उत्पन्न करके तथा अनुष्ठान करके जगत् का पालन-प्रलयादि सब कुछ करते हैं। आदित्य निरन्तर अपनी किरणों से ताप प्रदान करते हैं। अग्नि को सहस्र किरण वृत्त कुम्भतुल्य कहा गया है। सभी नद-नदी तथा समुद्र से रवि अपनी किरणों से जल खींचते रहते हैं, संग्रह करते रहते हैं॥१८२-१८४॥
अस्तकाले खखोल्कस्य प्रभापादेन पावकम्।
समाविशति सूर्यं च दिवा तच्चापि पावकः॥१८५॥
एवमेतद्भवेद्धेतुः परस्परनिवेशनात्।
प्राकाश्यमौष्णवृत्तिं च कुरुते हि दिवानिशि॥१८६॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष देवो महेश्वरः।
ऋचो यजूंषि सामानि एष एव न संशयः॥१८७॥
अस्तगमन काल में खखोल्क की प्रभा का एक पाद अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है। दिन में अग्नि उसे सूर्य को प्रदान करते हैं। परस्पर निवेशन के फल का यही कारण है।