भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २९५

ये दिन-रात प्रकाश तथा उष्णता देते हैं। ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही हैं— ऋक्, यजुः तथा साम। इस विषय में कोई सन्देह नहीं है॥१८५-१८७॥

उद्यन् स दीप्यते ऋग्भिर्मध्याह्ने यजुभिस्तथा। सामभिश्चैव सायाह्ने भास्करः प्रतपत्यसौ ॥१८८॥ त्रीणि रश्मीनि तस्यैव भूलोकन्द्योतयन्त्यधः। चत्वारि तु पितॄंस्तिर्यक् त्रीण्येवोर्ध्वसुरालयम् ॥१८९॥

उदयकाल में सूर्य ऋक् समूह द्वारा दीप्ति प्राप्त करते हैं। मध्याह्न में यजुःसमूह द्वारा तथा सन्ध्याकाल में सामसमूह द्वारा भास्कर ताप प्रदान करते हैं। उनकी तीन रश्मि भूलोक तथा अधःलोक को प्रकाशित करती है। चार रश्मि पितृलोक को तथा तीन तिर्यक् रश्मि ऊर्ध्व देवलोक को आलोकित करती है॥१८८-१८९॥

सुषुम्नो हरिवेशश्च विश्वकर्मा तथैव च। विश्वव्यचा पुनश्चान्यः संयद्वसुरथापरः ॥१९०॥ उदावसुः पुनश्चान्यः पुरोऽन्यः परिकीर्तितः। रवेः करसहस्राद्धि सप्तश्रेष्ठास्तु रश्मयः ॥१९१॥ एवं हि रश्मिभिर्देवो जगत्सर्वं प्रकाशते। तथा वर्द्धयति क्षीणं क्रमतोऽयं निशाकरम् ॥१९२॥ एवं हि स्वल्प उद्दिष्टः सर्वव्यापी दिवाकरः। अध्वरैर्विविधैः पुण्यैरीज्योऽसौ पापनाशनः ॥१९३॥

सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संयद्वसु, उदावसु तथा पुर—ये सूर्यकिरणों में से सात श्रेष्ठ रश्मियाँ हैं। सूर्यदेव इन रश्मियों द्वारा समस्त जगत् को प्रकाशित करते हैं तथा क्रमश क्षीण चन्द्र को वर्द्धित करते हैं। यहाँ कुछ सामान्य रूप से कहा गया दिवाकर विश्वव्यापी है। पापनाशक दिवाकर पुण्यरूप विविध यज्ञों द्वारा पूजित होते हैं॥१९०-१९३॥

तस्य तावत्खखोल्कस्य महाध्वरविधिं शुभम्। शृणुष्वाख्यायमानं वै पश्चाच्छ्रोष्यथ निष्कलम् ॥१९४॥ नमः सवित्रे देवाय समीहितफलप्रदः। अदीक्षितस्तु यः कश्चिदिदन्तन्त्रं विचारयेत् ॥१९५॥ स कुष्ठी भवति क्षिप्रं प्रेत्येह नरकं व्रजेत्।

इन खखोल्क के मंगलकारी महायज्ञों की विविध कथा कहता हूँ, सुनो। तदनन्तर निष्कल की बात सुनना। देव सविता को नमस्कार है, जो सम्यक् रूप से पूजित होकर