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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

२९४ श्रीसाम्बपुराणम्

रस तथा पूर्वगुणों के द्वारा इसे चतुर्गुण कहते हैं। ककार शब्द पृथ्वी का वाचक है। वह पृथिवी पिता का गुण (गन्ध) प्राप्त करती है तथा पूर्व के चार गुण (शब्द-स्पर्श रूप-रस) से युक्त होकर पञ्चगुण-विशिष्ट हो जाती है॥१७५-१७८॥

खखोल्क इति यत्प्रोक्तं महाभूतानि पञ्च तत्।
प्राणाद्या वायवः पञ्च तथा बुद्धीन्द्रियाणि च॥१७९॥
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव सत्त्वाद्यास्तद्गुणास्त्रयः।
मनोबुद्धिरहङ्कार इत्येतदपरत्रयम्॥१८०॥
खखोल्कानीति बीजानि चोक्तान्येकोनविंशतिः।
षड्विंशकेतनासञ्च सर्वव्याप्तमनेन तु॥१८१॥

खखोल्क = पञ्चमहाभूत, प्राणादि पञ्चवायु तथा बुद्धि, इन्द्रियाँ एवं पाँच कर्मेन्द्रिय तथा उनके सत्त्वादि तीन गुण, मन-बुद्धि-अहंकार। इस प्रकार खखोल्क एवं १९ बीज कहे गये। २६ चिह्नों द्वारा सब कुछ इसी से व्याप्त है॥१७९-१८१॥

स एव देव उत्पाद्यानुष्ठाद्यात्मानमात्मना।
सर्वं करोति जगतः पालनं प्रलयं तथा॥१८२॥
आदित्यः सततं नाम तपत्येष मरीचिभिः।
वह्निः सहस्रकिरणवृत्तं कुम्भनिभं स्मृतम्॥१८३॥
नदीनदसमुद्रेभ्यः सर्वेभ्यः सलिलं ह्यसौ।
किरणानां सहस्रेण समादत्ते सदा रविः॥१८४॥

वे देव स्वयं ही स्वयं को उत्पन्न करके तथा अनुष्ठान करके जगत् का पालन-प्रलयादि सब कुछ करते हैं। आदित्य निरन्तर अपनी किरणों से ताप प्रदान करते हैं। अग्नि को सहस्र किरण वृत्त कुम्भतुल्य कहा गया है। सभी नद-नदी तथा समुद्र से रवि अपनी किरणों से जल खींचते रहते हैं, संग्रह करते रहते हैं॥१८२-१८४॥

अस्तकाले खखोल्कस्य प्रभापादेन पावकम्।
समाविशति सूर्यं च दिवा तच्चापि पावकः॥१८५॥
एवमेतद्भवेद्धेतुः परस्परनिवेशनात्।
प्राकाश्यमौष्णवृत्तिं च कुरुते हि दिवानिशि॥१८६॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष देवो महेश्वरः।
ऋचो यजूंषि सामानि एष एव न संशयः॥१८७॥

अस्तगमन काल में खखोल्क की प्रभा का एक पाद अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है। दिन में अग्नि उसे सूर्य को प्रदान करते हैं। परस्पर निवेशन के फल का यही कारण है।

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः २९५

ये दिन-रात प्रकाश तथा उष्णता देते हैं। ये ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हैं। ये ही हैं— ऋक्, यजुः तथा साम। इस विषय में कोई सन्देह नहीं है॥१८५-१८७॥

उद्यन् स दीप्यते ऋग्भिर्मध्याह्ने यजुभिस्तथा। सामभिश्चैव सायाह्ने भास्करः प्रतपत्यसौ ॥१८८॥ त्रीणि रश्मीनि तस्यैव भूलोकन्द्योतयन्त्यधः। चत्वारि तु पितॄंस्तिर्यक् त्रीण्येवोर्ध्वसुरालयम् ॥१८९॥

उदयकाल में सूर्य ऋक् समूह द्वारा दीप्ति प्राप्त करते हैं। मध्याह्न में यजुःसमूह द्वारा तथा सन्ध्याकाल में सामसमूह द्वारा भास्कर ताप प्रदान करते हैं। उनकी तीन रश्मि भूलोक तथा अधःलोक को प्रकाशित करती है। चार रश्मि पितृलोक को तथा तीन तिर्यक् रश्मि ऊर्ध्व देवलोक को आलोकित करती है॥१८८-१८९॥

सुषुम्नो हरिवेशश्च विश्वकर्मा तथैव च। विश्वव्यचा पुनश्चान्यः संयद्वसुरथापरः ॥१९०॥ उदावसुः पुनश्चान्यः पुरोऽन्यः परिकीर्तितः। रवेः करसहस्राद्धि सप्तश्रेष्ठास्तु रश्मयः ॥१९१॥ एवं हि रश्मिभिर्देवो जगत्सर्वं प्रकाशते। तथा वर्द्धयति क्षीणं क्रमतोऽयं निशाकरम् ॥१९२॥ एवं हि स्वल्प उद्दिष्टः सर्वव्यापी दिवाकरः। अध्वरैर्विविधैः पुण्यैरीज्योऽसौ पापनाशनः ॥१९३॥

सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संयद्वसु, उदावसु तथा पुर—ये सूर्यकिरणों में से सात श्रेष्ठ रश्मियाँ हैं। सूर्यदेव इन रश्मियों द्वारा समस्त जगत् को प्रकाशित करते हैं तथा क्रमश क्षीण चन्द्र को वर्द्धित करते हैं। यहाँ कुछ सामान्य रूप से कहा गया दिवाकर विश्वव्यापी है। पापनाशक दिवाकर पुण्यरूप विविध यज्ञों द्वारा पूजित होते हैं॥१९०-१९३॥

तस्य तावत्खखोल्कस्य महाध्वरविधिं शुभम्। शृणुष्वाख्यायमानं वै पश्चाच्छ्रोष्यथ निष्कलम् ॥१९४॥ नमः सवित्रे देवाय समीहितफलप्रदः। अदीक्षितस्तु यः कश्चिदिदन्तन्त्रं विचारयेत् ॥१९५॥ स कुष्ठी भवति क्षिप्रं प्रेत्येह नरकं व्रजेत्।

इन खखोल्क के मंगलकारी महायज्ञों की विविध कथा कहता हूँ, सुनो। तदनन्तर निष्कल की बात सुनना। देव सविता को नमस्कार है, जो सम्यक् रूप से पूजित होकर

२९६ | श्रीसाम्बपुराणम्

फल देते हैं। अदीक्षित व्यक्ति इस तन्त्र का विचार (कर्म) करने पर कुष्ठरोगी होता है तथा शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होता है; साथ ही नरकगामी भी होता है॥१९४-१९५॥

आर्जवे कुलसम्पन्ने शीलधर्मरते सदा ॥
दातव्यं सूर्यभक्ताय प्रज्ञावति जितेन्द्रिये ॥१९६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ग्रहादिदेवपूजनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः


सरल, सत् कुलोत्पन्न, सर्वदा धर्मरत, प्राज्ञ, जितेन्द्रिय सूर्यभक्त को ही यह विद्या प्रदान करनी चाहिये॥१९६॥

श्री साम्बपुराणोक्त ग्रहादि देवपूजा नामक इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त

प्रथमं शोधयेद् भूमिं स्थानानि च यथाविधि।

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(साधनरहस्यम्)

अहं चेदं प्रवक्ष्यामि रहस्यं ज्ञानमुत्तमम्।
उक्तं भगवता भानो रहस्यं च प्रकाशकम् ॥१॥
प्रथमं शोधयेद् भूमिं स्थानानि च यथाविधि।
वर्णांश्चानुक्रमं कृत्वा वसुधां च विशोधयेत् ॥२॥
ततोऽधिवासयेद् देवं न्यासेन सकलीकृतम्।
मण्डलं च समालिख्य आचार्यः सुसमाहितः ॥३॥

अब मैं गोपनीय उत्तम ज्ञान का वर्णन करता हूँ, जिसे भगवान् (सूर्यदेव) द्वारा कहा गया है और जो सूर्यरहस्य-विषयक तथा प्रकाशक है। प्रथमतः भूमि तथा स्थान का यथाविधि शोधन करना चाहिये। अनुक्रम में वर्णों का विन्यास करके भूमि-शोधन करना चाहिये। तदनन्तर न्यास के द्वारा सकलीकृत देवता का अधिवास करके आचार्य को सुसमाहित होकर मण्डल अंकित करना चाहिये॥१-३॥

एकान्ते स नदीतीरे तीर्थेष्वायतनेषु च।
उद्यानकुसुमाकीर्णे चित्रप्रासादसङ्कुले ॥४॥
आकाशतलके चापि यत्र वा रोचते मनः।
पूर्वात्मावेशने चैव भूदेशे दोषवर्जिते ॥५॥
विप्रस्य वसुधा शुक्ला लोहिता क्षत्रियस्य तु।
पीता वैश्यस्य विज्ञेया कृष्णा शूद्रस्य कीर्तिता ॥६॥

निर्जन में, नदीतीर में, तीर्थ स्थान, गृह, उद्यान के कुसुम से भरे स्थान में, विचित्र प्रासाद समूह में, आकाश के नीचे अथवा जहाँ मन की प्रेरणा हो, पूर्व आवेशन में (सूर्यादि की परिधि स्थान में) तथा दोषवर्जित भूप्रदेश में मण्डल अंकित करना चाहिये। ब्राह्मण की भूमि शुभ्र, क्षत्रिय की रक्तवर्ण, वैश्य की पीतवर्ण तथा शूद्र की कृष्णवर्ण कही गयी है॥४-६॥

चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः।
ततः शब्दं निरीक्ष्येह माङ्गल्यांश्चापि वाचकान् ॥७॥
प्रशस्तं वचनं ग्राह्यमप्रशस्तं विवर्जयेत्।
आज्यमध्ववलिप्तेन हन्याज्जतुफलेन तु ॥८॥

२९८ श्रीसाम्बपुराणम्

यथावत् आनुपूर्वीक चार वर्ण की शब्दपरीक्षा करके माङ्गल्यवाचक प्रशस्त वचन ग्रहणीय है तथा अप्रशस्त वर्जनीय है। घृत तथा मधु से लिप्त अतुफल (जिसके फल से दलबद्ध पतङ्गसमूह आविर्भूत होते हैं, ऐसे गूलर के फल) से आहुति प्रदान करनी चाहिये॥७-८॥

ततः सूत्रान्यसेन् मन्त्री यथावदनुपूर्वशः।
सिन्दूरिकानसुचनग्रन्थिस्त्येन विवर्जितान्॥९॥
कार्पासिकान् बल्कल्यान्क्षौमान् कौशिकपट्टकान्।
यथाहस्तविभागेन पातयन्मन्त्रवत्समम्॥१०॥
ऐन्द्रे च प्रथमं सूत्रं हृदयेनाभिमन्त्रितम्।
ततश्चाष्टदले पद्ममध्ये तस्य नियोजयेत्॥११॥

तदनन्तर मन्त्री यथावत् आनुपूर्वीक सूत्र का विन्यास करे। सिन्दूर वर्ण के तथा सिले वस्त्र का वर्जन करके कपास का वस्त्र, वल्कलवस्त्र, सिल्क या कौशिकवस्त्र—इनमें से किसी एक का एक हाथ वस्त्र मन्त्रज्ञ साधक पूर्व की ओर प्रथम सूत्र को हृदय द्वारा अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर अष्टदल पद्म से उसे युक्त करे॥९-११॥

गायत्र्या लब्धहस्तं तु चिन्तयित्वा दिवाकरम्।
याति चित्तरजाः प्राज्ञो जपेच्चैव षडक्षरम्॥१२॥
सत्वं रजस्तमश्चेति हितं राजसलक्षणम्।
अङ्गुष्ठपर्वविपुलं रजः सर्वत्र कथ्यते॥१३॥
अतिक्षीणं तथा स्थूलं कृशं बिन्दुविवर्जितम्।
आलिखेन्मण्डलं दिव्यं चतुर्द्वारं सुशोभनम्॥१४॥

गायत्री द्वारा अपने हस्त में प्राप्त दिव्य हाथ का चिन्तन करे। चित्त का मालिन्य हट जाने पर प्राज्ञ व्यक्ति (षडक्षर) सूर्यमन्त्र का जप करे। सत्व-रज तथा तम हैं—राजस चिह्न। अंगुष्ठपर्व के बराबर स्थूल रजःगुण सर्वत्र रहता है। अति तीक्ष्ण, स्थूल, कृशबिन्दु, चतुर्द्वारयुक्त सुशोभन दिव्य मण्डल अंकित करे॥१२-१४॥

आयुधानि तथा चाष्टौ दिशासु विदिशासु च।
पूर्वपत्रे तथोङ्कारे पश्चिमे तु खकारकम्॥१५॥
खोकारं दक्षिणे पत्रे ल्काकारं चोत्तरे तथा।
यकारः वायुभागे तु स्वाकारं वह्निसंस्थितम्॥१६॥
हकारं नैऋते योज्यं क्षेमेशान्यां तथा दिशि।
कर्णिकायां तथा देवं महातेजो द्विरक्षरम्॥१७॥

इस प्रकार दिक् तथा विदिक् में आठ आयुध अंकित करे। पूर्वपत्र में ओंकार, पश्चिम में 'ख'कार, दक्षिण में 'खो'कार तथा उत्तर में 'ल्का'कार अंकित करे। इसी प्रकार

द्विपञ्चाशतमोऽध्यायः २९९

वायुकोण में (पश्चिम उत्तर कोण में) 'य'कार, अग्निकोण में (पूर्व-पश्चिम कोण में) 'स्वा', नैर्ऋत्य-ईशान कोण में 'हा' अंकित करे (अर्थात् ॐ खखोल्काय स्वाहा)। कर्णिका में महातेजा दो अक्षर विशिष्ट देवता का (?) अङ्कन करे।।१५-१७।।

तस्य वै हृद्गतां देवीं विन्यसेच्छुतसंस्थिताम्।
अष्टौ वर्ज्या निशा देव्या दिशासु विदिशासु च ।।१८।।
पूर्णप्राकारमध्ये कवर्गः पञ्चभूतमहानि च।
दक्षिणे षकारवर्गः पञ्चबुद्धीन्द्रियाणि च ।।१९।।
पश्चिमे टकारवर्गः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च।
उत्तरे तकारवर्गः पञ्चतन्मात्राणि च।
ऐशान्यां पकारवर्गमव्यक्तं च तथाहितम् ।।२०।।

उसके हृद्गत श्वेत संस्थित देवी का अङ्कन करे (यहाँ श्वेत संस्थित का तात्पर्य श्वेत पद्मसंस्थित प्रतीत होता है) तथा निशा देवी को छोड़कर दिक्-विदिकू में आठ जन को स्थापित करे। पूर्व प्राकार के मध्य में 'क'वर्ग तथा पञ्चभूत महत्तत्त्व, दक्षिण में 'ष'कार वर्ग तथा पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पश्चिम में 'ट'कार वर्ग तथा पञ्च कर्मेन्द्रियगण, उत्तर में 'स'कार वर्ग एवं पञ्चतन्मात्रा एवं ईशानकोण में अव्यक्त 'प'कार वर्ग का विन्यास करे।।१८-२०।।

आग्नेय्यां चकारवर्गं बुद्धिं च। नैर्ऋत्यां वकारवर्गमहं च। वायव्यां कोऽहं कोऽहं क्षौंमनश्चेति। द्वितीये प्राकारे—सुरेन्द्रं पूर्वे आग्नेय्यां अग्निम्। याम्ये यमम्। नैर्ऋत्ये निर्ऋत्याधिपम्। पश्चिमे वरुणम्। वायव्ये वायुम्। सौम्ये सोमम्। ऐशान्यामीशानम्। मुद्रालक्षणं घटेत इति। तृतीये प्राकारे—चाशनि तथा शक्तिदण्डं खड्गं चक्रं गदां परशुं च पुनर्लिखेत्। तथापरं चैव महामुद्रा दातव्या दिशि विदिशि। पूर्वादारभ्य लोकपालानावाहयेत्। चतुर्थे त्वावरणे—व्योमपुष्पं बलिमुपहारांश्च गृह्णीतवति। ॐङ्कारादि स्वाहान्ताः। ततोऽग्निस्थापनं कृत्वा। आर्य उष्णिफ् कृतभूषणः। भूमिं उल्लिख्यालिख्य धृतदर्भमवकीर्य ब्राह्मणं दक्षिणतः स्थाप्य स्रुवपात्रं विशोध्य आज्यं प्रदक्षिणीकृत्य दक्षिणं जानुभूभौ निपात्य स्रुवमुपागृह्य अभुक्तपात्रः षड़ाहुतीर्जुहुयात्। सान्निध्यकरणं सम्भवति एतादृशलक्षणमग्निं सञ्चिन्त्य छागारूढं प्रादेशमात्रं सप्तार्चिः कुण्डाक्षधरं पिङ्गलश्मश्रुलोचनम् स्वमन्त्रेणाह्वयेत्। ततः शिष्यस्य गर्भाधानाद्याः पञ्चपञ्चाहुतीर्जुहुयात्। ततो दण्डं मेखलां स्थापयेत्। पूर्वतोमुखं प्रवेशयेत्सूर्यभक्तान् हृदये नाभिमन्त्रितान्।

अग्निकोण में 'च'कार वर्ग एवं बुद्धि, नैर्ऋत्य में 'व'कार वर्ग तथा अहंतत्त्व, वायुकोण में कोहं कोहं क्षौं तथा मन। द्वितीय प्राकार में—पूर्व में इन्द्र, अग्निकोण में अग्नि, दक्षिण में यम, नैर्ऋत्य में नैर्ऋत्य के अधिपति, पश्चिम में वरुण, वायुकोण में वायु, उत्तर में सोम, ईशानकोण में ईशान इस प्रकार से मुद्रालक्षण होगा।

३०० | श्रीसाम्बपुराणम्

तृतीय प्राकार में—वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, शङ्ख, चक्र, गदा तथा परशु बनाये। ऐसे ही ऊपर पुर में पूर्व की ओर महामुद्रा लिखे। पूर्व से आवाहन प्रारम्भ करके लोकपालगण का आवाहन करे। चतुर्थ प्राकार (आवरण) में व्योमपुष्प, बलि तथा पूजोपहार ग्रहण करे। आदि में ॐकार, अन्त में स्वाहा का योग करना चाहिये। तदनन्तर अग्नि-स्थापना करे। आचार्य मस्तक पर पगड़ी पहने। भूमि रेखाङ्कित करके कुश-स्थापन करके दाहिनी ओर ब्राह्मण को बैठाये। तदनन्तर स्रुवपात्र का शोधन करके आज्य की प्रदक्षिणा करे (घृत की प्रदक्षिणा)। दाहिना जानु पृथ्वी पर रखे, स्रुव लेकर पात्र-परित्यागी न हो (अर्थात् पात्र लिये रहे)। दस आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् सन्निधिकरण करे। सम्भव होने पर इस प्रकार से अग्नि का चिन्तन करना चाहिये—छाग (मेष) के ऊपर आरूढ, प्रादेश मात्र, सप्त किरणयुक्त, कुण्डाक्ष धारणकारी, पिङ्गल श्मश्रु तथा नेत्रयुक्त अग्नि का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका आवाहन करे। तत्पश्चात् शिष्य-हेतु गर्भाधानादि पाँच-पाँच आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर दण्ड एवं मेखला की स्थापना करे। तदनन्तर पूर्व की ओर हृदय के द्वारा अभिमन्त्रित सूर्यभक्तों को प्रवेश कराये।

वस्त्रबद्धमुखान् कृत्वा त्रिधा भ्राम्यन्विचक्षणः ।
जानुभ्यामवनीं गत्व शिरसा ते क्षमापयेत् ॥२१॥
तत्र तत्पतेः पुण्यं तस्य तल्लयमादिशेत् ।
नाम तस्य स्वरूपेण कारयेद्रविपूर्वकम् ॥२२॥
षष्ठ्या चैव महाश्वेतां हृदि ध्यात्वा दिवाकरम् ।
साधनं तु निरीक्षेत ततो दीक्षित उच्यते ॥२३॥

विचक्षण व्यक्ति मुख को कपड़े से बाँधकर तीन बार घुमाकर भूमि पर जानु रखकर मस्तक द्वारा क्षमापन कराये (प्रणाम की मुद्रा में क्षमापन कराये)। तदनन्तर वहाँ उसके अधिपति के पुण्यलय का चिन्तन करे। स्वरूप में रविपूर्वक उसका नामकरण करना पड़ता है। षष्ठी में महाश्वेता तथा हृदय में दिवाकर का ध्यान करे, साधन दर्शन करे। तदनन्तर उसे दीक्षित कहा जाता है॥२१-२३॥

ततः साधकोऽग्निस्थापनं कृत्वैकैकामाहुतिं जुहुयात्। ततोऽष्टपुष्पिकां दापयेत्॥२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे साधनरहस्यं नाम द्विपञ्चाशतमोऽध्यायः

तदनन्तर साधक अग्नि-स्थापन करके एक-एक आहुति देकर होम करे। तत्पश्चात् अष्टपुष्पिका प्रदान करे॥२४॥

श्री साम्बपुराणोक्त साधनरहस्य नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त

प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम् ।

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(पूजाविधिनिरूपणम्)

नारद उवाच

प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम् ।
तन्मध्ये चिन्तयेद्देवं भास्करं रश्मिविग्रहम् ॥१॥
सहस्रदिनसंस्कारं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
महातेजोमयं ध्यात्वा आदित्यं पूजयेद् बुधः ॥२॥
योऽयं हरितवर्णाभं रथे तिष्ठति वाजिनम्।
अरुणः सारथिर्यस्य रथवाहः स्वयं स्थितः ॥३॥
तमहं लोकशांत्यर्थमादित्यमाह्वयाम्यहम् ।
आयाहि भगवन्भानो तव यज्ञः प्रवर्तते ॥४॥

प्रथमतः कर्णिकायुक्त अष्टपत्र-विशिष्ट पद्म का चिन्तन करे। उसमें रश्मिस्वरूप सूर्यदेव का चिन्तन करना चाहिये। सहस्र दिनसंस्कारक (असंख्य दिनों को प्रकाशित करने वाले) कोटि सूर्य प्रभातुल्य महातेजोमय आदित्य का ध्यान करके पण्डितगण उनका पूजन करते हैं। जो हरित वर्ण वाले अश्वों के रथ पर स्थित हैं, रथ के सारथी अरुण जिस रथ पर हैं, लोक की शान्ति के लिये मैं उन आदित्य का आवाहन करता हूँ। हे भगवन् भानु! आप आईये। आपका यज्ञ प्रारम्भ होता है॥१-४॥

इदमर्घ्यं च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः।
आह्वानं सहस्रकिरणं स्वागतं स्वागतं स्वागतं ठः ठः।
ॐ धर धर अद्य ॥५॥

यह अर्घ्य तथा पाद्य ग्रहण करिये। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सहस्रकिरणों से युक्त आपका मैं आह्वान करता हूँ। आपका स्वागत है (मूल में लिखित मन्त्र से पाद्य अर्घ्य प्रदान करे, यथा—इदमर्घ्यञ्च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः (यह अर्घ्य तथा पाद्य मन्त्र है)। आवाहन मन्त्र है—आह्वानं·······धर धर अद्य ।।५।।

वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्य उत्तमः।
आघ्रेयः सर्वभूतानां प्रतिगृह्य नमो नमः ॥६॥

स्वाहा धूपः गन्य गन्यादि ठः ठः गन्यः। ॐ दीपपञ्जालिनि ठं ठं दीपः।

३०० || श्रीसाम्बपुराणम्

तृतीय प्राकार में—वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, शङ्ख, चक्र, गदा तथा परशु बनाये। ऐसे ही ऊपर पुर में पूर्व की ओर महामुद्रा लिखे। पूर्व से आवाहन प्रारम्भ करके लोकपालगण का आवाहन करे। चतुर्थ प्राकार (आवरण) में व्योमपुष्प, बलि तथा पूजोपहार ग्रहण करे। आदि में ॐकार, अन्त में स्वाहा का योग करना चाहिये। तदनन्तर अग्नि-स्थापना करे। आचार्य मस्तक पर पगड़ी पहने। भूमि रेखाङ्कित करके कुश-स्थापन करके दाहिनी ओर ब्राह्मण को बैठाये। तदनन्तर स्रुवपात्र का शोधन करके आज्य की प्रदक्षिणा करे (घृत की प्रदक्षिणा)। दाहिना जानु पृथ्वी पर रखे, स्रुव लेकर पात्र-परित्यागी न हो (अर्थात् पात्र लिये रहे)। दस आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् सन्निधिकरण करे। सम्भव होने पर इस प्रकार से अग्नि का चिन्तन करना चाहिये—छाग (मेष) के ऊपर आरूढ, प्रादेश मात्र, सप्त किरणयुक्त, कुण्डाक्ष धारणकारी, पिङ्गल श्मश्रु तथा नेत्रयुक्त अग्नि का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका आवाहन करे। तत्पश्चात् शिष्य-हेतु गर्भाधानादि पाँच-पाँच आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर दण्ड एवं मेखला की स्थापना करे। तदनन्तर पूर्व की ओर हृदय के द्वारा अभिमन्त्रित सूर्यभक्तों को प्रवेश कराये।

वस्त्रबद्धमुखान् कृत्वा त्रिधा भ्राम्यन्विचक्षणः।
जानुभ्यामवनीं गत्व शिरसा ते क्षमापयेत्॥१२१॥
तत्र तत्पतेः पुण्यं तस्य तल्लयमादिशेत्।
नाम तस्य स्वरूपेण कारयेद्रविपूर्वकम्॥१२२॥
षष्ठ्या चैव महाश्वेतां हृदि ध्यात्वा दिवाकरम्।
साधनं तु निरीक्षेत ततो दीक्षित उच्यते॥१२३॥

विचक्षण व्यक्ति मुख को कपड़े से बाँधकर तीन बार घुमाकर भूमि पर जानु रखकर मस्तक द्वारा क्षमापन कराये (प्रणाम की मुद्रा में क्षमापन कराये)। तदनन्तर वहाँ उसके अधिपति के पुण्यलय का चिन्तन करे। स्वरूप में रविपूर्वक उसका नामकरण करना पड़ता है। षष्ठी में महाश्वेता तथा हृदय में दिवाकर का ध्यान करे, साधन दर्शन करे। तदनन्तर उसे दीक्षित कहा जाता है॥१२१-१२३॥

ततः साधकोऽग्निस्थापनं कृत्वैकैकामाहुतिं जुहुयात्। ततोऽष्टपुष्पिकां दापयेत्॥१२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे साधनरहस्यं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः


तदनन्तर साधक अग्नि-स्थापन करके एक-एक आहुति देकर होम करे। तत्पश्चात् अष्टपुष्पिका प्रदान करे॥१२४॥

श्री साम्बपुराणोक्त साधनरहस्य नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त

प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम्।

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(पूजाविधिनिरूपणम्)

नारद उवाच

प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम्।
तन्मध्ये चिन्तयेद्देवं भास्करं रश्मिविग्रहम् ॥१॥
सहस्रदिनसंस्कारं सूर्यकोटिसमप्रभम्।
महातेजोमयं ध्यात्वा आदित्यं पूजयेद् बुधः ॥२॥
योऽयं हरितवर्णाभं रथे तिष्ठति वाजिनम्।
अरुणः सारथिर्यस्य रथवाहः स्वयं स्थितः ॥३॥
तमहं लोकशांत्यर्थमादित्यमाह्वयाम्यहम्।
आयाहि भगवन्भानो तव यज्ञः प्रवर्त्तते ॥४॥

प्रथमतः कर्णिकायुक्त अष्टपत्र-विशिष्ट पद्म का चिन्तन करे। उसमें रश्मिस्वरूप सूर्यदेव का चिन्तन करना चाहिये। सहस्र दिनसंस्कारक (असंख्य दिनों को प्रकाशित करने वाले) कोटि सूर्य प्रभातुल्य महातेजोमय आदित्य का ध्यान करके पण्डितगण उनका पूजन करते हैं। जो हरित वर्ण वाले अश्वों के रथ पर स्थित हैं, रथ के सारथी अरुण जिस रथ पर हैं, लोक की शान्ति के लिये मैं उन आदित्य का आवाहन करता हूँ। हे भगवन् भानु! आप आईये। आपका यज्ञ प्रारम्भ होता है।।१-४।।

इदमर्घ्यं च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः।
आह्वानं सहस्रकिरणं स्वागतं स्वागतं स्वागतं ठः ठः।
ॐ धर धर अद्य ॥५॥

यह अर्घ्य तथा पाद्य ग्रहण करिये। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सहस्रकिरणों से युक्त आपका मैं आह्वान करता हूँ। आपका स्वागत है (मूल में लिखित मन्त्र से पाद्य अर्घ्य प्रदान करे, यथा—इदमर्घ्यञ्च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः (यह अर्घ्य तथा पाद्य मन्त्र है)। आवाहन मन्त्र है—आह्वानं······धर धर अद्य।।५।।

वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।
आघ्रेयः सर्वभूतानां प्रतिगृह्य नमो नमः ॥६॥

स्वाहा धूपः गन्ध गन्धादि ठः ठः गन्धः। ॐ दीपपञ्जलिनि ठं ठं दीपः।

३०० श्रीसाम्बपुराणम्

तृतीय प्राकार में—वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, शङ्ख, चक्र, गदा तथा परशु बनाये। ऐसे ही ऊपर पुर में पूर्व की ओर महामुद्रा लिखे। पूर्व से आवाहन प्रारम्भ करके लोकपालगण का आवाहन करे। चतुर्थ प्राकार (आवरण) में व्योमपुष्प, बलि तथा पूजोपहार ग्रहण करे। आदि में ॐकार, अन्त में स्वाहा का योग करना चाहिये। तदनन्तर अग्नि-स्थापना करे। आचार्य मस्तक पर पगड़ी पहने। भूमि रेखाङ्कित करके कुश-स्थापन करके दाहिनी ओर ब्राह्मण को बैठाये। तदनन्तर स्रुवपात्र का शोधन करके आज्य की प्रदक्षिणा करे (घृत की प्रदक्षिणा)। दाहिना जानु पृथ्वी पर रखे, स्रुव लेकर पात्र-परित्यागी न हो (अर्थात् पात्र लिये रहे)। दस आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् सन्निधिकरण करे। सम्भव होने पर इस प्रकार से अग्नि का चिन्तन करना चाहिये—छाग (मेष) के ऊपर आरूढ, प्रादेश मात्र, सप्त किरणयुक्त, कुण्डाक्ष धारणकारी, पिङ्गल श्मश्रु तथा नेत्रयुक्त अग्नि का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका आवाहन करे। तत्पश्चात् शिष्य-हेतु गर्भाधानादि पाँच-पाँच आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर दण्ड एवं मेखला की स्थापना करे। तदनन्तर पूर्व की ओर हृदय के द्वारा अभिमन्त्रित सूर्यभक्तों को प्रवेश कराये।

वस्त्रबद्धमुखान् कृत्वा त्रिधा भ्राम्यन्विचक्षणः।
जानुभ्यामवनीं गत्व शिरसा ते क्षमापयेत् ॥२१॥
तत्र तत्पतेः पुण्यं तस्य तल्लयमादिशेत्।
नाम तस्य स्वरूपेण कारयेद्रविपूर्वकम् ॥२२॥
षष्ठ्या चैव महाश्वेतां हृदि ध्यात्वा दिवाकरम्।
साधनं तु निरीक्षेत ततो दीक्षित उच्यते ॥२३॥

विचक्षण व्यक्ति मुख को कपड़े से बाँधकर तीन बार घुमाकर भूमि पर जानु रखकर मस्तक द्वारा क्षमापन कराये (प्रणाम की मुद्रा में क्षमापन कराये)। तदनन्तर वहाँ उसके अधिपति के पुण्यलय का चिन्तन करे। स्वरूप में रविपूर्वक उसका नामकरण करना पड़ता है। षष्ठी में महाश्वेता तथा हृदय में दिवाकर का ध्यान करे, साधन दर्शन करे। तदनन्तर उसे दीक्षित कहा जाता है।।२१-२३।।

ततः साधकोऽग्निस्थापनं कृत्वैकामाहुतिं जुहुयात्। ततोऽष्टपुष्पिकां दाप- येत्॥२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे साधनरहस्यं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तदनन्तर साधक अग्नि-स्थापन करके एक-एक आहुति देकर होम करे। तत्पश्चात् अष्टपुष्पिका प्रदान करे।।२४।।

श्री साम्बपुराणोक्त साधनरहस्य नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त

प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम्।

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(पूजाविधिनिरूपणम्)

नारद उवाच

प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम्।
तन्मध्ये चिन्तयेद्देवं भास्करं रश्मिविग्रहम् ॥१॥
सहस्रदिनसंस्कारं सूर्यकोटिसमप्रभम्।
महातेजोमयं ध्यात्वा आदित्यं पूजयेद् बुधः ॥२॥
योऽयं हरितवर्णाभं रथे तिष्ठति वाजिनम्।
अरुणः सारथिर्यस्य रथवाहः स्वयं स्थितः ॥३॥
तमहं लोकशांत्यर्थमादित्यमाह्वयाम्यहम्।
आयाहि भगवन्भानो तव यज्ञः प्रवर्तते ॥४॥

प्रथमतः कर्णिकायुक्त अष्टपत्र-विशिष्ट पद्म का चिन्तन करे। उसमें रश्मिस्वरूप सूर्यदेव का चिन्तन करना चाहिये। सहस्र दिनसंस्कारक (असंख्य दिनों को प्रकाशित करने वाले) कोटि सूर्य प्रभातुल्य महातेजोमय आदित्य का ध्यान करके पण्डितगण उनका पूजन करते हैं। जो हरित वर्ण वाले अश्वों के रथ पर स्थित हैं, रथ के सारथी अरुण जिस रथ पर हैं, लोक की शान्ति के लिये मैं उन आदित्य का आवाहन करता हूँ। हे भगवन् भानु! आप आईये। आपका यज्ञ प्रारम्भ होता है॥१-४॥

इदमर्घ्यं च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः।
आह्वानं सहस्रकिरणं स्वागतं स्वागतं स्वागतं ठः ठः।
ॐ धर धर अद्य ॥५॥

यह अर्घ्य तथा पाद्य ग्रहण करिये। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सहस्रकिरणों से युक्त आपका मैं आह्वान करता हूँ। आपका स्वागत है (मूल में लिखित मन्त्र से पाद्य अर्घ्य प्रदान करे, यथा—इदमर्घ्यञ्च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः (यह अर्घ्य तथा पाद्य मन्त्र है)। आवाहन मन्त्र है—आह्वानं······धर धर अद्य॥५॥

वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।
आग्नेयः सर्वभूतानां प्रतिगृह्य नमो नमः ॥६॥
स्वाहा धूपः गन्ध गन्धादि ठः ठः गन्धः। ॐ दीपपञ्जालिनि ठं ठं दीपः।

३०२ श्रीसाम्बपुराणम्

वनस्पतिरसो से लेकर नमः-पर्यन्त मूल श्लोक छः से धूप तथा दीप प्रदान करे। मन्त्रार्थ है—वनस्पति के निर्यास से उत्पन्न दिव्य गन्धयुक्त उत्तम गन्ध, जो समस्त प्राणियों के आघ्राण-योग्य है, उस धूप को ग्रहण करिये। आपको नमस्कार-नमस्कार। तदनन्तर स्वाहा कहे। तत्पश्चात् ‘धूपः गन्धगन्धादि स्वाहा' से गन्ध प्रदान करे और ‘दीपपञ्चलिनि स्वाहा' से दीपदान करे।।६।।

ॐ एतत्सुमनसं दिव्यं गन्ध्यादिः गन्धवत्तमम्।
आग्नेयः सर्वभूतानां प्रतिगृह्य नमो नमः ठः ठः ॥७॥ इति पुष्पम्

अब श्लोक ७ से पुष्पदान करे। जहाँ ‘ठः ठः' लिखा है, वहाँ ‘स्वाहा' कहे। मन्त्रार्थ है—इस दिव्य गन्धयुक्त गन्धश्रेष्ठ को, समस्त प्राणियों के आग्नेय पुष्प को ग्रहण करिये। आपको नमस्कार-नमस्कार।।७।।

ॐ ब्रह्मणा ग्रथितं पूर्वं पवित्रमिदमुत्तमम्।
यज्ञोपवीतं महातेज गृहीष्व नमोऽस्तु ते ॥८॥

मूल श्लोक ८ द्वारा यज्ञोपवीत दान करे। मन्त्रार्थ है—पहले ब्रह्मा द्वारा ग्रथित इस उत्तम महातेजयुक्त यज्ञोपवीत को ग्रहण करिये। हे हंस! आपको नमस्कार है।।८।।

सर्वौषधिसमृद्धस्तु भक्ष्योऽयं परमेश्वर।
अमृतं गृह्यतां देव अमृतोऽयं तवाशनः ॥९॥ इति अन्नम्।

श्लोक ९ द्वारा अन्नदान करना चाहिये। मन्त्रार्थ है—हे परमेश्वर! समस्त औषधियों (शस्य तथा वृक्ष-लतादि से उत्पन्न) के सहित यह खाद्य, यह अमृत आप ग्रहण करिये। हे देव! यह अमृत आपके लिये भक्षणीय है।।९।।

रत्नोज्ज्वलमिदं पुण्यं मुकुटं भूषणोत्तमम्।
मुकुटं गृह्यतां देव देवदेव नमो नमः ॥१०॥ इति मुकुटम्।

श्लोक १० द्वारा मुकुट-दान करे। मन्त्रार्थ है—रत्न के समान उज्ज्वल पुण्य मुकुट उत्तम भूषण है। हे देव! इसे आप ग्रहण करिये। हे देवदेव! आपको नमस्कार है, नमस्कार है।।१०।।

ॐ भास्कराय त्विदं वस्त्रं सर्ववस्त्रोत्तमं वरम्।
कटिभूषणमिदं पुण्यं दिव्यं देव नमोऽस्तु ते ॥११॥

इति श्रीसाम्बपुराणे पूजाविधिनिरूपणे प्रथमं पटलं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्लोक ११ द्वारा वस्त्रदान करना चाहिये। मन्त्रार्थ है—भास्कर को इन सभी वस्त्रों में से उत्तम वस्त्र अर्पित करता हूँ। इस दिव्य पुण्य कटिभूषण को आप ग्रहण करिये। हे देव! आपको नमस्कार है, नमस्कार है।।११।।

श्रीसाम्बपुराणोक्त पूजाविधि-निरूपण नामक तिरेपनवाँ अध्याय समाप्त

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(अष्टपुष्पिका)

देव उवाच

संक्षेपेण तु देवेश कथयस्वाष्टपुष्पिकाम् ॥१॥

देवगण कहते हैं—हे देवेश! संक्षेप में अष्टपुष्पिका कहिये।।१।।

देव उवाच

खखोल्काय स्वाहा ठः ठः।
ॐकारं स्थापयेत्पूर्वं खकारं वह्निसंयुतम्।
खोकारं दक्षिणे भागे ल्काकारं नैऋते तथा ॥२॥
यकारं पश्चिमे भागे स्वाकारं वायवे ततः।
हाकारमुत्तरे स्थाप्यं तथैशान्यं क्षकारकम् ॥३॥
ओङ्कारेणावाहनं कुर्यात्सान्निध्ये च खमुच्यते।
खोकारं स्थापने विद्याल्काकारं पुष्पकारणात् ॥४॥
स्वाकारं योजयेत् सूक्तं भोज्यं भक्ष्यं तथैव च।
हाकारं च सदा योगी चिन्तयेन्मुक्तिकारणात् ॥५॥

सूर्यदेव कहते हैं—‘खखोल्काय स्वाहा स्वाहा’ (यह सूर्य का मूलमन्त्र है। इसके प्रत्येक अक्षर के बीज न्यास को अष्टपुष्पिका कहते हैं।) इस मन्त्र के पहले ‘ॐ’ लगाना होगा, तदनन्तर वह्नियुक्त ‘ख’, दक्षिण में ‘खो’ नैर्ऋत्य में ‘ल्का’ कार, पश्चिम में ‘य’, वायु-कोण में ‘स्वा’कार, उत्तर में हाकार का स्थापन करके ईशान कोण में ‘क्ष’कार स्थापित करे। ॐकार द्वारा आवाहन करे। सन्निहित करण में ‘ख’ कहना होगा। स्थापन में ‘खो’कार मन्त्र तथा पुष्पदान में ‘ल्का’कार होगा। इस प्रकार भोज्य तथा भक्ष्य दान में ‘स्वा’ का योग होगा। योगी को मुक्ति के लिये सर्वदा ‘हा’कार का चिन्तन करना चाहिये।।२-५।।

क्षकारं तु स्वयं देवमादित्यसमतेजसम्।
विन्यसेद्दक्षिणावर्तं साधको बीजसाधने ॥६॥
ततो मन्त्रान्प्रयुञ्जीत यथान्यायेन साधकः।
बीजाष्टपुष्पिका।
इति श्रीसाम्बपुराणे अष्टपुष्पिकानाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः द्वितीयं पटलम्

‘क्ष’कार स्वयं देवतास्वरूप है। आदित्य का तेज है। बीज-साधना हेतु साधक दक्षिणावर्त्त विन्यास करे। तदनन्तर साधक यथाविधान मन्त्रों को युक्त करे। यही है—बीजाष्टपुष्पिका।।६।।

श्री साम्बपुराणोक्त चौवनवाँ अध्याय का अष्टपुष्पिका नामक द्वितीय पटल समाप्त

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(मण्डलकथनम्)

यद्यत्स्वर्गापवर्गार्थं यच्च सर्वार्थसाधनम्।
संवत्सराख्यमतुलं मण्डलं कथयामि ते ॥१॥
आचार्यः संयतो धीमानर्कशास्त्रविशारदः।
क्रोधलोभपरित्यक्तो द्विजः शस्तो निरामयः ॥२॥
प्राप्ताभिषेकनिपुणः शास्त्रभक्तो निरामयः।
गुरोर्विधिसमाख्याता ईष्यन्ते परिचारकाः ॥३॥
कुलीनाः शुचयो दान्ता देवद्विजपरायणाः।
एते शिष्याः प्रशंसन्ते रविशासनतत्पराः ॥४॥

सूर्यदेव कहते हैं कि जो स्वर्ग तथा अपवर्ग का निमित्त एवं सर्वार्थ-साधक है, उस संवत्सर नामक अतुलनीय मण्डल का वर्णन तुमसे करता हूँ। इसमें संयत, धीमान्, अर्कशास्त्र-विशारद, जिन्होंने क्रोध तथा लोभ का परित्याग किया है, ऐसे अरोगी ब्राह्मण आचार्य प्रशस्त हैं। जो अभिषिक्त तथा निपुण हैं, शास्त्र के प्रति जिनकी भक्ति है, ऐसे अरोगी, गुरु के विधान में जो अवस्थित हैं, वैसे परिचारक अभीप्सित हैं। जो कुलीन (सत्कुलोत्पन्न) हैं, शुचि, जितेन्द्रिय, देवता तथा ब्राह्मण की सेवा में परायण हैं, सूर्य के शासनपालन में तत्पर हैं, ऐसे शिष्य प्रशंसनीय हैं॥१-४॥

अन्ये ये ये स्युरार्ता वा पापरोगाद्यविप्लुताः।
अप्रजा वसुहीना वा न कुर्युस्तेऽभिषेचनम् ॥५॥
सप्तम्यामुपरागे च संक्रान्तिषु गभस्तिनः।
पुण्येष्वन्येषु वाहस्सु लिखेदर्कोदिते तथा ॥६॥

जो अन्य लोग आर्त हैं, पाप तथा रोगादि द्वारा अभिभूत हैं, पुत्रहीन अथवा धनहीन हैं, उनका कदापि अभिषेक नहीं करना चाहिये। सप्तमी को, ग्रहणकाल में, संक्रान्ति में अथवा सूर्य के अन्य शुभ दिनों में तथा सूर्य के उदयकाल में (मण्डल का) अङ्कन करना चाहिये॥५-६॥

प्रागुद्दिष्टे भुवो भागे सुविस्तीर्णे शुभे शुचौ।
गोभिरध्युषितं कार्यं ब्राह्मणैश्चाभिनन्दितम् ॥७॥
चैद्यकण्टकवल्मीकश्मशानादिविवर्जितम् ।
खखोल्कहृदयेनार्घ्यं दत्त्वा चैतद्विशोधयेत् ॥८॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३०५

दन्दशूकाखुकेशास्थिकाष्ठभस्मतुषादिकम् । खखोल्कं च गुरुं चैव प्रणम्य शिरसाः ततः ॥९॥ भूम्यादि भ्रामयेच्छिष्यः स्वपेत्संयतमानसः ।

पूर्वनिर्दिष्ट सुविस्तीर्ण शुभ्र, शुचि भूमिभाग गोगण (गौओं) का आवास स्थान बनाये तथा वह होगा—ब्राह्मणों से अभिनन्दित। चैत्य (श्मशान का वृक्ष अथवा बौद्ध मन्दिर), कण्टक, दीमक की बांबी तथा श्मशानादि से वर्जित यह स्थान होता है। खखोल्क हृदय द्वारा अर्घ्य देकर विच्छू, सर्पादि, चूहों के वासस्थान का, केश, अस्थि, काठ की राखी तथा तुष आदि से स्थान का शोधन करे। सूर्य को तथा गुरु को शिर नत करके प्रणाम करना चाहिये। शिष्य ऐसा करके भूमि प्रभृति पर भ्रमण करे तथा संयत होकर शयन करे॥७-९॥

प्रासादं द्विरदादीनां काननस्य द्रुमस्य च ॥१०॥ आरोहणं प्रशस्तं स्यात् स्वप्ने सिंहासनस्य वा । वस्त्रभूषणदध्यन्ननारीक्षेत्रध्वजस्रजम् ॥११॥ लोभो प्रस्तरणं वैरिमारणं रुधिरस्रवम् । मांसाशनं सुरास्वादो रुधिरस्वादुकर्त्तनम् ॥१२॥ स्वप्न एवंविधो दृष्टः साधयेदभिवाञ्छितम् ।

शयन में प्रासाद, हाथी-प्रभृति, जंगल, वृक्ष अथवा सिंहासन पर आरोहण दर्शन करना प्रशस्त है। ऐसे ही वस्त्र, भूषण, दधि, अन्न, नारी, खेत, ध्वजा, माला, पुष्पादि-रचित शय्या, शत्रुमारण, रक्तक्षरण, मांसभक्षण, मद्यपान, रक्तवर्ण मणिविशेष का कर्त्तन—ऐसे स्वप्न अभीष्टप्रद होते हैं॥१०-१२॥

पुनः कुर्वीत संस्कारं चन्दनागुरुपाणिना ॥१३॥ तत्स्थानं शोभनं कार्यं नानाध्वजविभूषितम् । किङ्किणीनादमुखरं प्रचलच्चारुचामरम् ॥१४॥

पुनः चन्दन, अगुरु-मिश्रित जल द्वारा संस्कार करे। नाना ध्वजाओं से स्थान को शोभित करना उचित है। वह स्थान किङ्किणी के शब्द से मुखर तथा सुन्दर चामरयुक्त होना चाहिये॥१३-१४॥

पद्मपत्रवनोपेतं कदलीखण्डमण्डितम् । शिखिपिच्छोल्लसच्छत्रं वितानकविभूषितम् ॥१५॥ नानारत्नसमाकीर्णं लसत्स्रग्दामतोरणम् । त्रिवृतं ग्रन्थिरहितं क्षौमं कार्पासमाविकम् ॥१६॥ सूत्रं प्रशस्यते तत्र खखोल्कपुरतस्ततः । आशापूर्वासमस्या तु सावित्र्या शासते रविः ॥१७॥

३०६ श्रीसाम्बपुराणम्

पद्मपत्र के वनयुक्त, केला के वृक्षों से शोभित हो, छत्र में मयूर का पंख लगा हो तथा चंदोवा द्वारा विभूषित हो। वह नानाविध रत्नों से समाकीर्ण हो, मालाओं के तोरण से शोभित किया गया हो। ग्रन्थिरहित त्रिवृत, क्षौम, कपास तथा रोयें से बने सूत्र से खखोल्क (सूर्य) के सामने (सजाना) प्रशस्त है। पूर्व की ओर सावित्री के साथ रवि शासन करते हैं।।१५-१७।।

ध्रुवास्पदास्तु सौम्या ये स्यातां पश्चिमदक्षिणे।
तत्र क्षोणीं प्रमाणेन अतुलात्प्रभृतिक्रमः ॥१८॥
कर्णिकां सूत्रयेन्मध्ये कमलस्य रवेः शुभाम्।
केसरं कर्णिकातुल्यं तस्माच्च द्विगुणं दलम् ॥१९॥

ध्रुवास्पद सौम्य का स्थान पश्चिम-दक्षिण में है। वहाँ क्षोणी प्रमाण से अतुल से क्रम जाने (अर्थात् अतुल से क्रम प्रारम्भ करे)। रवि के कमल के मध्य में शुभ कर्णिका चिह्नित करना होगा। केशर है कर्णिका के तुल्य। उसका दूना होगा दल।।१८-१९।।

मण्डलं वृत्तपत्राग्रं तच्छिष्ठाब्जपुरःस्थितम्।
षड्विंशतिबीजपत्रं चतुर्विंशतिकेसरम् ॥२०॥
कर्षितं च सिताम्भोजं चतुःशृङ्गं शिखोज्ज्वलम्।
ततोऽपि बाह्यमपरं चतुरस्रं तु सूत्रयेत् ॥२१॥

पद्म के पुरस्थित वृत्तपत्राग्र मण्डल होगा। २६ बीजपत्र तथा २४ केशर रहेंगे। उज्ज्वल शिखायुक्त चार शृङ्गविशिष्ट श्वेत कमल अंकित करे। उसके बाह्य की ओर अन्य चतुरस्र बनाये।।२०-२१।।

चतुर्ग्रीवं विदिक्कोणं रथस्यावयवं शुभम्।
पुरावर णमध्ये तु अरुणं कन्दरावृतम् ॥२२॥
तत्पर्यन्तं विनिष्क्रान्ते द्वे द्वे रेखे तदर्द्धिके।
पुनस्तिर्यग्गतेऽग्रे तु स्वनिष्क्रान्तप्रमाणतः ॥२३॥

चार ग्रीवायुक्त, विदिक् कोणयुक्त रथ के अवयव शुभ होते हैं। पूर्व आवरण में कन्दरावृत स्थान अरुण का है। वहाँ तक विनिष्क्रान्त होकर दो-दो रेखा प्राप्त करना चाहिये। उसका आधा अब तिर्यक् भाव से स्वनिष्क्रान्त प्रमाण होगा।।२२-२३।।

पुनस्तावच्च निष्क्रम्य विलग्नमुखयेत्तु ते।
पद्मगर्भाद्विनिष्क्रांतां वारुण्यां मकराननाम् ॥२४॥
यष्टिं पद्मायतां कुर्याद्रथस्य कर्णिकामिताम्।
यष्ट्यग्रे सप्तसंलग्नान् वाजिनः पार्श्वयोर्द्वयोः ॥२५॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३०७

अब निष्क्रमण करके उभय दिक् विलग्न होगा। पद्मगर्भ से विनिष्क्रान्त पश्चिम दिशा की ओर पद्मपत्र के समान विस्तृत यष्टि रथ की कर्णिका के समान बनवाये। यह होगा यष्टि के आगे सात संलग्न अश्व के दोनों ओर॥२४-२५॥

तदधस्तावती यष्टेर्मूलादूर्ध्वस्मृतोऽरुणः।
क्षोणी च पीठमित्युक्ता तथान्तः शेषपन्नगाः ॥२६॥
कर्णिका तेजसः पिण्डो भूताद्या बीजसंज्ञिता।
खपरं कर्णिका व्योम वारं पत्रं सकेसरम् ॥२७॥
पत्राग्रं मण्डलं हस्तिरन्तर्व्योमस्थितं पुरे।
वाह्याकाशं च तं विद्धि यष्टिधर्मार्थसंज्ञितम् ॥२८॥

यष्टि के नीचे उसी प्रकार मूल के ऊर्ध्व में अरुण का स्मरण करना चाहिये। पृथ्वी को पीठ कहते हैं। उसमें शेषनागगण की स्थिति है। तेज के पिण्डद्वय को कर्णिका, भूतादि बीजसंज्ञक, खपर, कर्णिका, व्योम तथा वारसमूह को केशरायुक्त पत्र कहते हैं। पत्र के अग्रभाग में मण्डल है। पुर के मध्य में व्योमस्थित हस्ति रहते हैं। उसे बाह्याकाश जानो, जो यष्टिधर्मार्थ नामक है॥२६-२८॥

रथः संवत्सरो ज्ञेयः पितरस्त्वृतवः स्मृताः।
नेत्रं पत्रस्य मूले वै दोषाच्छन्दांसि शङ्करः ॥२९॥
सुषुम्नाद्यास्तु या नाड्यः सहस्रं रविविग्रहे।
अत ऊर्ध्वं विदिक्षु स्यात् पीतं तस्य शतं शतम् ॥३०॥
योजनायतविस्तीर्णमुच्छ्रितं तत्प्रमाणतः।
अरुणो घृणयः प्रोक्ता बाह्यछन्दांसि वाजिनः ॥३१॥
पञ्चर्तुर्वासुकिः प्रोक्तश्चक्रेशोऽस्य भुवस्त्रयः।
एवं सर्वमयं प्रोक्तं रथश्रेष्ठं विभावसोः ॥३२॥

रथ को संवत्सर जानना चाहिये। ऋतुसमूह को पितृगण कहा है। पत्र के मूल में नेत्ररूप रात्रि तथा शम्भुरूपी हैं छन्द। सूर्य शरीर में सुषुम्नादि हजार नाड़ियाँ हैं, इसलिये ऊर्ध्व में विदिकू में १००-१०० पीतवर्ण रहते हैं। वह योजनायत विस्तीर्ण है। उसके प्रमाण से उच्छ्रित अरुण तथा घृणिसमूह (शिखाओं के) के अश्वों को बाह्य छन्द कहा जाता है। वासुकी को पञ्च ऋतु कहा गया है तथा इस भुवन के तीन लोक चक्रेश हैं। इस प्रकार से विभावसु के सर्वमय श्रेष्ठ रथ की बात कही गयी॥२९-३२॥

दर्भैश्च कुसुमैर्वापि लिखेदेतत् समाहितः।
सञ्चिन्त्य मनसा वापि पूर्वोद्दिष्टं विधानतः ॥३३॥
पूजयेत्परमं देवं खखोल्कमिति विश्रुतम्।
नित्यमेष विधिर्ज्ञेयः परो नैमित्तिकः स्मृतः ॥३४॥

३०८ श्रीसाम्बपुराणम्

तेजोदानादिदीक्षासु भुवनस्थापितर्पणे।
रथे चास्मिन्महायोगा बाह्यावाचारणावुभौ ॥३५॥

कुश अथवा पुष्प द्वारा समाहित होकर इन सबका अंकन करना चाहिये अथवा विधान के अनुसार पूर्वनिर्दिष्ट विषय की मन ही मन चिन्तना करके परम देवता का पूजन करना चाहिये, जो खखोल्क के नाम से विख्यात हैं। यह नित्य विधि है, अन्य को नैमित्तिक कहा गया है। तेजोदानादि दीक्षा का विषय है। भुवनस्थ आवि तर्पण में इस रथ का महायोग है। दोनों में बाह्य आचरण है। (दीक्षा तथा तर्पण दोनों में बाह्य आचार रहता है)॥३३-३५॥

रथकन्दरवीथ्यास्तु तदर्धगुणसम्मिता।
वीथी कार्या प्रमाणेन द्विगुणा चापरा बहिः ॥३६॥
सा तूद्दिष्टगुणा ग्रीवा चारुणा पद्मतुल्यया।
अलग्ना बाह्यतः कार्या याम्यां दिशि सदासुरः ॥३७॥
द्वारमेतद्विनिर्दिष्टं भिन्नमम्बुजवेश्मनि।
रथस्य बाह्यवीथ्यौ द्वे तस्य दीप्तिः प्रकीर्तिता ॥३८॥
ग्रहदिग्देवताभानोस्तत्रत्या गुणकन्दरा।
द्वारपश्चिमतॊ मोक्षं येन शिष्यान् प्रवेशयेत् ॥३९॥

रथ, कन्दर, वीथी (चत्वर) उसके आधे गुण के समान हैं। बाहर अन्य द्विगुण प्रमाण की वीथी का अंकन करे। यह होगी पूर्वनिर्दिष्ट गुणसम्पन्न पद्मतुल्य चारु ग्रीवा। बाहर विच्छिन्न होगा। दक्षिण दिक् में सर्वदा असुरगण रहेंगे। यह द्वार का वर्णन निश्चित हुआ। इसके अतिरिक्त पद्मगृह में रथ की दो बाहरी वीथी होगी। उसे रथ की दीप्ति कहते हैं। सूर्य के ग्रह दिक् देवगण वहाँ के गुणकन्दर हैं। द्वार के पश्चिम दिक् की ओर मोक्ष है। वहाँ से शिष्यों को प्रवेश कराये॥३६-३९॥

एवं निखिल उद्दिष्टः सूत्रपातविधिक्रमः।
अनेन सम्यग् ज्ञानेन प्राप्नोति परमां गतिम् ॥४०॥
आद्यक्षरेण येन स्याद् ये च लेख्याः सविग्रहाः।
यादृशयश्चरजः पाते विधिस्तत्कथयाम्यहम् ॥४१॥
मणिमुक्ताप्रवालोत्थैर्ब्रीहिधातुसमुद्भवैः।
चूर्णैरग्नीन्द्रमरुद्वर्णैरथ वा चानुपूर्वतः ॥४२॥

इस प्रकार से सभी सूत्रपात का विधिक्रम कह दिया था। इसके सम्यक् ज्ञान से परम गति मिलती है। जिस प्रकार से आद्य अक्षर द्वारा उसे विग्रह के साथ अंकित करना होगा तथा रजःपात की जो विधि है, मैं उसे कहता हूँ। मणि-मुक्ता तथा प्रवालोंत्थित व्रीहि एवं धातु-समुद्भव चूर्ण से अग्नि, इन्द्र तथा मरुद्वर्ण का रथ आनुपूर्वीक होता है॥४०-४२॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३०९

असंसक्तमिदं कुर्यादस्थूलामकृशां तथा।
अविक्षीणां रजोरेखां देशिकाङ्गुष्ठयोजिताम्॥४३॥
न च मासप्रमाणं तु रेखामानवशाद् भवेत्।
वलिता चापरां मृष्या दीना शुक्ला ततः क्रमात्॥४४॥
पद्मगर्भस्य नवमो योगः स परिकीर्तितः।
तस्याधिनवमे याम्यां तयोर्मध्ये तु तत्स्मृतः॥४५॥

यह परस्पर मिलित नहीं होगा। इसी प्रकार स्थूल एवं कृश नहीं होगा। रजोरेखा होगी गुरु के अंगुष्ठ में योजित अक्षीण। मास इसका प्रमाण नहीं होगा। रेखा ही मान-प्रमाण होगी। क्रम से कहने पर मृष्य, दीन, शुक्लवर्ण के पद्मगर्भ में नवम योग के रूप में कीर्तित होता है। उसके भी नवम दक्षिण दिशा में उन दो के मध्य में वह स्मृत है॥४३-४५॥

लिखेद् भूतादितः पद्मं भौतिके पद्मप्रभम्।
उदितार्कसमानं तु नैष्ठिके कर्मणि स्थितम्॥४६॥
पीतां तु कर्णिकां तत्र किञ्जल्कं हरितं लिखेत्।
केसराणयरुणान्यन्तः शुक्लान्यदन्तपत्रयोः॥४७॥
पीतामर्कपुरं शोणमस्त्रं पद्माग्रसन्धिषु।
प्रतिदिग्देवतास्त्राणि स्वीकृत्य हरितान् हयान्॥४८॥

भूतादि से पद्म का अंकन करे। भौतिक में पद्म तुल्य होगा (कमल के समान)। नैष्ठिक कर्म में उदित सूर्य के समान (नैष्ठिक कर्म में पद्म के समान अंकन न होकर उदित सूर्य जैसा अंकन करना चाहिये, उसमें पद्म के समान अंकन नहीं होगा)। कर्णिका जहाँ होगी, वहाँ पीतवर्ण तथा किंजल्क हरितवर्ण का होगा। केशरसमूह में अरुण वर्ण होगा तथा अन्त पत्र (दोनों) का वर्ण शुक्ल होगा। सूर्यपुरी का वर्ण होगा पीत। पद्म की अग्रसन्धि में रक्त वर्ण का अस्त्र होगा। प्रत्येक दिग् देवता का अस्त्र स्वीकार करना होगा। उनके अस्त्र होंगे—हरितवर्ण॥४६-४८॥

संध्यारुणसमं व्योमकन्दरां कनकप्रभाम्।
सितपीतारुणैर्वर्णैर्यष्टिर्र्लेखासु नाननः॥४९॥

सन्ध्याकालीन अरुण के समान वर्ण का आकाश बनाये। कन्दर स्वर्णतुल्य होंगे। श्वेत, पीत तथा अरुण वर्ण के द्वारा यष्टि रञ्जित करे, किन्तु मुख न करे॥४९॥

चतुर्भिर्वर्णकैर्लेख्यं सर्वमावरणादिकम्।
चतुर्भिर्वर्णकैरेव चारालात् पूरयेत्तथा॥५०॥
उक्ता देवादयो येषु पूर्वस्थानेषु तत्र वै।
स्वनाभ्याभ्यन्तरे तेषां लिखितं खेलनं भवेत्॥५१॥