भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 319

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३०५

दन्दशूकाखुकेशास्थिकाष्ठभस्मतुषादिकम् । खखोल्कं च गुरुं चैव प्रणम्य शिरसाः ततः ॥९॥ भूम्यादि भ्रामयेच्छिष्यः स्वपेत्संयतमानसः ।

पूर्वनिर्दिष्ट सुविस्तीर्ण शुभ्र, शुचि भूमिभाग गोगण (गौओं) का आवास स्थान बनाये तथा वह होगा—ब्राह्मणों से अभिनन्दित। चैत्य (श्मशान का वृक्ष अथवा बौद्ध मन्दिर), कण्टक, दीमक की बांबी तथा श्मशानादि से वर्जित यह स्थान होता है। खखोल्क हृदय द्वारा अर्घ्य देकर विच्छू, सर्पादि, चूहों के वासस्थान का, केश, अस्थि, काठ की राखी तथा तुष आदि से स्थान का शोधन करे। सूर्य को तथा गुरु को शिर नत करके प्रणाम करना चाहिये। शिष्य ऐसा करके भूमि प्रभृति पर भ्रमण करे तथा संयत होकर शयन करे॥७-९॥

प्रासादं द्विरदादीनां काननस्य द्रुमस्य च ॥१०॥ आरोहणं प्रशस्तं स्यात् स्वप्ने सिंहासनस्य वा । वस्त्रभूषणदध्यन्ननारीक्षेत्रध्वजस्रजम् ॥११॥ लोभो प्रस्तरणं वैरिमारणं रुधिरस्रवम् । मांसाशनं सुरास्वादो रुधिरस्वादुकर्त्तनम् ॥१२॥ स्वप्न एवंविधो दृष्टः साधयेदभिवाञ्छितम् ।

शयन में प्रासाद, हाथी-प्रभृति, जंगल, वृक्ष अथवा सिंहासन पर आरोहण दर्शन करना प्रशस्त है। ऐसे ही वस्त्र, भूषण, दधि, अन्न, नारी, खेत, ध्वजा, माला, पुष्पादि-रचित शय्या, शत्रुमारण, रक्तक्षरण, मांसभक्षण, मद्यपान, रक्तवर्ण मणिविशेष का कर्त्तन—ऐसे स्वप्न अभीष्टप्रद होते हैं॥१०-१२॥

पुनः कुर्वीत संस्कारं चन्दनागुरुपाणिना ॥१३॥ तत्स्थानं शोभनं कार्यं नानाध्वजविभूषितम् । किङ्किणीनादमुखरं प्रचलच्चारुचामरम् ॥१४॥

पुनः चन्दन, अगुरु-मिश्रित जल द्वारा संस्कार करे। नाना ध्वजाओं से स्थान को शोभित करना उचित है। वह स्थान किङ्किणी के शब्द से मुखर तथा सुन्दर चामरयुक्त होना चाहिये॥१३-१४॥

पद्मपत्रवनोपेतं कदलीखण्डमण्डितम् । शिखिपिच्छोल्लसच्छत्रं वितानकविभूषितम् ॥१५॥ नानारत्नसमाकीर्णं लसत्स्रग्दामतोरणम् । त्रिवृतं ग्रन्थिरहितं क्षौमं कार्पासमाविकम् ॥१६॥ सूत्रं प्रशस्यते तत्र खखोल्कपुरतस्ततः । आशापूर्वासमस्या तु सावित्र्या शासते रविः ॥१७॥