साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०६ श्रीसाम्बपुराणम्
पद्मपत्र के वनयुक्त, केला के वृक्षों से शोभित हो, छत्र में मयूर का पंख लगा हो तथा चंदोवा द्वारा विभूषित हो। वह नानाविध रत्नों से समाकीर्ण हो, मालाओं के तोरण से शोभित किया गया हो। ग्रन्थिरहित त्रिवृत, क्षौम, कपास तथा रोयें से बने सूत्र से खखोल्क (सूर्य) के सामने (सजाना) प्रशस्त है। पूर्व की ओर सावित्री के साथ रवि शासन करते हैं।।१५-१७।।
ध्रुवास्पदास्तु सौम्या ये स्यातां पश्चिमदक्षिणे।
तत्र क्षोणीं प्रमाणेन अतुलात्प्रभृतिक्रमः ॥१८॥
कर्णिकां सूत्रयेन्मध्ये कमलस्य रवेः शुभाम्।
केसरं कर्णिकातुल्यं तस्माच्च द्विगुणं दलम् ॥१९॥
ध्रुवास्पद सौम्य का स्थान पश्चिम-दक्षिण में है। वहाँ क्षोणी प्रमाण से अतुल से क्रम जाने (अर्थात् अतुल से क्रम प्रारम्भ करे)। रवि के कमल के मध्य में शुभ कर्णिका चिह्नित करना होगा। केशर है कर्णिका के तुल्य। उसका दूना होगा दल।।१८-१९।।
मण्डलं वृत्तपत्राग्रं तच्छिष्ठाब्जपुरःस्थितम्।
षड्विंशतिबीजपत्रं चतुर्विंशतिकेसरम् ॥२०॥
कर्षितं च सिताम्भोजं चतुःशृङ्गं शिखोज्ज्वलम्।
ततोऽपि बाह्यमपरं चतुरस्रं तु सूत्रयेत् ॥२१॥
पद्म के पुरस्थित वृत्तपत्राग्र मण्डल होगा। २६ बीजपत्र तथा २४ केशर रहेंगे। उज्ज्वल शिखायुक्त चार शृङ्गविशिष्ट श्वेत कमल अंकित करे। उसके बाह्य की ओर अन्य चतुरस्र बनाये।।२०-२१।।
चतुर्ग्रीवं विदिक्कोणं रथस्यावयवं शुभम्।
पुरावर णमध्ये तु अरुणं कन्दरावृतम् ॥२२॥
तत्पर्यन्तं विनिष्क्रान्ते द्वे द्वे रेखे तदर्द्धिके।
पुनस्तिर्यग्गतेऽग्रे तु स्वनिष्क्रान्तप्रमाणतः ॥२३॥
चार ग्रीवायुक्त, विदिक् कोणयुक्त रथ के अवयव शुभ होते हैं। पूर्व आवरण में कन्दरावृत स्थान अरुण का है। वहाँ तक विनिष्क्रान्त होकर दो-दो रेखा प्राप्त करना चाहिये। उसका आधा अब तिर्यक् भाव से स्वनिष्क्रान्त प्रमाण होगा।।२२-२३।।
पुनस्तावच्च निष्क्रम्य विलग्नमुखयेत्तु ते।
पद्मगर्भाद्विनिष्क्रांतां वारुण्यां मकराननाम् ॥२४॥
यष्टिं पद्मायतां कुर्याद्रथस्य कर्णिकामिताम्।
यष्ट्यग्रे सप्तसंलग्नान् वाजिनः पार्श्वयोर्द्वयोः ॥२५॥