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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

३०६ श्रीसाम्बपुराणम्

पद्मपत्र के वनयुक्त, केला के वृक्षों से शोभित हो, छत्र में मयूर का पंख लगा हो तथा चंदोवा द्वारा विभूषित हो। वह नानाविध रत्नों से समाकीर्ण हो, मालाओं के तोरण से शोभित किया गया हो। ग्रन्थिरहित त्रिवृत, क्षौम, कपास तथा रोयें से बने सूत्र से खखोल्क (सूर्य) के सामने (सजाना) प्रशस्त है। पूर्व की ओर सावित्री के साथ रवि शासन करते हैं।।१५-१७।।

ध्रुवास्पदास्तु सौम्या ये स्यातां पश्चिमदक्षिणे।
तत्र क्षोणीं प्रमाणेन अतुलात्प्रभृतिक्रमः ॥१८॥
कर्णिकां सूत्रयेन्मध्ये कमलस्य रवेः शुभाम्।
केसरं कर्णिकातुल्यं तस्माच्च द्विगुणं दलम् ॥१९॥

ध्रुवास्पद सौम्य का स्थान पश्चिम-दक्षिण में है। वहाँ क्षोणी प्रमाण से अतुल से क्रम जाने (अर्थात् अतुल से क्रम प्रारम्भ करे)। रवि के कमल के मध्य में शुभ कर्णिका चिह्नित करना होगा। केशर है कर्णिका के तुल्य। उसका दूना होगा दल।।१८-१९।।

मण्डलं वृत्तपत्राग्रं तच्छिष्ठाब्जपुरःस्थितम्।
षड्विंशतिबीजपत्रं चतुर्विंशतिकेसरम् ॥२०॥
कर्षितं च सिताम्भोजं चतुःशृङ्गं शिखोज्ज्वलम्।
ततोऽपि बाह्यमपरं चतुरस्रं तु सूत्रयेत् ॥२१॥

पद्म के पुरस्थित वृत्तपत्राग्र मण्डल होगा। २६ बीजपत्र तथा २४ केशर रहेंगे। उज्ज्वल शिखायुक्त चार शृङ्गविशिष्ट श्वेत कमल अंकित करे। उसके बाह्य की ओर अन्य चतुरस्र बनाये।।२०-२१।।

चतुर्ग्रीवं विदिक्कोणं रथस्यावयवं शुभम्।
पुरावर णमध्ये तु अरुणं कन्दरावृतम् ॥२२॥
तत्पर्यन्तं विनिष्क्रान्ते द्वे द्वे रेखे तदर्द्धिके।
पुनस्तिर्यग्गतेऽग्रे तु स्वनिष्क्रान्तप्रमाणतः ॥२३॥

चार ग्रीवायुक्त, विदिक् कोणयुक्त रथ के अवयव शुभ होते हैं। पूर्व आवरण में कन्दरावृत स्थान अरुण का है। वहाँ तक विनिष्क्रान्त होकर दो-दो रेखा प्राप्त करना चाहिये। उसका आधा अब तिर्यक् भाव से स्वनिष्क्रान्त प्रमाण होगा।।२२-२३।।

पुनस्तावच्च निष्क्रम्य विलग्नमुखयेत्तु ते।
पद्मगर्भाद्विनिष्क्रांतां वारुण्यां मकराननाम् ॥२४॥
यष्टिं पद्मायतां कुर्याद्रथस्य कर्णिकामिताम्।
यष्ट्यग्रे सप्तसंलग्नान् वाजिनः पार्श्वयोर्द्वयोः ॥२५॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३०७

अब निष्क्रमण करके उभय दिक् विलग्न होगा। पद्मगर्भ से विनिष्क्रान्त पश्चिम दिशा की ओर पद्मपत्र के समान विस्तृत यष्टि रथ की कर्णिका के समान बनवाये। यह होगा यष्टि के आगे सात संलग्न अश्व के दोनों ओर॥२४-२५॥

तदधस्तावती यष्टेर्मूलादूर्ध्वस्मृतोऽरुणः।
क्षोणी च पीठमित्युक्ता तथान्तः शेषपन्नगाः ॥२६॥
कर्णिका तेजसः पिण्डो भूताद्या बीजसंज्ञिता।
खपरं कर्णिका व्योम वारं पत्रं सकेसरम् ॥२७॥
पत्राग्रं मण्डलं हस्तिरन्तर्व्योमस्थितं पुरे।
वाह्याकाशं च तं विद्धि यष्टिधर्मार्थसंज्ञितम् ॥२८॥

यष्टि के नीचे उसी प्रकार मूल के ऊर्ध्व में अरुण का स्मरण करना चाहिये। पृथ्वी को पीठ कहते हैं। उसमें शेषनागगण की स्थिति है। तेज के पिण्डद्वय को कर्णिका, भूतादि बीजसंज्ञक, खपर, कर्णिका, व्योम तथा वारसमूह को केशरायुक्त पत्र कहते हैं। पत्र के अग्रभाग में मण्डल है। पुर के मध्य में व्योमस्थित हस्ति रहते हैं। उसे बाह्याकाश जानो, जो यष्टिधर्मार्थ नामक है॥२६-२८॥

रथः संवत्सरो ज्ञेयः पितरस्त्वृतवः स्मृताः।
नेत्रं पत्रस्य मूले वै दोषाच्छन्दांसि शङ्करः ॥२९॥
सुषुम्नाद्यास्तु या नाड्यः सहस्रं रविविग्रहे।
अत ऊर्ध्वं विदिक्षु स्यात् पीतं तस्य शतं शतम् ॥३०॥
योजनायतविस्तीर्णमुच्छ्रितं तत्प्रमाणतः।
अरुणो घृणयः प्रोक्ता बाह्यछन्दांसि वाजिनः ॥३१॥
पञ्चर्तुर्वासुकिः प्रोक्तश्चक्रेशोऽस्य भुवस्त्रयः।
एवं सर्वमयं प्रोक्तं रथश्रेष्ठं विभावसोः ॥३२॥

रथ को संवत्सर जानना चाहिये। ऋतुसमूह को पितृगण कहा है। पत्र के मूल में नेत्ररूप रात्रि तथा शम्भुरूपी हैं छन्द। सूर्य शरीर में सुषुम्नादि हजार नाड़ियाँ हैं, इसलिये ऊर्ध्व में विदिकू में १००-१०० पीतवर्ण रहते हैं। वह योजनायत विस्तीर्ण है। उसके प्रमाण से उच्छ्रित अरुण तथा घृणिसमूह (शिखाओं के) के अश्वों को बाह्य छन्द कहा जाता है। वासुकी को पञ्च ऋतु कहा गया है तथा इस भुवन के तीन लोक चक्रेश हैं। इस प्रकार से विभावसु के सर्वमय श्रेष्ठ रथ की बात कही गयी॥२९-३२॥

दर्भैश्च कुसुमैर्वापि लिखेदेतत् समाहितः।
सञ्चिन्त्य मनसा वापि पूर्वोद्दिष्टं विधानतः ॥३३॥
पूजयेत्परमं देवं खखोल्कमिति विश्रुतम्।
नित्यमेष विधिर्ज्ञेयः परो नैमित्तिकः स्मृतः ॥३४॥

३०८ श्रीसाम्बपुराणम्

तेजोदानादिदीक्षासु भुवनस्थापितर्पणे।
रथे चास्मिन्महायोगा बाह्यावाचारणावुभौ ॥३५॥

कुश अथवा पुष्प द्वारा समाहित होकर इन सबका अंकन करना चाहिये अथवा विधान के अनुसार पूर्वनिर्दिष्ट विषय की मन ही मन चिन्तना करके परम देवता का पूजन करना चाहिये, जो खखोल्क के नाम से विख्यात हैं। यह नित्य विधि है, अन्य को नैमित्तिक कहा गया है। तेजोदानादि दीक्षा का विषय है। भुवनस्थ आवि तर्पण में इस रथ का महायोग है। दोनों में बाह्य आचरण है। (दीक्षा तथा तर्पण दोनों में बाह्य आचार रहता है)॥३३-३५॥

रथकन्दरवीथ्यास्तु तदर्धगुणसम्मिता।
वीथी कार्या प्रमाणेन द्विगुणा चापरा बहिः ॥३६॥
सा तूद्दिष्टगुणा ग्रीवा चारुणा पद्मतुल्यया।
अलग्ना बाह्यतः कार्या याम्यां दिशि सदासुरः ॥३७॥
द्वारमेतद्विनिर्दिष्टं भिन्नमम्बुजवेश्मनि।
रथस्य बाह्यवीथ्यौ द्वे तस्य दीप्तिः प्रकीर्तिता ॥३८॥
ग्रहदिग्देवताभानोस्तत्रत्या गुणकन्दरा।
द्वारपश्चिमतॊ मोक्षं येन शिष्यान् प्रवेशयेत् ॥३९॥

रथ, कन्दर, वीथी (चत्वर) उसके आधे गुण के समान हैं। बाहर अन्य द्विगुण प्रमाण की वीथी का अंकन करे। यह होगी पूर्वनिर्दिष्ट गुणसम्पन्न पद्मतुल्य चारु ग्रीवा। बाहर विच्छिन्न होगा। दक्षिण दिक् में सर्वदा असुरगण रहेंगे। यह द्वार का वर्णन निश्चित हुआ। इसके अतिरिक्त पद्मगृह में रथ की दो बाहरी वीथी होगी। उसे रथ की दीप्ति कहते हैं। सूर्य के ग्रह दिक् देवगण वहाँ के गुणकन्दर हैं। द्वार के पश्चिम दिक् की ओर मोक्ष है। वहाँ से शिष्यों को प्रवेश कराये॥३६-३९॥

एवं निखिल उद्दिष्टः सूत्रपातविधिक्रमः।
अनेन सम्यग् ज्ञानेन प्राप्नोति परमां गतिम् ॥४०॥
आद्यक्षरेण येन स्याद् ये च लेख्याः सविग्रहाः।
यादृशयश्चरजः पाते विधिस्तत्कथयाम्यहम् ॥४१॥
मणिमुक्ताप्रवालोत्थैर्ब्रीहिधातुसमुद्भवैः।
चूर्णैरग्नीन्द्रमरुद्वर्णैरथ वा चानुपूर्वतः ॥४२॥

इस प्रकार से सभी सूत्रपात का विधिक्रम कह दिया था। इसके सम्यक् ज्ञान से परम गति मिलती है। जिस प्रकार से आद्य अक्षर द्वारा उसे विग्रह के साथ अंकित करना होगा तथा रजःपात की जो विधि है, मैं उसे कहता हूँ। मणि-मुक्ता तथा प्रवालोंत्थित व्रीहि एवं धातु-समुद्भव चूर्ण से अग्नि, इन्द्र तथा मरुद्वर्ण का रथ आनुपूर्वीक होता है॥४०-४२॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३०९

असंसक्तमिदं कुर्यादस्थूलामकृशां तथा।
अविक्षीणां रजोरेखां देशिकाङ्गुष्ठयोजिताम्॥४३॥
न च मासप्रमाणं तु रेखामानवशाद् भवेत्।
वलिता चापरां मृष्या दीना शुक्ला ततः क्रमात्॥४४॥
पद्मगर्भस्य नवमो योगः स परिकीर्तितः।
तस्याधिनवमे याम्यां तयोर्मध्ये तु तत्स्मृतः॥४५॥

यह परस्पर मिलित नहीं होगा। इसी प्रकार स्थूल एवं कृश नहीं होगा। रजोरेखा होगी गुरु के अंगुष्ठ में योजित अक्षीण। मास इसका प्रमाण नहीं होगा। रेखा ही मान-प्रमाण होगी। क्रम से कहने पर मृष्य, दीन, शुक्लवर्ण के पद्मगर्भ में नवम योग के रूप में कीर्तित होता है। उसके भी नवम दक्षिण दिशा में उन दो के मध्य में वह स्मृत है॥४३-४५॥

लिखेद् भूतादितः पद्मं भौतिके पद्मप्रभम्।
उदितार्कसमानं तु नैष्ठिके कर्मणि स्थितम्॥४६॥
पीतां तु कर्णिकां तत्र किञ्जल्कं हरितं लिखेत्।
केसराणयरुणान्यन्तः शुक्लान्यदन्तपत्रयोः॥४७॥
पीतामर्कपुरं शोणमस्त्रं पद्माग्रसन्धिषु।
प्रतिदिग्देवतास्त्राणि स्वीकृत्य हरितान् हयान्॥४८॥

भूतादि से पद्म का अंकन करे। भौतिक में पद्म तुल्य होगा (कमल के समान)। नैष्ठिक कर्म में उदित सूर्य के समान (नैष्ठिक कर्म में पद्म के समान अंकन न होकर उदित सूर्य जैसा अंकन करना चाहिये, उसमें पद्म के समान अंकन नहीं होगा)। कर्णिका जहाँ होगी, वहाँ पीतवर्ण तथा किंजल्क हरितवर्ण का होगा। केशरसमूह में अरुण वर्ण होगा तथा अन्त पत्र (दोनों) का वर्ण शुक्ल होगा। सूर्यपुरी का वर्ण होगा पीत। पद्म की अग्रसन्धि में रक्त वर्ण का अस्त्र होगा। प्रत्येक दिग् देवता का अस्त्र स्वीकार करना होगा। उनके अस्त्र होंगे—हरितवर्ण॥४६-४८॥

संध्यारुणसमं व्योमकन्दरां कनकप्रभाम्।
सितपीतारुणैर्वर्णैर्यष्टिर्र्लेखासु नाननः॥४९॥

सन्ध्याकालीन अरुण के समान वर्ण का आकाश बनाये। कन्दर स्वर्णतुल्य होंगे। श्वेत, पीत तथा अरुण वर्ण के द्वारा यष्टि रञ्जित करे, किन्तु मुख न करे॥४९॥

चतुर्भिर्वर्णकैर्लेख्यं सर्वमावरणादिकम्।
चतुर्भिर्वर्णकैरेव चारालात् पूरयेत्तथा॥५०॥
उक्ता देवादयो येषु पूर्वस्थानेषु तत्र वै।
स्वनाभ्याभ्यन्तरे तेषां लिखितं खेलनं भवेत्॥५१॥

३१० श्रीसाम्बपुराणम्

एवं मण्डलमालेख्य भूयः स्नात्वा समाहितः। शस्यते हरितां हृद्यां सर्वेषु रविकर्मसु ॥५२॥

चार वर्णों से आवरणादि का अंकन करे। ऐसे ही चार वर्ण से अन्तराल वाले स्थानों को भी अंकित करे। जिन पूर्व स्थानों में देवादि की स्थिति कही गयी है, नाभिदेश के अभ्यन्तर में उनका अंकन करना चाहिये। इस प्रकार मण्डल का अंकन करके समाहित होकर सूर्य के समस्त कार्यों में मन लगाये।।५०-५२।।

अग्निगर्भस्य चान्तेषु प्रागुदक्कुलकान् कुशान्। न्यसेत्समंतात् सर्वेषु ह्यग्निकार्ये च नैत्यिके ॥५३॥ विशेषं परमं किञ्चित्पूजाग्निक्रिययोर्मया। कथ्यमानं सुराः सर्वे निबोधत महाफलम् ॥५४॥ नदीद्विकूलगोशृङ्गमृत्स्नागोशीर्षकाननम् । शुक्लं सभस्मदूर्वान्तिकर्णीसर्षपरोचनाः ॥५५॥ क्रोड़क्रान्तां निशां मुस्तां सर्वास्राष्ट्रासु दिक्ष्वपि। चन्दनोदकपूर्वेषु चन्दनस्थालिकेषु च ॥५६॥ शम्याभिपल्लवाक्षेपचिराजितमुखेषु च। कन्दराबद्धवस्त्रेषु कलशेषु विनिक्षिपेत् ॥५७॥

नित्य अग्नि कार्य में तथा अग्निगर्भ के चतुर्दिक उदककुलक कुश का विन्यास करे। पूजा तथा अग्निकार्य के सम्बन्ध में कुछ विशेष मैं कहता हूँ। हे देवगण! तुम उसे सुनो। वह महान् फलद है। नदी के दोनों तट, गाय का सींग, मृत्तिका, गाय का मस्तक, वन पर शुक्ल भस्म के साथ दूर्वा, अंतिकर्णी, सरसों, रोचना (गोरोचन), क्रोड़क्रान्त निशा, मुस्ता को सभी आठ दिशाओं में चन्दन मिश्रित जल के साथ चन्दनस्थ असिक, शमि के अभि-पल्लवाक्षेप से तथा चिराजित मुख में कन्दर के द्वारा वस्त्रबद्ध कलशों को निक्षेप करना होगा (इन सबका कोई अर्थ स्पष्ट नहीं है। अतः मात्र शब्दार्थ दिया गया है)।।५३-५७।।

संवत्सरस्य तस्यापि दिश्याग्नेय्यां ततः शुभम्। अग्निकुण्डं विदिक्कोणे तदेवपुरसम्मितम् ॥५८॥ आर्यादितीर्थसहितं निखातं द्वादशाङ्गुलम्। विस्तृताष्टाङ्गुलं तीर्थं कुर्यात्प्राक् प्लवमुत्तमम् ॥५९॥

आर्यादिकतीर्थम् ।

उस संवत्सर के आग्नेयी दिशा में (पूर्व तथा दक्षिण का मध्यवर्ती कोण) शुभ अग्नि-कुण्ड, विदिक् कोण में पद्मपुर के समान आर्यादि तीर्थ के साथ १२ अंगुल निखात करे। विस्तृत आठ अंगुल नीचे प्रवाह में उत्तम तीर्थ करे। यह है आर्यादिक तीर्थ।।५८-५९।।

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३११

कुण्डादष्टाङ्गुलं न्यस्य याम्यदर्भसमेन कम्।
विज्ञः सप्ताङ्गुलैश्चैव पारियात्रमथोत्तरे ॥६०॥
यैः सहैव खखोल्कस्य पूजा निगदिता शुभा।
वह्निरूपः स तैः सार्द्धं ध्येयः स्वहृदयेन तु ॥६१॥
ब्रह्मतो वरुणाभ्यासे प्राङ्मुखे स्रुक्स्रुवौ न्यसेत्।
इष्टाङ्गानि तु सर्वाणि गुरोर्नैर्ऋतभागतः ॥६२॥
अक्षीणाग्राः कुशा ह्रस्वा लूनाश्चैवोपमूलतः।
शस्यं ते हरिता हृद्याः सर्वेषु रविकर्मसु ॥६३॥

विज्ञ व्यक्ति कुण्ड से आठ अंगुल दक्षिण में दर्भ (कुश) निक्षेप करे। उत्तर दिशा में सात अंगुल का पारियात्र बनाये। जिनके साथ खखोल्क की (सूर्य की) पूजा की वार्त्ता कही गयी हो, उनके साथ अपने हृदय में वह्निरूप सूर्य का ध्यान करना चाहिये। ब्रह्मा से लेकर वरुण के पास तक पूर्व मुख में स्रुक् तथा स्रुव को न्यस्त करे। गुरु के नैर्ऋत्य भाग में समस्त ईप्सित अंग समूह रहें। उनके अग्रभाग में छोटी कुशों को (जो क्षीण न हों) न्यस्त करना होगा। सूर्य के सभी कर्म में हरे रंग के शस्य ईप्सित हैं।।६०-६३।।

अग्निगर्भस्य चान्तेषु प्रागुदक्कुलकान् कुशान्।
न्यसेत्समन्तात् सर्वेषां ब्रह्मादीनामधस्ततः ॥६४॥
चतुर्विंशतिरङ्गुष्ठपरिमाणं स्रुवस्य तु।
तस्याप्युद्धरणाग्रस्य न तमङ्गुष्ठसम्मितम् ॥६५॥
तदर्द्धाङ्गुलं पात्रिमानं पाणिपात्रतलोदरम्।
वृत्तं तस्यापि निर्दिष्टं खातं द्व्यङ्गुलमेव च ॥६६॥
रक्तचन्दनकाष्ठैश्च खदिराश्वत्थकिंशुकैः।
अन्यैश्चैवापि याज्ञीयैः कर्तव्यं स्रुक्स्रुवादिकम् ॥६७॥

अग्निगर्भ के शेष भाग में पूर्व में उदक कुलक कुश का ब्रह्मादि के नीचे चारो ओर निःक्षेप करे। स्रुव का परिमाण होगा २४ अंगुल। उद्धरण (जिससे यज्ञ में घृत दिया जाता है) का अग्रभाग नत तथा अंगुष्ठ के समान होगा। उसके अर्द्धाङ्गुल पात्रिमाण में हस्तरूप पात्र के तल देश में जिसका उदर है उसका वृत्त निर्दिष्ट है—वहाँ दो अंगुल गहराई होगी। रक्तवर्ण चन्दन की लकड़ी से, खैर, पीपल, किंशुक अथवा अन्य यज्ञीय काष्ठ से स्रुक् तथा स्रुवा का निर्माण करना उचित है।।६४-६७।।

काष्ठैरमीभिः कर्तव्यं मुशलोलूखलं तथा।
चमसश्चैव तत्रापि मुशलं द्वादशाङ्गुलम् ॥६८॥
उलूखलं तु दिक्संख्यं खातं च चतुरङ्गुलम्।
चमसवर्णसंख्यातं खातं ह्यर्द्धाङ्गुलं तथा ॥६९॥

३१२ श्रीसाम्बपुराणम्

पुच्छं षडङ्गुलं तस्य विज्ञेयं परिमाणतः । दन्तकाष्ठन्तु शिष्यस्य ललाटेन तु सम्मितम् ॥७०॥

इन सब लकड़ियों से मूसल-उलूखल तथा चमस बनाना उचित है। मूशल होगा १२ अगुल। उलूखल होगा दस अंगुल परिमित तथा चार अंगुल गहरा होगा। चमस होगा चार अंगुल परिमित तथा आधा अंगुल गहरा। उसके पुच्छ का परिमाण होगा छः अंगुल। दन्तकाष्ठ होगा शिष्य के ललाट के तुल्य ।।६८-७०।।

अर्कस्य समिधः काष्ठं द्वादशाङ्गुलमायतम् । अवक्रं सत्वचं चैव सार्द्रन्निष्पाणिकं तथा । उपवीतं कुशमयं कर्त्तव्या मेखला त्रिवृत् ॥७१॥ समा शुक्ला च मौञ्जी स्याद्बर्हिजा बिल्वजा तथा । अविच्छिन्नशिखाजालः सर्पिः काञ्चनसन्निभम् ॥७२॥ स्निग्धः प्रदक्षिणावर्तो वह्निः सिद्धिकरः स्मृतः । उलूखलैः ततस्तस्मिंक्षोदयेच्चतुरङ्गुलम् ॥७३॥

सूर्य के समिध का काष्ठ १२ अंगुल का हो। वह वक्र न हो। त्वचा से युक्त, आर्द्र तथा शाखारहित हो। कुशमय उपवीत हो तथा उसमें त्रिवृत मेखला हो। समान तथा शुक्लवर्ण की मौञ्जी होनी चाहिये, जो मयूरपुच्छ की अथवा वस्त्र की हो। अविच्छिन्न अग्नि शिखायुक्त घृत स्वर्ण के समान उज्ज्वल हो (पिघलने पर स्वर्ण के समान स्वर्णाभ लगे)। स्निग्ध प्रदक्षिणावर्त्त अग्नि (होमाग्नि जो दक्षिण (दाहिनी) ओर घूमती हो) सिद्धिकारक कही गयी है। तदनन्तर उलूखल को चार अङ्गुल खोद दे (गहरा करे) ।।७१-७३।।

खखोल्कमूलमन्त्रेण मुशलेन समाहितः । नवोप्पानं तु शिखया पञ्चसा तण्डुलेन च ॥७४॥ मूलेन चैव शमयेत्पायसं चतुरङ्गुलम् । प्रवेश्याः प्रयताः शिष्या ये पूर्वमधिवासिताः ॥७५॥

सूर्य के मूलमंत्र में मूसल द्वारा समाहित हो शिखा द्वारा नौ उपपान एवं ५-६ तण्डुलों द्वारा तथा मूल द्वारा ४ अंगुल पायस उपशम करे। तदनन्तर जो पूर्व में अधिवास करते हैं, संयत मन उन शिष्यों को प्रवेश (मण्डल में) कराये ।।७४-७५।।

लिखितं स्याद्यमुद्दिश्य तं च पूर्वं निवेशयेत् । सोष्णीषं वाग्यतं दान्तं सितचन्दनचर्चितम् ॥७६॥ अचञ्चलोज्ज्वलकरं सितवस्त्रविभूषितम् । गवां पुच्छेन सलिलैः खखोल्काहृदयेन तु ॥७७॥ अभिषिञ्चेद् गुरुः शिष्यं ततस्तैः पापनाशनैः । प्रदद्याद् गुरवे शिष्यो गां वत्सेन समन्विताम् ॥७८॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३१३

चारुरूपां समाधानां हेमस्रग्वस्त्रभूषिताम्।
सितवस्त्रावृतखुरां द्वारेणाप्यानयेत्सदा ॥७९॥

जिनके उद्देश्य से इसे अंकित किया गया है, उन्हें पूर्व में निवेश कराये (उन शिष्यों को पूर्व में स्थित करे)। सर मौन पगड़ी पहने, मौन, उज्ज्वल हस्त, श्वेत वस्त्रधारी शिष्य को पापनाशक गौ के पुच्छ के जल द्वारा खखोल्क मन्त्र से गुरु अभिषिञ्चन कराये। शिष्य गुरु को बछड़े के साथ गौदान करे। गौ सुन्दर हो। स्वर्ण, माला तथा वस्त्र से भूषित हो, श्वेत वस्त्र द्वारा आवृत, विशिष्ट खुरों वाली गौ को द्वार पर लाये॥७६-७९॥

प्रवेश्य यष्ट्याः पुरतः स्थापयेत्सुसमाहितः।
कायिकं वाचिकं चैव मानसं च हरेद् गुरुः ॥८०॥
पापं हि त्रिविधं तस्य खखोल्कहृदयादिभिः।
पुष्पैरञ्जलिमापूर्य जानुभ्यां धरणीं गतः ॥८१॥
खखोल्कमिति-मन्त्रेण कमले प्रक्षिपेत्तदा।
पद्मस्य यस्मिन्देवाग्रे प्रक्षिप्तं कुसुमं पतेत् ॥८२॥

प्रवेश करके याग करे। सामने सुसमाहित शिष्य को स्थापित करे। गुरु शिष्य के कायिक-वाचिक तथा मानसिक त्रिविध पाप का हरण खखोल्क हृदयादि से करे। पुष्प के द्वारा अञ्जलि पूर्ण करे। जानुद्वय को भूमि पर टिकाकर 'खखोल्क' इत्यादि मन्त्र से कमल निक्षेप करे। ऐसे निक्षिप्त करे कि देवता के आगे पुष्प गिरें॥८०-८२॥

एतस्य कुलदेवः स्यात्सद्यः सर्वार्थसाधकः।
उत्पाद्य मुखबन्धन्तु दृष्ट्वा हंसं समन्ततः ॥८३॥
खखोल्ककुलदेवस्य प्रणमेद्यत्नतः क्रमात्।
पद्मरागेण हेम्ना वा युक्तं सर्वान्निवेशयेत् ॥८४॥

वे होंगे शिष्य के कुलदेवता तथा सद्यः सर्वार्थ-साधक। मुखबन्ध करके चारो ओर हंस (जीवात्मा) को देखे। यत्नपूर्वक खखोल्क कुलदेवता को प्रणाम करे। पद्मरागमणि से अथवा स्वर्ण से सबकी स्थापना करे॥८३-८४॥

ऐशानीं तु दिशं नीत्वा गुरुः शिष्यं कुशासने।
उपवेश्य ततो दद्यान्नृपतिर्यजनानि तु ॥८५॥

गुरुदेव शिष्य को ईशानी (पूर्व तथा उत्तर के मध्यवर्त्ती के अधिपति) शिव की ओर ले जाकर कुशासन पर बैठाये। नृपति वहाँ बैठकर पूजोपहार प्रदान करें॥८५॥

कुशाग्रेण समादाय कलशेभ्यो गुरुर्जलम्।
पूर्वाननं खखोल्काग्रैः शिष्यं तमभिषेचयेत् ॥८६॥

३१४ श्रीसाम्बपुराणम्

अभिषेककाले तस्याथ ब्राह्मणास्तु यथाक्रमम्। त्रिष्वेतेषु देवेषु त्रिशिक्षां परिपाठयेत् ॥८७॥ अस्य वासोद्वयमिति उदूत्यं च निधापयेत्। आकृष्णेनेति यजुषामष्टौ व्याहृतिकत्रयम् ॥८८॥ आदित्यव्रतसंज्ञं च शुक्लं वस्त्रं च सामसु। सामभिश्चाभिषिञ्चेयुः सर्वे संयतमानसाः ॥८९॥

गुरुदेव कलशों से कुशा से जल लेकर सूर्य की ओर पूर्वाभिमुख शिष्य का अभिषेक कराये। तदनन्तर उसके अभिषेक काल में ब्राह्मणगण यथाक्रमेण तीन शिक्षा (तीन वेद-मन्त्र) का पाठ करें। 'अस्य वासो स्वयं, उदूत्यं च एवं आकृष्णेन' इत्यादि आठ यजुर्मन्त्रों में तीन व्याहृति लगाये। आदित्य व्रत नामक एवं साम (मन्त्र गाने वाले) गायी को शुक्ल वस्त्र प्रदान करे। सभी संयत मन से साममन्त्रों द्वारा अभिषेक करें।।८६-८९।।

ततोऽग्निनिकटं गत्वा मन्त्रेण हृदयेन तु। कुशेन मृज्य तं शिष्यं होमं कुर्याद् गुरुः स्वयम् ॥९०॥ गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं तथा। जातकर्म तथा नामकरणं चाशनक्रियाम् ॥९१॥ चूड़ोपनयनं स्नानपानीयं च क्रतूनपि। कुशेनाङ्गपरामृज्य कुर्याद्वसथे हृदा ॥९२॥

तदनन्तर अग्नि के पास जाकर हृदयमन्त्र से शिष्य की कुश से मार्जना करे। अब गुरुदेव स्वयं होम करें। गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण तथा अन्न-प्राशन, चूड़ाकरण, उपनयन में स्नान एवं पानीय (आचमन) ग्रहण करें तथा यज्ञ करें। कुश द्वारा अंगमार्जना करके हृदय गृह में अवस्थान करना उचित है।।९०-९२।।

सकुशेन तु हस्तेन च्छित्वा शिष्यशिखां गुरुः। घृतप्लुतां दहेदग्नौ मूर्द्धादिक्षिप्तकारणात् ॥९३॥ परामृज्याथवा मूर्ध्नि तथैव जुहुयात्कुशान्। पाकसंस्थां हविःसंस्थां होमसंस्थां च कारयेत् ॥९४॥ प्रागुक्तेनैव विधिना ततः शुद्धेन सर्पिषा। शिष्यो होमं प्रकुर्वीत स्रुक्स्रुवाभ्यां यथाक्रमम् ॥९५॥

गुरु कुशयुक्त हाथ से शिष्य की शिखा छिन्न करे। मस्तकादि की क्षिप्तता हेतु घृत से उसे लिप्त करके अग्नि में दग्ध करे अथवा (कुश से) मस्तक की मार्जना करके उसी प्रकार कुशा की अग्नि में आहुति दे। तदनन्तर पाकसंस्था, हरिसंस्था तथा होमसंस्था करायें।।९३-९५।।

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३१५

शिष्योऽभिमुखमातिष्ठेत्संस्पृशेत्तु गुरुं कुशैः ।
भुवनानि सहादित्यं योगं कुर्याद्गुरुः स्वयम् ॥१९६॥

शिष्य सामने रहे और कुश से गुरुदेव का स्पर्श करे। गुरु स्वयं ‘भुवनानि सहादित्यं’ इत्यादि वेदमन्त्र से याग करें॥१९६॥

श्रावयेन्नित्यकृत्यादौ तथा च श्रौषडित्यपि ।
यागाङ्गे वषट्कारः कार्यो लोकाभितर्पणे ॥१९७॥

नित्य कृत्यादि (शिष्य को) सुनावे। वैसे ही ‘श्रौषड्’ को भी सुनायें तथा याग के अन्त में लौकिक तर्पण में वषट्कार का उच्चारण करें॥१९७॥

ॐ कालाग्निरुद्राय ठः ठः। ॐ कालरुद्रेभ्यः ठः ठः। ॐ भस्मरुद्रेभ्यः ठः ठः। ॐ श्वेताधिपतये ठः ठः। ॐ कालरुद्रेभ्यो ठः ठः। ॐ पिङ्गलरुद्रेभ्यो ठः ठः। ॐ हिरण्यवर्णाय ठः ठः। ॐ कालाय ठः ठः। ॐ लोहिताक्षाय ठः ठः। ॐ रक्तपिङ्गलेभ्यो ठः ठः। ॐ अनन्ताय ठः ठः। ॐ पुण्डरीकाक्षाय ठः ठः। ॐ सहस्रशीर्षाय ठः ठः। ॐ महोज्ज्वलाय ठः ठः। ॐ सज्ज्वलाय ठः ठः। ॐ आशीविषाय ठः ठः। ॐ सर्वेभ्योऽनन्ताय वरुणेभ्य ठः ठः। ॐ अविचये ठः ठः। ॐ रौरवाय ठः ठः। ॐ तामिस्राय ठः ठः। ॐ तामसाय ठः ठः। ॐ अन्धतामिस्राय ठः ठः। ॐ शीताय ठः ठः। ॐ उष्णाय ठः ठः। ॐ सन्तापनाय ठः ठः। ॐ सुप्रतपनाय ठः ठः। ॐ संहताय ठः ठः। ॐ काकोलूकाय ठः ठः। ॐ पद्मलोचनाय ठः ठः। ॐ संयमनाय ठः ठः। ॐ जम्बूकाय ठः ठः। ॐ उलूकाय ठः ठः। ॐ व्याघ्राय ठः ठः। ॐ पूतिमृत्तिकाय ठः ठः। ॐ कालसूत्राय ठः ठः। ॐ सूचीमुखाय ठः ठः। ॐ लोहशङ्कवे ठः ठः। ॐ क्षुरधारोपमाय ठः ठः। ॐ विरीकाय ठः ठः। ॐ दंशकाय ठः ठः। ॐ तप्तकुम्भोपमाय ठः ठः। ॐ पूयशोणितप्रवाहाय ठः ठः। ॐ कूटपर्वताय ठः ठः। ॐ तीक्ष्णशल्याय ठः ठः। ॐ चक्रपिण्डाय ठः ठः। ॐ तार्क्ष्याय सतुण्डाय ठः ठः। ॐ मेदोसृक्पूयप्रवाहाय ठः ठः। ॐ क्रकचच्छेदनाय ठः ठः। ॐ अस्थिभञ्जनाय ठः ठः। ॐ तप्तवालुकाय ठः ठः। ॐ पङ्कलेपनाय ठः ठः। ॐ निरुच्छ्वासाय ठः ठः। ॐ यमलपर्वताय ठः ठः। स्वाहाकारमन्त्रेभ्यः। ॐ कूटशाल्मलये ठः ठः।

ऊपर मूल में अंकित ‘ॐ कालाग्निरुद्राय ठः ठः’ इत्यादि मन्त्रों से (ठः ठः के स्थान पर सबमें स्वाहा कहें, ठः ठः नहीं कहना है) कालाग्निरुद्र, कालरुद्र, भस्मरुद्र, श्वेताधिपति तथा कालरुद्र के लिये आहुति प्रदान करे।

ऐसे ही पिङ्गल रुद्र, हिरण्यवर्ण, काल, लोहिताख्य, रक्तपिंगलगण, अनन्त, पुण्डरीकाक्ष, सहस्रशीर्ष, महोज्ज्वल, सज्ज्वल, आशीविष, सकल, अनन्त, वरुणगण,

३१६ श्रीसाम्बपुराणम्

अविचि, रौरव, तामिस्र, तामस, अन्धतामिस्र, शीत, उष्ण, सन्तापन, सुप्रतपन, संहत, काकोलूक, पद्मलोचन, संयमन, जम्बूक, उलूक, व्याघ्र, पूतिमृत्तिक तथा कालसूत्र के लिये आहुति प्रदान करें।

ऐसे ही सूचीमुख, लोहशंकु, क्षुरधारोपम, विरीक, दंशक, तप्तकुम्भोपम, पूयशोणित प्रवाह, कूट पर्वत, तीक्ष्ण शल्य, चक्रपिण्ड, सतुण्ड तार्क्ष्य, मेदोऽसृक्-पूयप्रवाह, क्रकचछेदन, अस्थिभंजन, तप्तबालूक, पङ्कलेपन, निरुच्छ्वास, यमलपर्वत तथा कूटशाल्मलि को स्वाहा लगाकर मन्त्रों से (जो मूल में अंकित है) एक-एक आहुति प्रदान करें।

ब्रह्मोवाच दशधा भेदभिन्नस्य भेदो द्वादशधा पुनः। तत्रास्य तव देवेश प्रसूतिर्बहुविस्तरा ॥९८॥

ब्रह्मा कहते हैं—हे देवेश! आपके दस प्रकार के भिन्न देह का पुनः बारह प्रकार का भेद है। आपकी बहु विस्तृत प्रसूति है॥९८॥

प्रतिविद्येषु तन्त्रेषु गतिरुक्ता परा तथा। कृत्स्नेन तपसा सिद्धिः प्राप्यते बहु विस्तरा ॥९९॥ रहस्यं परमं देव ब्रूहि तत्त्वार्थसिद्धये। प्रतिमन्त्रप्रयोगार्थं ध्यानसिद्धिं च तत्त्वतः ॥१००॥ अचिन्त्यं परमं गुह्यमनुक्तं यन्मयि त्वया। मन्त्रसिद्धिर्यतो यावत्तन्त्रेऽस्मिन्प्रथमे विभो ॥१०१॥

प्रतिविद्या तन्त्रों में परा गति की बात कही गयी है। कठोर तपस्या से बहु-विस्तृत सिद्धि प्राप्त होती है। हे देव! तत्त्वार्थ-सिद्धि के लिये परम रहस्य कहिये। प्रत्येक मन्त्र प्रयोगार्थ उन-उन ध्यानसिद्धि का वर्णन करिये। जो अचिन्त्य परम गुह्य (परम गोपनीय रहस्य) आपने मुझसे कहा नहीं है, हे विभु! उस प्रथम तन्त्र से जो मन्त्रसिद्धि होती है, वह बतलाईये॥९९-१०१॥

भास्कर उवाच पृष्टः प्रोवाच तं तस्य सृष्टिं सदसदात्मिकाम्। असतः प्रथमं जज्ञे वर्णोऽग्र्यः षोडशात्मकः ॥१०२॥ सप्तविंशत्तथा वर्णा जज्ञिरे क्रमशः परे। उभयेभ्यो विनिर्मथ्य विंशद्वर्णांश्च सृष्टये ॥१०३॥ आदितो मध्यमानेषु पञ्चविंशदयोनिजाः। परमेष्ठ्यादयः सप्त प्राणस्थानेषु निःसृताः ॥१०४॥ वक्त्रतः पारमेष्ठ्यात्तु कारणं दक्षिणेक्षणात्। क्रियावानेक्षणात्तस्य मन्त्रात्सद्दक्षिणात्सुतः ॥१०५॥

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३१७

सूर्यदेव कहते हैं—तुमने मुझसे जो जिज्ञासा किया है, उस सदसदात्मक सृष्टि की बातें बतलाता हूँ। असत् से प्रथमतः १६ अग्र वर्ण की उत्पत्ति हुई थी। तदनन्तर क्रमशः २७ वर्ण उत्पन्न हो गये। दोनों को मथित करके अन्य बीस वर्णों की उत्पत्ति हुई। आदि से मथित होने पर (१६ अग्रवर्ण) अयोनिज २५ उत्पन्न हुये। परमेष्ठि-प्रभृति सात लोग प्राण स्थान से निःसृत हैं। परमेष्ठि के मुख से हठात् दक्षिण चक्षु से, कारण की उत्पत्ति हुई। क्षणकाल में वाम चक्षु से क्रिया की उत्पत्ति, दाहिनी ओर मन्त्र से सुत की उत्पत्ति हो गयी।।१०२-१०५।।

विजसो वामतश्चास्य नासिकाप्रसवावुभौ।
प्रसूती तस्य सृष्ट्यंशौ निःसृतौ तौ यथाक्रमम् ।।१०६।।
ततस्तेषां निरोधाय सृष्टिसंहारकारणम्।
संसृत्याद्यानि पादानि प्रणवां तं सकारणम् ।।१०७।।
मूर्ध्नि चैवं तथा न्यस्य योनिशेषात्तु योजयेत् ।।१०८।।
शिवयोनिर्निर्मिता देवी हृदयाग्रे परं ततः।
कारणं दक्षिणे बाहौ स्थाप्या सर्वा क्रिया तथा ।।१०९।।

इसके वाम दिक् से विजस दोनों नासिका से उत्पन्न हैं। उससे सृष्ट-शौनि—यथाक्रम से दो लोग उपस्थित हो गये। तदनन्तर उनके निरोधार्थ सृष्टि तथा संहार का कारण (प्रकट हुआ)। संसृत्य प्रभृति पद, प्रणवान्त कारणयुक्त (?)। इस प्रकार मस्तक, वैसे ही अन्य के योनिशेष से युक्त किया गया। तदनन्तर हृदय के आगे शिवयोनि देवी परम कारण निर्मित हुआ। दक्षिण बाहु में समस्त क्रिया स्थापित हो गई।।१०६-१०९।।

भुवनाधिपतिर्यस्य बीजयोनिरथोभयोः।
लिङ्गोपतिप्रसूतिं तु न्यसेत्सृष्टिन्तु पादयोः ।।११०।।
संहारं चक्रुरुर्ध्वस्मात्यातां सर्वाङ्गिनीन्तथा।
भूतयोनिस्थिता नाभ्यां प्रेरिता विश्वसंज्ञिताः ।।१११।।
जठरे संस्थितो वह्निर्जगतोऽस्य प्रकाशकः।
लिङ्गस्यातिशयं वक्ष्ये दीर्घविस्तरणं तथा ।।११२।।

भुवनाधिपति जिनकी बीजयोनि तथा दोनों के लिंग के समीप प्रसूति को न्यस्त किया गया, उनके पादयुगल से सृष्टि हुई (यहाँ दोनों के लिंग के समीप अर्थात् श्लोक १०९ में वर्णित शिवयोनि देवी, जिनकी बीज योनि है तथा भुवनाधिपति जिनका लिंग है)। ऊर्ध्व से जो संहार करते हैं, वह सर्वाङ्गीण विश्व नामक प्राणि की योनिस्थिता नाभि द्वारा प्रेरित होता है। जठर-संस्थित अग्नि इस जगत् का प्रकाशक है। लिंग के अतिशय एवं वीर्य विस्तार को अब कहूँगा।।११०-११२।।

षष्ठि रथ्योत्तरा ज्ञेया व्योमव्याप्य तथा स्थिताः।

३१८श्रीसाम्बपुराणम्

षष्ठि रथ्योत्तरा ज्ञेया व्योमव्याप्य तथा स्थिताः।
अर्चिषो देवदेवस्य व्योमव्यापीति चाक्षरः ॥१९३॥
दश कोट्योऽथ लोकेभ्यो मन्त्राणाञ्जज्ञिरे प्रभो।
तुल्यायते तु विज्ञेया शिवेन परमात्मना ॥१९४॥
भुवने शान्तयः कार्य्या शिवयोनिप्रसूतिजः।
पातालदिशि विन्यस्य वारयंति स्वशक्तितः ॥१९५॥
शरीरं देवदेवस्य गृह्यमेतच्छिवात्मकम्।
ज्ञेयं ध्येयं तथा पूज्यं योज्यं स्यात्पञ्चविंशकम् ॥१९६॥

रथोत्तरा ६० जानना चाहिये, जो आकाश को व्याप्त करके स्थित है। देवदेव सूर्य की किरणें आकाशव्यापी एवं क्षयहीन हैं। लोकमंगलार्थ दस करोड़ मन्त्र उत्पन्न हुये। हे प्रभु! इन्हें परमात्मा शिव के समान जानना चाहिये। भुवनों में शिवयोनि से उत्पन्न शान्ति कार्य पाताल दिक् में विन्यस्त होकर अपनी शक्ति से उसका वरण करता है। देवदेव के इस शिवात्मक शरीर को अत्यन्त गोपनीय जानना चाहिये। वैसे ही वह ध्येय, पूज्य तथा योजनीय है। वह २५ है।।१९३-१९६।।

योज्यमेकरसद्धर्मं प्रोक्तं योगे मनीषिभिः।
एतज्ज्ञात्वा सुखात्सिद्धिं सन्दिग्धा त्वन्यथा भवेत्।
बीजार्थं वपुषो ह्येतत्प्रोक्तं तव पितामह ॥१९७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मण्डलकथनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः तृतीयं पटलम्

मनीषीगण योग में एकरसात्मक कर्म का योग करने के लिये कहते हैं। यह जानकर सुख से सिद्धि मिलती है। इसमें संदिग्ध होने पर सिद्धि नहीं मिलती। हे पितामह! शरीर के बीज के लिये आपसे यह सब कहा।।१९७।।

श्रीसाम्ब पुराणोक्त पचपनवें अध्याय में मण्डलकथन नामक तृतीय पटल समाप्त

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(ज्ञानोत्तरम्)

तत्र तत्त्वानि बीजतत्त्वं वर्णतत्त्वं योनितत्त्वं चेति ॥१॥
निष्कलं सकलं सिद्धाश्चत्वारः पदार्थाः सिद्धाः पञ्चविंशकभावाः॥२॥
अथास्य हृदयं वक्ष्ये गुह्याद्गुह्यतरं विभोः।
ऊर्ध्वं च सप्तस्रोतांसि नालं द्वादशकं तथा ॥३॥
पञ्जिका कर्णिका तस्य मकरः पञ्चधा स्मृतः।
केसरं षोडशन्तस्य पद्मद्वादशभिर्दलैः ॥४॥
सप्तशृङ्गं तथा पारं मेरुमन्दरभूषितम्।
योनयो द्वादशाख्याताः प्रतियन्त्रं प्रतिष्ठिताः ॥५॥
एकाक्षरपरो देवो वर्णेभ्यो बीजवान्प्रभुः।
तत्त्वनिर्मन्थनाज्ज्ञेया कला साध्यर्द्धमात्रिका ॥६॥
बीजबिजादमुं प्राहुः षोडशार्द्धं च यः क्रमात्।
आत्मा सार्धकला तस्य हृदि स्थितस्य सप्तधा ॥७॥

तत्त्व तीन हैं—बीजतत्त्व, वर्णतत्त्व तथा योनितत्त्व। (ये त्रितत्त्व तथा) निष्कल, सकल तथा सिद्ध—ये चार पदार्थ हैं (यहाँ बीजतत्त्व, वर्णतत्त्व तथा योनितत्त्व को एक में ही गिना गया है)। उनमें २५ सिद्ध भाव पदार्थ हैं। अब इनका हृदय कहूँगा, जो विभु का गुप्त से गुप्त तत्त्व है। ऊर्ध्व में सात स्रोत तथा १२ नाल हैं। उसकी पंजिका है—कर्णिका और मकर पाँच प्रकार का कहा गया है। उसके १६ केशर तथा १२ दल विशिष्ट हैं। उसके सात शृङ्ग एवं मेरु तथा मन्दर भूषित हैं। १२ योनि प्रसिद्ध है। वह प्रतियन्त्र में प्रतिष्ठित है। एकाक्षर परदेवता है। वर्णों के निमित्त बीजयुक्त प्रभु विराजित हैं। तत्त्व-निर्मन्थन करके ऊर्ध्वमात्रिका कला उत्पन्न हो सकी है। उसके प्रति बीज से क्रम को षोडशार्ध कहते हैं। उसके हृदयस्थ सात प्रकार की आत्मा है—अर्धकला॥१-७॥

सप्तशृङ्गकृतैश्चैव सप्त तस्य कलात्मकम्।
तत्त्वविद् बीजमेतत्स्यान्रान्यद्वीजमतः परम् ॥८॥
आदौ पञ्चदशं यत्तु संज्ञात्मा तदयन्त्र तत्।
सबिन्दुकाः प्लुता ज्ञेया विसर्गाश्च यथाक्रमम् ॥९॥
ओंकारान्ता अकाराद्या प्रथमे केसरे स्थिताः।
ककारादिहकारान्ता द्वितीये केसरे स्थिताः ॥१०॥

३२० श्रीसाम्बपुराणम्

सप्तशृङ्ग-कृत वह सात कलात्मक है। यह तत्त्व ज्ञान का बीज है। इसके अनन्तर (परे) कोई बीज नहीं है। प्रथम जो १५ है, वह संज्ञारूप है। बिन्दु के साथ प्लुत (दीर्घ) स्वर जानना चाहिये तथा यथाक्रम से विसर्ग जानना चाहिये। प्रथम केसर में अ से ॐ पर्यन्त अवस्थित है। द्वितीय में 'क' से 'ह' पर्यन्त स्थित है।।८-१०।।

अकारादिक्षकारान्ताः पञ्चाशद्यंत्रसंख्यया।
एतद्धृदयपद्मं स्याद्बीजयोनिकृतं प्रभो ॥११॥
ध्यात्वैतन्मुच्यते सर्वो बीजनिर्दग्धकल्मषः।
विधिना दीक्षितश्चास्मिन्मण्डले बीजयोनिजे ॥१२॥
निष्कलं सकलं चैव तथा सकलनिष्कल।
ध्यानं ज्ञेयं च योगश्च सर्वमेतस्य कीर्तितम् ॥१३॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे षट्पञ्चाशत्तमेऽध्याये तृतीयं पटलम्

'अ' से 'क्ष' पर्यन्त ५० यन्त्र संख्या है। हे प्रभु! बीजयोनिकृत यही है—हृदयपद्म। बीजयोनि से उत्पन्न इस मण्डल में यथाविधि दीक्षित सब व्यक्ति बीज के द्वारा पापयुक्त होते हैं तथा ध्यान के फल से मुक्त हो जाते हैं। निष्कल-सकल एवं सकल-निष्कल ध्यान तथा योग को जानना चाहिये।।११-१३।।

श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर छप्पनवें अध्याय में तृतीय पटल समाप्त

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(बीजोत्तरम्)

तत्त्वज्ञानमहं वक्ष्ये बीजान्येतान्यतः परम्।
अनादिनिधनं ज्ञानं गुह्याद्गुह्यतरं च यत्॥१॥
आसीदिदं समग्रं च ततानेतैदजायत।
तस्माद्धर्म वशी कामो जज्ञे व्याहार संप्रति ॥२॥
विवक्षितं त्वहं श्रेष्ठं विवृतं न च संवृतम्।
प्रादुरासीदवर्णेऽस्मात्तस्य संहारमिच्छतः॥३॥
स तमागाच्च जिह्वायां मध्ये प्रकृतिसम्भवः।
इवर्णोवर्णसंहारादुवर्णोऽभून्मनस्ततः ॥४॥

अब तत्त्वज्ञान का वर्णन करता हूँ। तदनन्तर इन बीजों का वर्णन करूँगा। अनादि-निधन ज्ञान गुह्य से भी गुह्यतर है। यह समग्र था, उससे विस्तृत होकर उत्पन्न हुआ (अर्थात् पहले एक में ही निहित था, तदनन्तर उससे विविक्त होकर अनेक रूप में विस्तृत हुआ), उससे धर्म वशीकामना का व्यवहार उत्पन्न होने लगा। बलवान इच्छा का मैंने प्रकाश किया; किन्तु संवृत का नहीं किया। संहार की इच्छा से यह 'अवर्ग' आविर्भूत हुआ। प्रकृति से उत्पन्न होकर उसने जिह्वा में प्रवेश किया। वर्णसंहार से 'इ' वर्ण तथा 'उ' वर्ण उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् मन की उत्पत्ति कही गयी है॥१-४॥

तदन्ते बिन्दुसम्भूतिः सर्वान्तः प्रभु शाश्वतः।
वायोर्निर्धारणात्कण्ठे हकारः सविसर्गकः॥५॥

उसके अन्त में बिन्दु की उत्पत्ति है, जो सबके अन्तर के प्रभु तथा नित्य हैं। वायु-धारणार्थ कण्ठ से विसर्ग के साथ 'ह'कार की उत्पत्ति हुई है॥५॥

अहये चोत्तरे ज्ञेयो वर्णानां सम्भवः स्वयम्।
अवर्णो परयोगे स्यादेकारस्त्वनुलोमतः॥६॥
विलोमतो यकारः स्यात्तधोकारवकारयोः।
तृतीयो योगतो ज्ञेयो व्योकारस्य तु सिद्धये ॥७॥

'अ ह' को उत्तर में जानो (?)। वर्णों की उत्पत्ति अपने-आप होती है। 'अ' वर्ण परयोग से उत्पन्न है, किन्तु 'ए'कार अनुलोम क्रम में एवं विलोम 'ष'कार, 'उ'कार तथा 'व'कार उत्पन्न है। तृतीय योग से व्योकार (वि-उकार) की उत्पत्ति जाननी चाहिये॥६-७॥

३२२ श्रीसाम्बपुराणम्

ह्रस्वदीर्घप्लुता होते न चोङ्कारसमानजाः । ऋकारक्कवरिवलकाराः स्वरा जिह्वाग्रकारिताः ॥८॥

ये ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुतवर्ण हैं। ये ॐकार के समान उत्पन्न नहीं होते। ऋ, ॠ तथा लृ जिह्वा के अग्रभाग से उत्पन्न हैं॥८॥

इष्टावीषत्प्रविष्टो च संहतो च हनुं यदा। जिह्वा मध्यस्थनानाभ्यां हन्वोरन्तरदर्शनात् ॥९॥

ईषत् प्रविष्ट २ इष्ट जब हनु से बाधा प्राप्त होते हैं, तब जिह्वा के मध्यस्थ तथा नाना (?) से लेकर हनु के मध्य में दर्शन मिलता है॥९॥

ताल्वोरेकारसम्भूतिरकाराद्दग्धसिद्धये । आकारैकारयोरादिरीकाराद्धं च पूर्वशः। तथोङ्कारपरा शेषा एतद्विस्तारलक्षणम्। स्पर्शांश्चाथ प्रवक्ष्यन्ते विद्यातत्त्वस्य सिद्धये ॥१०॥

तालु से ‘ए’कार की उत्पत्ति होती है। यह होती है ‘अ’कार की दग्ध-सिद्धि के लिये (?)। ‘आ’ तथा ‘ऐ’ के आदि तथा पूर्व से ‘ई’कार अर्ध है (?)। इसी प्रकार अवशिष्ट ॐकार के पर है (पश्चात् है), यह है विस्तार का लक्षण। अब विद्या तत्त्व की सिद्धि के लिये स्पर्श वर्ण की बात कहूँगा॥१०॥

जिह्वामूले च हन्वोः स्यात्स्पर्शनं कादिके गणे। मध्ये तालुं स्पृशेद्यञ्च वेष्टयित्वा तृतीयकाः ॥११॥

जिह्वा के मूल में तथा हनुद्वय के मध्य में ककारादि वर्णों का स्पर्श होता है। तृतीय वर्ण ‘ट’ वर्ग में तालु का वेष्टन करके स्पर्श करता है॥११॥

मूर्धन्ये देवतानां च चतुर्थे शिवमूलतः। ओष्ठाभ्यां पञ्चमस्याथ तत्त्वस्पर्शः सबीजकः ॥१२॥

मूर्धन्य का देवताओं तथा शिवमूल से चतुर्थ वर्ग (तवर्ग) का स्पर्श होता है। ओष्ठद्वय से पञ्चम वर्ग (पवर्ग) का स्पर्श होता है। यह है—बीजों के साथ तत्त्व का स्पर्श॥१२॥

करवन्द्यापात्तस्याहेकैकावद्ववेत्ततः । दन्तमूल्यो लकारः स्याच्चतुर्थश्चोष्ठदन्तगः ॥१३॥ ऊष्माणश्च गतास्ता वै प्रथमा मध्यमास्तथा । नपुंसका भवन्त्येते नासिकाश्च भवन्ति हि ॥१४॥

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२३

दाँतों के मूल से लकार तथा चतुर्थ वर्ग (तवर्ग) ओष्ठ तथा दाँतों से उत्पन्न हैं। प्रथम तथा मध्यम (?) ऊष्मवर्ण हैं। ये नपुंसक तथा नासिका से उत्पन्न होते हैं।।१३-१४।।

एते अनादिनिधनस्य सिसृक्षोश्चाव्ययं महत्।
विद्यातन्त्रविवृद्ध्यर्थमेभ्यो योनिं चकार सः॥१५॥

ये सब अनादि निधन सृष्टिकर्त्ता के महत् अव्यय हैं। विद्यातन्त्र की वृद्धि के लिये वे इनसे सृष्टि करते हैं।।१५।।

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः—षोडशस्वराः। क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म—एते स्पर्शाः। य र ल वा अन्तःस्थाः। श ष स हा एते ऊष्माणः। क ख ग घ एते यमाः। नपुंसकाश्च तृतीयेऽध्याये एतत् सिद्धम्।

इति श्रीसाम्बपुराणे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः बीजोत्तरे चतुर्थपटलं समाप्तम्

मूल में लिखित अ से अः तक १६ स्वरवर्ण हैं। ककार से मकार-पर्यन्त स्पर्श वर्ण हैं। य र ल व अन्तःस्थ वर्ण हैं। श ष स—ऊष्म वर्ण हैं। क ख ग घ—यम वर्ण तथा नपुंसक हैं। तृतीय अध्याय में ये सिद्ध हैं।

श्री साम्बपुराणोक्त सत्तावनवें अध्याय में बीजोत्तर का चतुर्थ पटल समाप्त

द्वितीयान्तश्चतुष्कश्च उत्तमश्च तथैव तु।

अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवः)

स्वरावाद्यौ चतुर्थाश्च ऊष्मा च प्रथमं तथा।
चत्वारश्चोत्तरं ज्ञेयास्तृतीयाः स्पर्शसंज्ञकाः ॥१॥
द्वितीयान्तश्चतुष्कश्च उत्तमश्च तथैव तु।
चतुर्थत्रयमेव स्यात्तृतीयो द्वौ तथैव च ॥२॥
द्वितीयाद्यस्य चत्वारस्तृतीयस्यानुनासिकम्।
पञ्चमः प्रथमश्च स्यात्तया स्यादनुनासिकम् ॥३॥
चतुर्थो ह्यष्टकश्चैव योनिः सा हि सुसृष्टये।
चत्वारो स्याद्द्विवर्णाः स्युर्दीपिता बिन्दुभिस्त्रिभिः ॥४॥

आद्यस्वर दो, चतुर्थ वर्णसमूह, ऊष्म वर्णसमूह तथा प्रथम वर्ण—इन चारो को परवर्ती जानना चाहिये। तृतीय वर्ण स्पर्शसंज्ञक हैं। द्वितीयान्त चार हैं, चतुर्थ तीन हैं तथा तृतीय में दो उत्तम हैं। द्वितीय के आद्य चार तथा तृतीय अनुनासिक हैं। इसी प्रकार पञ्चम एवं प्रथम अनुनासिक हैं। चतुर्थ एवं अष्टक सुसृष्टि के योनिरूप हैं और ये चार द्विवर्ण बिन्दुसमूह के साथ दीपित होते हैं॥१-४॥

दीपिनी बीजिनी ह्येषा पावनी स्वरसन्ततिः।
नित्यमेषानुजप्तव्या परं निर्वाणमिच्छता ॥५॥
आहावहवो हवाभवे चारिणी परमशक्तिना।
तन्त्र इति स्थितोभूमिमहाभूत इतरेतरचुम्बचुम्ब-
एषा सिद्धा चत्वारिंशदक्षरा योनिः ॥६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवे
पञ्चमं पटलम् समाप्तम्

ये स्वरसमूह दीपिनी, बीजिनी तथा पावनी हैं। परनिर्वाण के इच्छुक व्यक्ति को इनका नित्य जप करना चाहिये। अहो! इस संसार में परमशक्ति के साथ विचरणशील परस्पर भिन्न महाभूतों का समूह 'तन्त्र' नामक भूमि में स्थित है। इस प्रकार सिद्ध ४० अक्षरात्मिका योनि सिद्ध होती है॥५-६॥

श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर बीजप्रसव नामक अट्ठावनवें अध्याय का पञ्चम पटल समाप्त

एकोनषष्टितमोऽध्यायः

(ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवः)

पञ्चविंशतिभिर्नाम सप्तधा क्रमशस्तथा।
प्रणवादिस्त्रिधा भिन्नं तस्मिन्नेव पदे उभे ॥१॥
प्रणवादिर्नमोऽन्तस्थः प्रसवः सप्तमस्तु सः।
एषामादिपदं यत्स्याद् द्वितीयां चैव योजयेत् ॥२॥
तथा चादिपदैस्तत्त्वं प्रतिलोमो विधीयते।
योनि मुख्यानि यानि स्युः सर्वसृष्टिप्रवृत्तये ॥३॥

इति श्रीसाम्बपुराणे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवे षष्ठं पटलं समाप्तम्


२५ द्वारा क्रम-क्रम से सात प्रकार के नाम हैं। आदि में प्रणव है। तीन प्रकार से भिन्न रूप उसका उदय पद है। आदि में प्रणव, अन्त में नमः शब्द सप्तम उत्पत्ति है। उसका स्तव करता है। इसमें जो आदि पद है, उसमें द्वितीय का योग करे। इस प्रकार आदि पद द्वारा प्रतिलोम में तत्त्व की उत्पत्ति होती है। समस्त सृष्टि में प्रवृत्ति के कारण ये योनिमुख हैं॥१-३॥

श्री साम्ब पुराणोक्त उनसठवें अध्याय में ज्ञानोत्तर बीजस्वर प्रसव अध्याय का षष्ठ पटल समाप्त