साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 333, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
(ज्ञानोत्तरम्)
तत्र तत्त्वानि बीजतत्त्वं वर्णतत्त्वं योनितत्त्वं चेति ॥१॥
निष्कलं सकलं सिद्धाश्चत्वारः पदार्थाः सिद्धाः पञ्चविंशकभावाः॥२॥
अथास्य हृदयं वक्ष्ये गुह्याद्गुह्यतरं विभोः।
ऊर्ध्वं च सप्तस्रोतांसि नालं द्वादशकं तथा ॥३॥
पञ्जिका कर्णिका तस्य मकरः पञ्चधा स्मृतः।
केसरं षोडशन्तस्य पद्मद्वादशभिर्दलैः ॥४॥
सप्तशृङ्गं तथा पारं मेरुमन्दरभूषितम्।
योनयो द्वादशाख्याताः प्रतियन्त्रं प्रतिष्ठिताः ॥५॥
एकाक्षरपरो देवो वर्णेभ्यो बीजवान्प्रभुः।
तत्त्वनिर्मन्थनाज्ज्ञेया कला साध्यर्द्धमात्रिका ॥६॥
बीजबिजादमुं प्राहुः षोडशार्द्धं च यः क्रमात्।
आत्मा सार्धकला तस्य हृदि स्थितस्य सप्तधा ॥७॥
तत्त्व तीन हैं—बीजतत्त्व, वर्णतत्त्व तथा योनितत्त्व। (ये त्रितत्त्व तथा) निष्कल, सकल तथा सिद्ध—ये चार पदार्थ हैं (यहाँ बीजतत्त्व, वर्णतत्त्व तथा योनितत्त्व को एक में ही गिना गया है)। उनमें २५ सिद्ध भाव पदार्थ हैं। अब इनका हृदय कहूँगा, जो विभु का गुप्त से गुप्त तत्त्व है। ऊर्ध्व में सात स्रोत तथा १२ नाल हैं। उसकी पंजिका है—कर्णिका और मकर पाँच प्रकार का कहा गया है। उसके १६ केशर तथा १२ दल विशिष्ट हैं। उसके सात शृङ्ग एवं मेरु तथा मन्दर भूषित हैं। १२ योनि प्रसिद्ध है। वह प्रतियन्त्र में प्रतिष्ठित है। एकाक्षर परदेवता है। वर्णों के निमित्त बीजयुक्त प्रभु विराजित हैं। तत्त्व-निर्मन्थन करके ऊर्ध्वमात्रिका कला उत्पन्न हो सकी है। उसके प्रति बीज से क्रम को षोडशार्ध कहते हैं। उसके हृदयस्थ सात प्रकार की आत्मा है—अर्धकला॥१-७॥
सप्तशृङ्गकृतैश्चैव सप्त तस्य कलात्मकम्।
तत्त्वविद् बीजमेतत्स्यान्रान्यद्वीजमतः परम् ॥८॥
आदौ पञ्चदशं यत्तु संज्ञात्मा तदयन्त्र तत्।
सबिन्दुकाः प्लुता ज्ञेया विसर्गाश्च यथाक्रमम् ॥९॥
ओंकारान्ता अकाराद्या प्रथमे केसरे स्थिताः।
ककारादिहकारान्ता द्वितीये केसरे स्थिताः ॥१०॥