भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३१६ श्रीसाम्बपुराणम्

अविचि, रौरव, तामिस्र, तामस, अन्धतामिस्र, शीत, उष्ण, सन्तापन, सुप्रतपन, संहत, काकोलूक, पद्मलोचन, संयमन, जम्बूक, उलूक, व्याघ्र, पूतिमृत्तिक तथा कालसूत्र के लिये आहुति प्रदान करें।

ऐसे ही सूचीमुख, लोहशंकु, क्षुरधारोपम, विरीक, दंशक, तप्तकुम्भोपम, पूयशोणित प्रवाह, कूट पर्वत, तीक्ष्ण शल्य, चक्रपिण्ड, सतुण्ड तार्क्ष्य, मेदोऽसृक्-पूयप्रवाह, क्रकचछेदन, अस्थिभंजन, तप्तबालूक, पङ्कलेपन, निरुच्छ्वास, यमलपर्वत तथा कूटशाल्मलि को स्वाहा लगाकर मन्त्रों से (जो मूल में अंकित है) एक-एक आहुति प्रदान करें।

ब्रह्मोवाच दशधा भेदभिन्नस्य भेदो द्वादशधा पुनः। तत्रास्य तव देवेश प्रसूतिर्बहुविस्तरा ॥९८॥

ब्रह्मा कहते हैं—हे देवेश! आपके दस प्रकार के भिन्न देह का पुनः बारह प्रकार का भेद है। आपकी बहु विस्तृत प्रसूति है॥९८॥

प्रतिविद्येषु तन्त्रेषु गतिरुक्ता परा तथा। कृत्स्नेन तपसा सिद्धिः प्राप्यते बहु विस्तरा ॥९९॥ रहस्यं परमं देव ब्रूहि तत्त्वार्थसिद्धये। प्रतिमन्त्रप्रयोगार्थं ध्यानसिद्धिं च तत्त्वतः ॥१००॥ अचिन्त्यं परमं गुह्यमनुक्तं यन्मयि त्वया। मन्त्रसिद्धिर्यतो यावत्तन्त्रेऽस्मिन्प्रथमे विभो ॥१०१॥

प्रतिविद्या तन्त्रों में परा गति की बात कही गयी है। कठोर तपस्या से बहु-विस्तृत सिद्धि प्राप्त होती है। हे देव! तत्त्वार्थ-सिद्धि के लिये परम रहस्य कहिये। प्रत्येक मन्त्र प्रयोगार्थ उन-उन ध्यानसिद्धि का वर्णन करिये। जो अचिन्त्य परम गुह्य (परम गोपनीय रहस्य) आपने मुझसे कहा नहीं है, हे विभु! उस प्रथम तन्त्र से जो मन्त्रसिद्धि होती है, वह बतलाईये॥९९-१०१॥

भास्कर उवाच पृष्टः प्रोवाच तं तस्य सृष्टिं सदसदात्मिकाम्। असतः प्रथमं जज्ञे वर्णोऽग्र्यः षोडशात्मकः ॥१०२॥ सप्तविंशत्तथा वर्णा जज्ञिरे क्रमशः परे। उभयेभ्यो विनिर्मथ्य विंशद्वर्णांश्च सृष्टये ॥१०३॥ आदितो मध्यमानेषु पञ्चविंशदयोनिजाः। परमेष्ठ्यादयः सप्त प्राणस्थानेषु निःसृताः ॥१०४॥ वक्त्रतः पारमेष्ठ्यात्तु कारणं दक्षिणेक्षणात्। क्रियावानेक्षणात्तस्य मन्त्रात्सद्दक्षिणात्सुतः ॥१०५॥