साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 331, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३१७
सूर्यदेव कहते हैं—तुमने मुझसे जो जिज्ञासा किया है, उस सदसदात्मक सृष्टि की बातें बतलाता हूँ। असत् से प्रथमतः १६ अग्र वर्ण की उत्पत्ति हुई थी। तदनन्तर क्रमशः २७ वर्ण उत्पन्न हो गये। दोनों को मथित करके अन्य बीस वर्णों की उत्पत्ति हुई। आदि से मथित होने पर (१६ अग्रवर्ण) अयोनिज २५ उत्पन्न हुये। परमेष्ठि-प्रभृति सात लोग प्राण स्थान से निःसृत हैं। परमेष्ठि के मुख से हठात् दक्षिण चक्षु से, कारण की उत्पत्ति हुई। क्षणकाल में वाम चक्षु से क्रिया की उत्पत्ति, दाहिनी ओर मन्त्र से सुत की उत्पत्ति हो गयी।।१०२-१०५।।
विजसो वामतश्चास्य नासिकाप्रसवावुभौ।
प्रसूती तस्य सृष्ट्यंशौ निःसृतौ तौ यथाक्रमम् ।।१०६।।
ततस्तेषां निरोधाय सृष्टिसंहारकारणम्।
संसृत्याद्यानि पादानि प्रणवां तं सकारणम् ।।१०७।।
मूर्ध्नि चैवं तथा न्यस्य योनिशेषात्तु योजयेत् ।।१०८।।
शिवयोनिर्निर्मिता देवी हृदयाग्रे परं ततः।
कारणं दक्षिणे बाहौ स्थाप्या सर्वा क्रिया तथा ।।१०९।।
इसके वाम दिक् से विजस दोनों नासिका से उत्पन्न हैं। उससे सृष्ट-शौनि—यथाक्रम से दो लोग उपस्थित हो गये। तदनन्तर उनके निरोधार्थ सृष्टि तथा संहार का कारण (प्रकट हुआ)। संसृत्य प्रभृति पद, प्रणवान्त कारणयुक्त (?)। इस प्रकार मस्तक, वैसे ही अन्य के योनिशेष से युक्त किया गया। तदनन्तर हृदय के आगे शिवयोनि देवी परम कारण निर्मित हुआ। दक्षिण बाहु में समस्त क्रिया स्थापित हो गई।।१०६-१०९।।
भुवनाधिपतिर्यस्य बीजयोनिरथोभयोः।
लिङ्गोपतिप्रसूतिं तु न्यसेत्सृष्टिन्तु पादयोः ।।११०।।
संहारं चक्रुरुर्ध्वस्मात्यातां सर्वाङ्गिनीन्तथा।
भूतयोनिस्थिता नाभ्यां प्रेरिता विश्वसंज्ञिताः ।।१११।।
जठरे संस्थितो वह्निर्जगतोऽस्य प्रकाशकः।
लिङ्गस्यातिशयं वक्ष्ये दीर्घविस्तरणं तथा ।।११२।।
भुवनाधिपति जिनकी बीजयोनि तथा दोनों के लिंग के समीप प्रसूति को न्यस्त किया गया, उनके पादयुगल से सृष्टि हुई (यहाँ दोनों के लिंग के समीप अर्थात् श्लोक १०९ में वर्णित शिवयोनि देवी, जिनकी बीज योनि है तथा भुवनाधिपति जिनका लिंग है)। ऊर्ध्व से जो संहार करते हैं, वह सर्वाङ्गीण विश्व नामक प्राणि की योनिस्थिता नाभि द्वारा प्रेरित होता है। जठर-संस्थित अग्नि इस जगत् का प्रकाशक है। लिंग के अतिशय एवं वीर्य विस्तार को अब कहूँगा।।११०-११२।।