भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३१० श्रीसाम्बपुराणम्

एवं मण्डलमालेख्य भूयः स्नात्वा समाहितः। शस्यते हरितां हृद्यां सर्वेषु रविकर्मसु ॥५२॥

चार वर्णों से आवरणादि का अंकन करे। ऐसे ही चार वर्ण से अन्तराल वाले स्थानों को भी अंकित करे। जिन पूर्व स्थानों में देवादि की स्थिति कही गयी है, नाभिदेश के अभ्यन्तर में उनका अंकन करना चाहिये। इस प्रकार मण्डल का अंकन करके समाहित होकर सूर्य के समस्त कार्यों में मन लगाये।।५०-५२।।

अग्निगर्भस्य चान्तेषु प्रागुदक्कुलकान् कुशान्। न्यसेत्समंतात् सर्वेषु ह्यग्निकार्ये च नैत्यिके ॥५३॥ विशेषं परमं किञ्चित्पूजाग्निक्रिययोर्मया। कथ्यमानं सुराः सर्वे निबोधत महाफलम् ॥५४॥ नदीद्विकूलगोशृङ्गमृत्स्नागोशीर्षकाननम् । शुक्लं सभस्मदूर्वान्तिकर्णीसर्षपरोचनाः ॥५५॥ क्रोड़क्रान्तां निशां मुस्तां सर्वास्राष्ट्रासु दिक्ष्वपि। चन्दनोदकपूर्वेषु चन्दनस्थालिकेषु च ॥५६॥ शम्याभिपल्लवाक्षेपचिराजितमुखेषु च। कन्दराबद्धवस्त्रेषु कलशेषु विनिक्षिपेत् ॥५७॥

नित्य अग्नि कार्य में तथा अग्निगर्भ के चतुर्दिक उदककुलक कुश का विन्यास करे। पूजा तथा अग्निकार्य के सम्बन्ध में कुछ विशेष मैं कहता हूँ। हे देवगण! तुम उसे सुनो। वह महान् फलद है। नदी के दोनों तट, गाय का सींग, मृत्तिका, गाय का मस्तक, वन पर शुक्ल भस्म के साथ दूर्वा, अंतिकर्णी, सरसों, रोचना (गोरोचन), क्रोड़क्रान्त निशा, मुस्ता को सभी आठ दिशाओं में चन्दन मिश्रित जल के साथ चन्दनस्थ असिक, शमि के अभि-पल्लवाक्षेप से तथा चिराजित मुख में कन्दर के द्वारा वस्त्रबद्ध कलशों को निक्षेप करना होगा (इन सबका कोई अर्थ स्पष्ट नहीं है। अतः मात्र शब्दार्थ दिया गया है)।।५३-५७।।

संवत्सरस्य तस्यापि दिश्याग्नेय्यां ततः शुभम्। अग्निकुण्डं विदिक्कोणे तदेवपुरसम्मितम् ॥५८॥ आर्यादितीर्थसहितं निखातं द्वादशाङ्गुलम्। विस्तृताष्टाङ्गुलं तीर्थं कुर्यात्प्राक् प्लवमुत्तमम् ॥५९॥

आर्यादिकतीर्थम् ।

उस संवत्सर के आग्नेयी दिशा में (पूर्व तथा दक्षिण का मध्यवर्ती कोण) शुभ अग्नि-कुण्ड, विदिक् कोण में पद्मपुर के समान आर्यादि तीर्थ के साथ १२ अंगुल निखात करे। विस्तृत आठ अंगुल नीचे प्रवाह में उत्तम तीर्थ करे। यह है आर्यादिक तीर्थ।।५८-५९।।