भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३११

कुण्डादष्टाङ्गुलं न्यस्य याम्यदर्भसमेन कम्।
विज्ञः सप्ताङ्गुलैश्चैव पारियात्रमथोत्तरे ॥६०॥
यैः सहैव खखोल्कस्य पूजा निगदिता शुभा।
वह्निरूपः स तैः सार्द्धं ध्येयः स्वहृदयेन तु ॥६१॥
ब्रह्मतो वरुणाभ्यासे प्राङ्मुखे स्रुक्स्रुवौ न्यसेत्।
इष्टाङ्गानि तु सर्वाणि गुरोर्नैर्ऋतभागतः ॥६२॥
अक्षीणाग्राः कुशा ह्रस्वा लूनाश्चैवोपमूलतः।
शस्यं ते हरिता हृद्याः सर्वेषु रविकर्मसु ॥६३॥

विज्ञ व्यक्ति कुण्ड से आठ अंगुल दक्षिण में दर्भ (कुश) निक्षेप करे। उत्तर दिशा में सात अंगुल का पारियात्र बनाये। जिनके साथ खखोल्क की (सूर्य की) पूजा की वार्त्ता कही गयी हो, उनके साथ अपने हृदय में वह्निरूप सूर्य का ध्यान करना चाहिये। ब्रह्मा से लेकर वरुण के पास तक पूर्व मुख में स्रुक् तथा स्रुव को न्यस्त करे। गुरु के नैर्ऋत्य भाग में समस्त ईप्सित अंग समूह रहें। उनके अग्रभाग में छोटी कुशों को (जो क्षीण न हों) न्यस्त करना होगा। सूर्य के सभी कर्म में हरे रंग के शस्य ईप्सित हैं।।६०-६३।।

अग्निगर्भस्य चान्तेषु प्रागुदक्कुलकान् कुशान्।
न्यसेत्समन्तात् सर्वेषां ब्रह्मादीनामधस्ततः ॥६४॥
चतुर्विंशतिरङ्गुष्ठपरिमाणं स्रुवस्य तु।
तस्याप्युद्धरणाग्रस्य न तमङ्गुष्ठसम्मितम् ॥६५॥
तदर्द्धाङ्गुलं पात्रिमानं पाणिपात्रतलोदरम्।
वृत्तं तस्यापि निर्दिष्टं खातं द्व्यङ्गुलमेव च ॥६६॥
रक्तचन्दनकाष्ठैश्च खदिराश्वत्थकिंशुकैः।
अन्यैश्चैवापि याज्ञीयैः कर्तव्यं स्रुक्स्रुवादिकम् ॥६७॥

अग्निगर्भ के शेष भाग में पूर्व में उदक कुलक कुश का ब्रह्मादि के नीचे चारो ओर निःक्षेप करे। स्रुव का परिमाण होगा २४ अंगुल। उद्धरण (जिससे यज्ञ में घृत दिया जाता है) का अग्रभाग नत तथा अंगुष्ठ के समान होगा। उसके अर्द्धाङ्गुल पात्रिमाण में हस्तरूप पात्र के तल देश में जिसका उदर है उसका वृत्त निर्दिष्ट है—वहाँ दो अंगुल गहराई होगी। रक्तवर्ण चन्दन की लकड़ी से, खैर, पीपल, किंशुक अथवा अन्य यज्ञीय काष्ठ से स्रुक् तथा स्रुवा का निर्माण करना उचित है।।६४-६७।।

काष्ठैरमीभिः कर्तव्यं मुशलोलूखलं तथा।
चमसश्चैव तत्रापि मुशलं द्वादशाङ्गुलम् ॥६८॥
उलूखलं तु दिक्संख्यं खातं च चतुरङ्गुलम्।
चमसवर्णसंख्यातं खातं ह्यर्द्धाङ्गुलं तथा ॥६९॥