भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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३१२ श्रीसाम्बपुराणम्

पुच्छं षडङ्गुलं तस्य विज्ञेयं परिमाणतः । दन्तकाष्ठन्तु शिष्यस्य ललाटेन तु सम्मितम् ॥७०॥

इन सब लकड़ियों से मूसल-उलूखल तथा चमस बनाना उचित है। मूशल होगा १२ अगुल। उलूखल होगा दस अंगुल परिमित तथा चार अंगुल गहरा होगा। चमस होगा चार अंगुल परिमित तथा आधा अंगुल गहरा। उसके पुच्छ का परिमाण होगा छः अंगुल। दन्तकाष्ठ होगा शिष्य के ललाट के तुल्य ।।६८-७०।।

अर्कस्य समिधः काष्ठं द्वादशाङ्गुलमायतम् । अवक्रं सत्वचं चैव सार्द्रन्निष्पाणिकं तथा । उपवीतं कुशमयं कर्त्तव्या मेखला त्रिवृत् ॥७१॥ समा शुक्ला च मौञ्जी स्याद्बर्हिजा बिल्वजा तथा । अविच्छिन्नशिखाजालः सर्पिः काञ्चनसन्निभम् ॥७२॥ स्निग्धः प्रदक्षिणावर्तो वह्निः सिद्धिकरः स्मृतः । उलूखलैः ततस्तस्मिंक्षोदयेच्चतुरङ्गुलम् ॥७३॥

सूर्य के समिध का काष्ठ १२ अंगुल का हो। वह वक्र न हो। त्वचा से युक्त, आर्द्र तथा शाखारहित हो। कुशमय उपवीत हो तथा उसमें त्रिवृत मेखला हो। समान तथा शुक्लवर्ण की मौञ्जी होनी चाहिये, जो मयूरपुच्छ की अथवा वस्त्र की हो। अविच्छिन्न अग्नि शिखायुक्त घृत स्वर्ण के समान उज्ज्वल हो (पिघलने पर स्वर्ण के समान स्वर्णाभ लगे)। स्निग्ध प्रदक्षिणावर्त्त अग्नि (होमाग्नि जो दक्षिण (दाहिनी) ओर घूमती हो) सिद्धिकारक कही गयी है। तदनन्तर उलूखल को चार अङ्गुल खोद दे (गहरा करे) ।।७१-७३।।

खखोल्कमूलमन्त्रेण मुशलेन समाहितः । नवोप्पानं तु शिखया पञ्चसा तण्डुलेन च ॥७४॥ मूलेन चैव शमयेत्पायसं चतुरङ्गुलम् । प्रवेश्याः प्रयताः शिष्या ये पूर्वमधिवासिताः ॥७५॥

सूर्य के मूलमंत्र में मूसल द्वारा समाहित हो शिखा द्वारा नौ उपपान एवं ५-६ तण्डुलों द्वारा तथा मूल द्वारा ४ अंगुल पायस उपशम करे। तदनन्तर जो पूर्व में अधिवास करते हैं, संयत मन उन शिष्यों को प्रवेश (मण्डल में) कराये ।।७४-७५।।

लिखितं स्याद्यमुद्दिश्य तं च पूर्वं निवेशयेत् । सोष्णीषं वाग्यतं दान्तं सितचन्दनचर्चितम् ॥७६॥ अचञ्चलोज्ज्वलकरं सितवस्त्रविभूषितम् । गवां पुच्छेन सलिलैः खखोल्काहृदयेन तु ॥७७॥ अभिषिञ्चेद् गुरुः शिष्यं ततस्तैः पापनाशनैः । प्रदद्याद् गुरवे शिष्यो गां वत्सेन समन्विताम् ॥७८॥