साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 323, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३०९
असंसक्तमिदं कुर्यादस्थूलामकृशां तथा।
अविक्षीणां रजोरेखां देशिकाङ्गुष्ठयोजिताम्॥४३॥
न च मासप्रमाणं तु रेखामानवशाद् भवेत्।
वलिता चापरां मृष्या दीना शुक्ला ततः क्रमात्॥४४॥
पद्मगर्भस्य नवमो योगः स परिकीर्तितः।
तस्याधिनवमे याम्यां तयोर्मध्ये तु तत्स्मृतः॥४५॥
यह परस्पर मिलित नहीं होगा। इसी प्रकार स्थूल एवं कृश नहीं होगा। रजोरेखा होगी गुरु के अंगुष्ठ में योजित अक्षीण। मास इसका प्रमाण नहीं होगा। रेखा ही मान-प्रमाण होगी। क्रम से कहने पर मृष्य, दीन, शुक्लवर्ण के पद्मगर्भ में नवम योग के रूप में कीर्तित होता है। उसके भी नवम दक्षिण दिशा में उन दो के मध्य में वह स्मृत है॥४३-४५॥
लिखेद् भूतादितः पद्मं भौतिके पद्मप्रभम्।
उदितार्कसमानं तु नैष्ठिके कर्मणि स्थितम्॥४६॥
पीतां तु कर्णिकां तत्र किञ्जल्कं हरितं लिखेत्।
केसराणयरुणान्यन्तः शुक्लान्यदन्तपत्रयोः॥४७॥
पीतामर्कपुरं शोणमस्त्रं पद्माग्रसन्धिषु।
प्रतिदिग्देवतास्त्राणि स्वीकृत्य हरितान् हयान्॥४८॥
भूतादि से पद्म का अंकन करे। भौतिक में पद्म तुल्य होगा (कमल के समान)। नैष्ठिक कर्म में उदित सूर्य के समान (नैष्ठिक कर्म में पद्म के समान अंकन न होकर उदित सूर्य जैसा अंकन करना चाहिये, उसमें पद्म के समान अंकन नहीं होगा)। कर्णिका जहाँ होगी, वहाँ पीतवर्ण तथा किंजल्क हरितवर्ण का होगा। केशरसमूह में अरुण वर्ण होगा तथा अन्त पत्र (दोनों) का वर्ण शुक्ल होगा। सूर्यपुरी का वर्ण होगा पीत। पद्म की अग्रसन्धि में रक्त वर्ण का अस्त्र होगा। प्रत्येक दिग् देवता का अस्त्र स्वीकार करना होगा। उनके अस्त्र होंगे—हरितवर्ण॥४६-४८॥
संध्यारुणसमं व्योमकन्दरां कनकप्रभाम्।
सितपीतारुणैर्वर्णैर्यष्टिर्र्लेखासु नाननः॥४९॥
सन्ध्याकालीन अरुण के समान वर्ण का आकाश बनाये। कन्दर स्वर्णतुल्य होंगे। श्वेत, पीत तथा अरुण वर्ण के द्वारा यष्टि रञ्जित करे, किन्तु मुख न करे॥४९॥
चतुर्भिर्वर्णकैर्लेख्यं सर्वमावरणादिकम्।
चतुर्भिर्वर्णकैरेव चारालात् पूरयेत्तथा॥५०॥
उक्ता देवादयो येषु पूर्वस्थानेषु तत्र वै।
स्वनाभ्याभ्यन्तरे तेषां लिखितं खेलनं भवेत्॥५१॥